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कोरोना वायरस से पुनः संक्रमण का खतरा

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रंजना मिश्रा ©️®️
कानपुर, उत्तर प्रदेश

कोरोना वायरस अपने स्वरूप को तेजी से परिवर्तित कर रहा है। इस परिवर्तन के दौरान यह कभी पहले से ज्यादा शक्तिशाली हो जाता है और कभी कमजोर। विज्ञान की भाषा में इसे न्यूटेशन कहते हैं।इसी न्यूटेशन के आधार पर जब कोई वायरस तेजी से फैलने लगता है तो उसे वायरस का नया स्ट्रेन कहते हैं।दुनिया भर के वैज्ञानिकों को अब तक कोरोना वायरस के 8 से ज्यादा स्ट्रेन्स मिल चुके हैं। कोरोना वायरस हर 15 दिन में अपने आप को बदलने की क्षमता रखता है। हाल ही में मलेशिया में इस वायरस का एक खतरनाक स्ट्रेन मिला, जिसे D614G नाम दिया गया।इसे कोरोना वायरस का नया वर्जन कह सकते हैं। मलेशिया में कोविड-19 का यह नया वर्जन भारत से लौटे एक व्यक्ति से फैलना शुरू हुआ था। जिसने 14 दिन के क्वारंटाइन को बीच में ही तोड़ दिया था। डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के अनुसार कोरोना वायरस का ये नया वर्जन D614G सबसे अधिक शक्तिशाली स्ट्रेन है। ये एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में अधिक तेजी से फैलता है। ये पहले कोरोना वायरस से 10 गुना ज्यादा घातक और खतरनाक है।न्यूटेशन की वजह से ये वायरस शरीर की कोशिकाओं से चिपकने की अपनी शक्ति को पहले से बढ़ा लेता है। कोई भी वायरस अपनी स्पाइक प्रोटीन की मदद से शरीर की कोशिकाओं से चिपक जाता है। कोरोना वायरस के आसपास कांटो जैसी आकृति ही स्पाइक प्रोटीन कहलाती है‌।
कोविड-19 के नए वर्जन पर शोध करने वाले वैज्ञानिकों के अनुसार अब यह कांटे पहले से ज्यादा घातक हो गए हैं और कोशिकाओं पर ज्यादा तीखा प्रहार करने में सक्षम हो गए हैं। इसलिए सवाल ये है कि अगर इस वायरस से लड़ने वाली वैक्सीन बन भी गई तो क्या वो अलग-अलग प्रकार के कोरोनावायरस का सामना कर पाएगी ? जब तक वैक्सीन बनेगी, ये वायरस अपने आप को बदल चुका होगा और बदले हुए रूप पर यानी उस वर्जन पर ये वैक्सीन काम नहीं करेगी।
अबतक इस वायरस की संरचना पर जो भी परिवर्तन हुए वो इसकी स्पाइक प्रोटीन में हुए हैं, जो इस वायरस का ऊपरी हिस्सा है। इसके निचले हिस्से में कोई बदलाव नहीं हुआ है। वैक्सीन के साथ-साथ शरीर की प्रतिरोधक क्षमता वायरस पर पहला प्रहार इसी हिस्से में करती है। अतः कोविड-19 में हुए बदलाव वैक्सीन पर कोई प्रभाव नहीं डालेंगे।
एक बार संक्रमण होने पर ठीक हो जाने के बाद ये संक्रमण दोबारा भी हो सकता है। ठीक हो जाने के बाद भी इसके प्रभाव शरीर में बने रहते हैं और कमजोर शरीर में अनेक समस्याएं पैदा हो सकती हैं और शरीर दूसरी बीमारियों का शिकार हो सकता है।
पूरी दुनिया में इस समय दो करोड़ 30 लाख से ज्यादा लोग इस वायरस का शिकार हो चुके हैं। इनमें से आधे लोग ठीक होने के बाद भी इस वायरस से किसी न किसी रूप में परेशान हैं। इन 50% लोगों में कुछ को लंबे समय तक थकान बनी रहती है, कुछ को सांस लेने में परेशानी होती है, कुछ लोगों को ऑटो इम्यून बीमारियां हो जाती हैं, जिनमें शरीर खुद से ही लड़ने लगता है और अपनी ही कोशिकाओं को नष्ट करने लगता है। कुछ लोगों को न्यूरोलॉजिकल परेशानियां होने लगती हैं। कुछ दिल के मरीज बन जाते हैं। कई मरीजों को डायरिया हो जाता है। आमतौर पर ये लक्षण कम से कम 4 हफ्तों तक बने रहते हैं। कभी-कभी इससे भी ज्यादा दिनों तक ऐसा हो सकता है और ठीक होने में 4 से 6 महीने तक भी लग सकते हैं। इस संक्रमण से ठीक हो जाने के बाद सबसे बड़ी समस्या थकावट की है।
अतः संक्रमण से ठीक होने के बाद भी बहुत सावधानी की आवश्यकता है। भारत में 30 लाख से अधिक कोरोना वायरस के संक्रमण के मामले सामने आए हैं और हर रोज इस वायरस के औसतन 60 हजार मरीज आ रहे हैं। मरने वालों का आंकड़ा 58 हजार से पार जा चुका है। फिर भी खुशी की बात यह है कि भारत में रिकवरी रेट 75% तक पहुंच चुका है। यानी 30लाख मरीजों में से 22 लाख ठीक भी हो चुके हैं। लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं है कि एक बार ठीक होने के बाद यह संक्रमण दोबारा नहीं होगा। इस पर अनेकों शोध चल रहे हैं।
इसी साल अप्रैल में हांगकांग के 33 वर्षीय एक व्यक्ति को कोरोना वायरस का संक्रमण हुआ और कुछ दिनों में वह ठीक भी हो गया। लेकिन इसी महीने में जब वह यूरोप से वापस लौटा तो वह एक बार फिर से इस वायरस से संक्रमित हो चुका था। इसकी पुष्टि एयरपोर्ट में जांच में हुई। हांगकांग में इसको कोविड-19 का पहला रिइन्फेक्शन केस कहा जा रहा है ।यूनिवर्सिटी ऑफ हांगकांग के वैज्ञानिकों ने जांच के दौरान देखा कि इस व्यक्ति में दोनों बार अलग-अलग प्रकार के कोरोना वायरस का संक्रमण हुआ है।पहली बार में कोविड-19 के लक्षण पैदा हुए, किंतु दूसरी बार में कोई लक्षण दिखाई नहीं दिए। यानी दूसरी बार का संक्रमण पहले से कमजोर था। अतः एक बार संक्रमित हो जाने पर ठीक हो जाने के बाद भी बहुत अधिक सावधानी रखने की आवश्यकता होती है।

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