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कोरोना से लम्बी लड़ाई के लिये हमेशा रहना पड़ेगा तैयार।

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वरिष्ठ साहित्यकार – कुशलेन्द्र श्रीवास्तव

कोरोना की लड़ाई तो लम्बी चलने वाली है अब यह महसूस किया जाने लगा है । भारत ने कोरोना से जंग की शुरूआत जिस दमखम के साथ की थी शनैः शनैः वह ठंडी पड़ती दिखाई देने लगी । जिस 24 मार्च 2020 को कोरोना से लड़ने के लिए सम्पूर्ण लाकडाउन की घोषणा की गई थी उसके चरण तो बढ़ते गये पर कोरोना को रोक पाना संभव नहीं हो पाया । लाकडाउन को यथा संभव सख्त बनाया गया । यह शायद भारत के इतिहास में पहली बार हुआ होगा कि देश में न केवल ट्रेनों के पहिए रोक दिए गए वरन आवागमन के सभी साधन जिसमें हवाई जहाज से लेकर बसे भी शामिल हैं रोक दी गई । आम व्यक्तियों को अपने घर के आंगन में या मकान की छतों पर खड़े होने तक की मनाही कर दी गई । जिसकी निगरानी ड्रोनों से की गई । सारा देश के दिन के उजाले में सन्नाटे की भेंट चढ़ गया और रात के अंधियारे मेें भुतहा दिखाई देने लगा । सड़कों पर केवल पुलिस की गाड़ियां दोड़ती और चीखती दिखाई देने लगी । देश में सारा कामकाज बंद हो गया । फैक्ट्रियां बंद हो गई, निर्माण कार्य बंद हो गए सरकारी आफिस से लेकर प्राइवेट आफिस सभी बंद हो गए । प्लेटफार्म पर खड़ी ट्रेनों के के डिब्बों को कोरोन्टाइन सेन्टर बना दिया गया । जिन्दगी की रफ्तार रूक गई । लगभग साठ दिनों तक ऐसी ही स्थिति बनी रहीं । उम्मीद थी की आम व्यक्तियों के घरों में कैद हो जाने से कोरोना थम जायेगा । इसी भरोसे पर प्रधानमंत्री जी के आव्हान पर न केवल लोगों ने एक निश्चत समय पर थाली, घंटी या शंख बजाकर डाक्टरो के मनोबल को बढ़ाने का काम किया वरन अपने आंगन में दीप प्रज्जवलित कर कोरोना के अंधकार को उजियारे में बदलने की भी प्रयास किया । पर कोरोना जीतता गया और आम व्यक्ति हारता चला गया । सरकार दससे अधिक कुछ कर भी नहीं सकती थी । हालांकि वह कोई विशेष रणनीति बनाती तो शायद आम व्यक्तियों की परेष्रानी कुछ कम जरूर होती पर यह तो तय है कि कोरोना तब भी गतिशील ही रहा आता । लाकडउन के चलते भारत के विकास की यात्रा थम चुकी थी । गरीब परिवारों के लिए तो सरकारी मदद के अलावा समाजसेवी संस्थायें भी आगे आ रहीं थीं पर मध्यमवर्गीय परिवार आर्थिक तंगी से जूझने लगा । सरकार ने चार बार लाकडाउन इस उम्मीद से आगे बढ़ाया कि कोरोना शर्म से खत्म हो जायेगा पर कोरोना ने तो बेशर्मी को ओढ़ लिया था । हमारे देश में वाकई कोरोना से लड़ने के लिये को नीति और संसाधन नहीं थे । हमारे पास तो मास्क तक नहीं थे और न ही सेनेटाइजर की प्र्याप्त व्यवस्था थी । बहुत कुछ समय तो हमें केवल कोरोना से बचाव के संसाधन जुटाने में ही लग गया । पीपीईकिट को बनाया जाने लगा, मास्क बनाये जाने लगे और सैनेटाइजर बनाये जाने लगे । अस्पतालों को कोरोना के मरीजों के हिसाब से तब्दील किया जाने लगा साथ ही कोरोन्टाइन सेन्टरों की श्रंखला भी बनाई गई । तब तक लाकडाउन तो बढ़ाकर आम व्यक्तियों को कैद ही रखना पड़ा । पर आम आदमी का धीरज भी साथ छोड़ने लगा और सरकार का भी । लाकडाउन -4 के खत्म होने तक सरकार और आम व्यक्तियों की सहनशीलता जबाब देने लगी । सरकार की हालत ‘‘निगलत उगलत पीर घेनरी’’ जैसेी हो चुकी थी । कोरोना देश में जिस हालत में था दसके चलते लाकडाउन तो आगे बढ़ाया जाना चाहिये था पर सरकार के पास लाकडाउन बढ़ाने की हिम्मत नहीं थी । कोरोना के केश कम जांच होने के बाबजूद प्रतिदिन हजारों की संख्या में बढ रहे थे और देश भर में कोरोना के आंकड़े लाखों की संख्या के पार पहुंच रहे थे । यह वह दौर भी था जब लाखों मजदूर अपने अपने घर वापिस लौटने के लिए अपने परिवार के साथ सड़कों पर दयनीय हालत में दिखाई दे रहे थे । लाकडाउन के चलते जिन सड़कों को सूना होना चाहिये था उन सड़कों पर बेबस मजूदर अपने सिर पर गठरी बांधे लौटते दिखाई दे रहे थे । मजदूरों की संख्या इतनी अधिक थी कि उसे सम्भल पाना संभव नहीं था । सरकार इन मजदूरों से कोरोना के फैलने के अंदेशे से भी भयभीत थी और विपक्षी दलों के निशाने पर आ जाने के भय से भी भयभीत थी । उसकी हालत चक्रव्यूह में फंसे अभिमन्यु की तरह हो चुकी थी । न कोरोना थम पा रहा था और न हालात ।
लाकडाउन 4 के बाद उसे आगे बढ़ाने की हिम्मत सरकार के पास नहीं बची थी । इसलिये पहिले अघोषित रूप से और फिर घोषित रूप से अनलाॅक 1 को सामने लाना पड़ा वो भी उस समय जब देश में कोरोना के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही थी । जिस तरह बगैर किसी योजना के लाकडाउन घोषित किया गया था लगभग वैसे ही बगैर योजना के आनन-फानन में अनलाक कर दिया गया । परिणमतः अनलाक भी लाकडाउन की तरह सुविधा देने की बजाय परेशानी का सबब ही बना । मजदूरों को घर पहुंचाने के लिये थमे पड़े ट्रेनों के पहियों को गति दी गई और ‘‘श्रमिक ट्रेन’’ चलाई गई । कुछ घरेलू उड़ानों को भी प्रारंभ किया गया । ट्रेनों और घरेलू उड़ानों को लेकर अफरातफरी मच गई । इसी अफरातफरी के चलते ही मुबंई से गोरखपुर के लिये निकली ट्रेन बजाए गोरखपुर पहुंचने के राउरकेला पहुंच गई ।
बदहवासी का आलम यह था कि कौन सी ट्रेन कब कहां जायेगी यह खुद विभाग के जिम्मेदार अधिकारी नहीं बता पा रहे थे । किस रूट से होकर ट्रेन गुजरेगी, किस स्टेशन पर ट्रेन रूकेगी, चूंकि प्लेटफार्म और ट्रेनों में बिकने वाले खाद्य सामान पर रोक थी इसलिये ट्रेन में यात्रा करने वाले लोगों के खाने और पानी की क्या व्यवस्था होगी कुछ भी तय नही किया गया । कुछ ऐसी ही स्थिति घरेलू विमान उड़ानों की रही । कुछ विमान तो ठीक से अपने गंतव्य तक पहुंच गए पर बहुत सारे उड़ान ही नहीं भर पाए । 25 मई को मुबंई एयरपोर्ट से 82 घरेलू उड़ानों को बिना बताए ही रद्द कर दिया गया । जिन लोगों ने बड़ी उम्मीदों से अपना टिकिट बुक कराया था वे कितने हताश और निराश हुए होगें अंदाजा लगाया जा सकता है । हडबड़ी में खोले गये आवागमन के संसाधनों में बसों का परिचालन भी शामिल किया । हालांकि यह राज्य के स्तर पर लिया जाने वाला निणर््ाय था । पर कुछ राज्यों ने अपने राज्यों में बसें भी चलाना प्रारंभ कर दिया ।
कोरोना की अधूरी लड़ाई के चलते ही अनलाॅक 1 में आवागमन के साधनों के साथ ही साथ बाजार खोल दिए गये । जो जनता विगत दो माहों से अपने अपने घरों में कैद थी अनलाॅक होते ही सड़कों पर घूमती दिखाई देने लगी । बाजारों पर रौनक तो आ गई पर कोरोना के मरीजों की संख्या भी बढ़ती दिखाई देने लगी । बहुत कुछ तो ई पास के कारण अन्य राज्यों से आए लोगों के चलते कोरोना के संक्रमण फैलने से परेशान गली मोहल्ले वाले अब बाजार क,ी भीड़भाड़ से भयभीत होते दिखाई देने लगे । यह तथ्य भी लगभग स्पष्ट है कि कोरोना में जहां चिकित्सा के कारण डाक्टर और चिकित्सकीय स्टाफ दिन रात गंभीरता से संघर्ष कर रहा था वही प्रशासन और शासन के स्तर पर यह लड़ाई पी एम, सी एम और डी एम लड़ रहे थे ।बाकी तो सभी लोग केवल बाल की खाल निकालने में लगे रहे । लाकडाउन के दौरान भी डीएम को मेहनत करनी पड़ी और अनलाक के दौरान भी । एक भी कोरोना का मरीज सामने आने पर प्रशासन को लम्बी कवायद करनी पड़ती है । यी कवायद न केवल मरीज को लेकर होती है वरन संक्रमण न फैले इसके लिये भी होती है । मोहल्लें को लांक करना और फिर उन लोगों को दैनिक आवश्यकता का सामान उपलब्ध होता रहे इसकी व्यवस्था करना, सभी अड़ोस-पड़ोस वालों की जांच कराना जैसी कवायद शामिल है । अनलांक घोषित होते ही जैसे बाजारों में भीड़-भाड़ बढ़ी वैसे ही प्रशासन की परेशानियां भी बढ़ने लगीं । सरकारी आफिस भी खुल गए और प्राईवेट आफिसों में भी कामकाज होने लगा । धर्मस्थल भी खोल दिए गए और इन स्थलों पर भी भीड़-भाड़ बढ़ने लगी । केवल शिक्षण संस्थायें और सिनेमाघर नहीं खोले गए । आम आदमी कोरोना के बढ़ते आंकड़ों के बाबजूद भी अनलाॅक के निर्देशों का पालन नहीं कर रहा । प्रशासन के सामने यह गंभीर संकट माना जा सकता है । प्रशासन की सतर्कता के बाबजूद भी कोरोना मरीजों की संख्या में वृद्धि हुई । देश के कई जिलों में डीएम ने अपने जिले में लांकडउान को बढ़ा दिया । ठीक ऐसे ही कुछ राज्यों ने भी कोरोना के मरीजों की संख्या को बढ़ता देख अपने अपने राज्यों में लाॅकडाउन को बढ़ाया । कुछ राज्यों ने तो जुलाई तक लाकडाउन बढ़ा दिया है । जाहिर है कि केन्द्र सरकार अनलाक करने के दबाब में थी वरना अभी लाॅकडाउन खुल पाने की स्थिति नहीं थी । यह तो स्पष्ट होता गया कि सरकार ने कोरोना की आधी लड़ाई के बीच में ही घुटने टेक दिए हैं ।

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