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क्या उनका मेडिकल जाना ही मौत की वजह बना?

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मेडिकल कॉलेज अव्यवस्थाओं का गढ़ बन गया है।

जबलपुर। उन्हें मेडिकल कॉलेज ले तो गए तो थे, केवल कोरोनावायरस टेस्ट करवाने।लेकिन जिस बीमारी से पीड़ित है उसका इलाज किए बगैर परिजनों को उनका, मृत शरीर लेकर आना पड़ा।
क्योंकि लकवे से गंभीर रूप से पीड़ित थे और जिससे निजी अस्पताल में उनका इलाज होना था। उसने उन्हें मेडिकल कॉलेज से कोरोनावायरस टेस्ट करवा कर आने की सलाह दी। लेकिन मेडिकल कॉलेज में उन्हें भर्ती कर लिया गया। वेंटिलेटर की आवश्यकता पड़ी पर, कॉलेज में वेंटिलेटर नहीं था।ऑक्सीजन पर रखा गया, कुल मिलाकर उन्हें जिस इलाज की जरूरत थी। और जिसे इलाज के जरिए उनकी जान बच सकती थी‌। उस इलाज से उन्हें वंचित कर दिया गया और उनकी मृत्यु हो गई।

श्याम लाल विश्वकर्मा जो कि अब स्वर्गीय हो चुके हैं। उम्र 53 वर्ष और पूर्वी करिया पाथर के निवासी थे। उनके परिजनों के द्वारा, पैरालाइसिस की शिकायत होने पर, 22 अगस्त को विक्टोरिया हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। वहां से मेडिकल रेफर कर दिया गया। लेकिन मेडिकल में उचित व्यवस्था न होने के कारण 23 अगस्त को उन्हें डिस्चार्ज कराकर अनंत हॉस्पिटल ले जाया गया।
अनंत हॉस्पिटल में एंबुलेंस के भीतर ही उनका सिटी स्कैन किया गया। रिपोर्ट सही आने पर अनंत हॉस्पिटल के द्वारा यह कहा गया कि, हम इसका इनका इलाज तो करेंगे, लेकिन पहले आप इनका कोविड-19 टेस्ट मेडिकल कॉलेज में करवा कर आइए।
कुल मिलाकर उन्हें दोबारा मेडिकल कॉलेज ले जाया गया। वहां उन्हें भर्ती कर लिया गया। उनकी हालत बिगड़ने पर वहां के डॉक्टर ने कहा कि इन्हें वेंटिलेटर की आवश्यकता है, इनको परंतु वो उनके पास उपलब्ध नहीं है। और ऑक्सीजन में ही रखा गया। 28 अगस्त को उनकी मृत्यु हो गई।
लेकिन व्यवस्था की करामात देखिए जनाब कि, आज भी उनकी कोविड टेस्ट की रिपोर्ट नहीं आई है। यहां तक की मरीज को कपड़ों में भर्ती किया गया था। उनके परिजन, आज भी उन्हीं कपड़ों में, उनके मृत शरीर को लेकर जा रहे हैं। जबकि मरीज के अंतर्वस्त्र परिजनों द्वारा समय पर दिए गए थे।
इसे व्यवस्था का दोष कहे या परिजनों की किस्मत, या फिर यह मान ले कि स्वर्गीय श्याम लाल विश्वकर्मा की मृत्यु ही आ गई थी। जिसे टाला नहीं जा सकता था। क्योंकि हमारे सिस्टम में इतनी दम नहीं है कि समय पर वह किसी मरीज को इलाज मुहैया करा सके। यदि मेडिकल कॉलेज में केवल कोविड टेस्ट की रिपोर्ट समय पर आ गई होती। तो संभवत अनंत हॉस्पिटल में भर्ती कराए जाने पर। उनकी जान बच सकती थी। अब इस लापरवाही का जिम्मेदार कौन है? और क्या लापरवाही के जिम्मेदार व्यक्ति को कभी सजा हो पाएगी? यह एक यक्ष प्रश्न है। जो संभवत बना रहेगा और व्यवस्था के गाल पर तमाचा मारता रहेगा। तब तक जब तक कि कोई जवाब ना मिले। लेकिन हमारी यह कुटिल व्यवस्था इतनी झूठी और घाघ हो गई है। कि अब इसके गाल पर तमाचा मारने की बजाय अगर झिंझोड़ भी दिया जाए तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
मरीज के परिजनों के साथ जन समस्या निवारण संस्थान की तरफ से एडवोकेट सर्वेश कुमार त्रिपाठी थे। जो कि इसके विधि प्रकोष्ठ के नगर अध्यक्ष हैं और कानूनी समिति के में भी हैं। उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर, एसडीएम दीपाश्री गुप्ता को एक ज्ञापन सौंपा। और मेडिकल कॉलेज में व्याप्त अनियमितताओं से अवगत कराया गया है। इस ज्ञापन का क्या असर होगा यह तो आने वाला वक्त बताएगा। लेकिन इस समय दुखी परिजनों के साथ केवल संवेदनाएं हैं। इस अवसर पर सर्वेश त्रिपाठी, कुलदीप कुशवाहा, राहुल गढ़वाल, आकांक्षा सोनी, वीरेंद्र साहू उपस्थित थे।

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