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शारीरिक, मानसिक शक्ति के साथ ही अध्यात्मिक ऊर्जा का द्वारा है नागद्वारी।

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जबलपुर दर्पण/आशीष राय, सम्पादकीय सलाहकार एवं लेखक।


किसी देश या राज्य की भौगोलिक स्थिति, उस स्थान की ऐतिहासिक घटनाओं और आर्थिक विकास को बहुत अधिक प्रभावित करती है। यह अपने नागरिकों और उनके व्यवहार के दृष्टिकोण को भी प्रभावित करती है। भौगोलिक रूप से देश के केंद्रीय स्थान पर स्थित मध्यप्रदेश, वास्तव में भारत के दिल के समान है। अपने केंद्रीय स्थान के कारण इस क्षेत्र पर सभी ऐतिहासिक धाराएं, स्वाभाविक रूप से अपने सुस्पष्ट निशान छोड़ गई। प्रागैतिहासिक काल पत्थर युग से शुरू होता है, जिसके गवाह भीमबेटका, आदमगढ, जावरा, रायसेन, पचमढ़ी जैसे स्थान है।

मध्यप्रदेश का वह प्राकृतिक सौंदर्य का स्थान पचमंडी, यहाँ की पहाड़ियाँ जो न जाने कई सभ्यताओं की गवाह है। गुफाओं से लेकर वास्तुकला से सजे किलों, महलों, मंदिरों, पायदानों और अन्य असंख्य स्मारकों के साथ इतिहास ने कई प्रतिष्ठित निशान यहां रख छोडे है। उन्ही में से एक ऐसा स्थान जो अपने नाम के अनुरूप ही अद्भुत,अकल्पनीय है। नागलोक का द्वार की मान्यता के आधार पर इसे नागद्वारी कहा जाता है। आदिवासी समुदाय की मान्यता के अनुरूप उनके आराध्य बड़ादेव भगवान शिव ने यहां स्वर्ण द्वार बनाया है। यहां से नागलोक के दर्शन होते हैं। साथ ही इस नागद्वारी यात्रा करने से शारीरिक व मानसिक शक्ति के साथ ही अध्यात्मिक ऊर्जा पाप्त होती है। इस यात्रा को पूरा करने पर स्वर्ग के दर्शन की अनुभूति सी प्रतीक होती है। यहां पहाड़ पर अनेक गुफा व मंदिर हैं। जिनमें भगवान शिव व नागदेव की प्रतिमाएं स्थापित हैं। लोग यहां अपनी मन्नातें लेकर आते हैं।
पचमढ़ी से करीब 20 किलोमीटर का दुर्गम पहाड़ी रास्ता पार करने के बाद इस जगह पर पहुंचा जा सकता है। यहां के बड़े-बड़े पहाड़ और गुफा का अद्भुत दृश्य देखकर लगता है जैसे हम अमरनाथ यात्रा ही कर रहे हों। कदम-कदम पर खतरा तो रहता ही है, लेकिन प्राकृतिक सौंदर्य और रोमांच के लिए यह श्रद्धालुओं एवं दर्शनार्थियों पहली पसंद है। आदिवासी समुदाय के लिए अमरनाथ यात्रा जैसे महत्व की पचमढ़ी की नागद्वारी यात्रा होती है। इस पवित्र यात्रा पर हर साल 5 लाख से अधिक श्रद्धालु पहुंचते थे। सावन माह के कृष्ण पक्ष में दस दिन तक यह यात्रा चलती है। पचमढ़ी से पैदल करीब 12 किमी तक दुर्गम पहाड़ियों के मार्ग से श्रद्धालु पवित्र नागद्वार गुफा मंदिर पहुंचते हैं। इस यात्रा के आरंभ होने का कोई लिखित दस्तावेज नहीं है। यहां कोरकू, गोंड व गोली आदिवासी समुदाय के लोग प्राचीनकाल से निवासरत हैं। पचमढ़ी के राजा भभूत सिंह ने 1857 में यहां ब्रिटिश घुसपैठियों को परास्त करते हुए खदेड़ दिया था। बाद में धोखे से ब्रिटिश कैप्टन जे.फॉरसोथ ने राजा भभूत सिंह की हत्या करके पचमढ़ी को सेना की छावनी बना दिया था। यहां की विशाल प्राकृतिक संपदा को देखते हुए कैप्टन फॉरसोथ ने 1860 में इसे संरक्षति वन क्षेत्र घोषित कर दिया। तब से यह इलाका सरकार के अधीन संरक्षति है। यह पूरा इलाका पचमढ़ी अभयारण्य, बोरी अभयारण्य और सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान के अंतर्गत आता है। सामान्य दिनों में यहां लोगों की आवाजाही पर प्रतिबंध है, लेकिन नागद्वारी यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को आवागमन की पूरी छूट रहती है। होशंगाबाद जिले में सतपुड़ा की रानी के नाम से प्रसिद्ध पचमढ़ी में धूपगढ़ और गुप्त गंगा दो मार्गों से नागद्वारी यात्रा आरंभ होती है। धूपगढ़ मप्र की सबसे ऊंची 1352 मीटर पहाड़ी है। इसलिए इस मार्ग से कम लोग यात्रा करते हैं। ज्यादातर श्रद्धालु गुप्त गंगा मार्ग से यात्रा करते हैं।
साथ ही इसे खौफनाक भी माना जाता है क्योकि करीब बीस किलोमीटर के इस बियाबान रास्ते में कहीं कोई बस्ती नहीं है। हर कदम पर सांप और बिच्छू ही रहते हैं। यानी किसी भी घटना के दौरान आपको कोई मदद नहीं मिल सकती है। हालांकि प्रशासन आने वाले लोगों की संख्या और परेशानियों को देखते तमाम तरह की व्यवस्थाएं करने लगा है। यात्रा के दौरान अक्सर ही ऐसे जीव नजर आते रहते हैं। खास बात यह है कि इस क्षेत्र में भरपूर जड़ी-बूटियां देखने को मिलती है। इसके साथ ही यहां का प्राकृतिक सौंदर्य भी लोगों को लुभाता है। यहां पर कई प्रकार के झरने भी हैं। कदम-कदम पर गहरी खाई भी होने से रोमांच बरकरार रहता है। कई स्थानों पर रस्सी का सहारा लेकर गुजरना पड़ता है। इस क्षेत्र को खतरनाक और खौफनाक माना जाता है। यह क्षेत्र सालभर में सिर्फ दस दिनों के लिए खोला जाता है। श्रावण मास में खुलने वाला यह नागद्वारी नागपंचमी के आसपास तक चलता है। इस क्षेत्र का धार्मिक महत्व अधिक होने के कारण इस दस दिनों के भीतर पांच से दस लाख से अधिक लोग पहुंच जाते हैं। यहां होशंगाबाद, नरसिंहपुर, छिंदवाड़ा, बैतूल, हरदा और प्रदेश के अन्य जिलों के अलावा महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, गुजरात, राजस्थान इत्यादि प्रांतों से भी श्रद्धालु आते हैं। इस साल 5 जुलाई से सावन माह के आरंभ होते ही नागद्वारी यात्रा शुरू होना थी। लेकिन कोरोना काल के चलते पहली बार इस यात्रा पर रोक लगाई गई है। प्रशासन द्वारा रोक लगाने से सभी मार्गों पर पुलिस ने बैरिकेड्स लगा सतत निगरानी की जा रही हैं।

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