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हीरे की तरह तराशा और जीवन को आसान बनाया गुरु ने

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सतना। ड्रा. रामअवतार विश्वकर्मा ने कुछ अनमोल बिन्दुओ से गुरु पूर्णिमा का संदेश दिया है गुरु पूर्णिमा कि इस मधुर पावन बेला में मेरे जीवन का कर्म क्षेत्र, गुरु पूर्णिमा की आभा से जीवन की नई कड़ी से प्रकाशित हो रहा है कहा जाता है “अब लौ नसानी अब न नसैहौ” आज के पवित्र मधुर बेला के शुभारंभ में हमेशा बुराइयों का परहेज करूंगा। आज गुरु पूर्णिमा है जिनकी दी हुई विद्या से मेरे जीवन में प्रकाश आया है मेरा पथ प्रदर्शक बनकर जीवन जीने की कला सिखाई है ऐसे गुरु को मैं ध्यान करके अपने माता-पिता के चरण छू कर बारंबार प्रणाम करता हूं ।कुछ अनमोल बिंदु जो हमेशा व्यक्ति को आलोकित करते हैं।
(1)जिस प्रकार हम अपने दुकान के आय-व्यय का हिसाब रखते हैं उसी प्रकार हमारे कर्तव्य का हिसाब भी इस संसार को चलाने वाला परमात्मा रखता है।
(2)डॉक्टर का कर्तव्य होता है की मरीज को देखते समय यह समझना चाहिए कि यदि इस बिस्तर में मैं होता या मेरा अन्य कोई होता तब मैं क्या करता ।
(3) मरीज की ऐसी सेवा करना चाहिए की वह खुश होकर पता नहीं हमें क्या आशीर्वाद दे देगा।
(4)कोई जरूरी नहीं है की दुआएं हमें सिर्फ मंदिरों से ही मिलती हैं।
अर्थात सात्विक विचारों से कर्तव्यनिष्ठ होकर भी अपने कर्तव्य की मंजिल को पाया जा सकता है।
(5) अपने जीवन में ऐसा कर्तव्य ना करें कि हमें भी मरीजों जैसा बिस्तर मिले।

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