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कोरोना महामारी के दौरान किये जा रहे राहत कार्यों हेतु प्रकाश निमराजे का हुआ सम्मान

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ग्वालियर।दूसरों के माथे पर चन्दन लगाने वालों की अपनी उंगलियां भी महक जाती हैं, इसी तरह जो लोग दूसरों की भलाई बिना किसी स्वार्थ के करते हैं उनकी अपनी ख्याति भी दूर-दूर तक जाती है. जी हाँ हम बात कर रहे हैं गोपाल किरण सामाजिक संस्था ग्वालियर के अध्यक्ष श्रीप्रकाश निमराजे की जिन्हें विगत दिनों राजस्थान की संस्था “उम्मीद सोशल वेलफेयर डेवलपमेंट सोसायटी जयपुर” एवं पड़ोसी देश नेपाल की संस्था “गाँधी पीस फाउन्डेशन नेपाल” ने प्रशंसा पत्र देकर सम्मानित किया है.
श्री निमराजे विगत २५ वर्षों से सामाजिक कार्यों के जरिये गरीब और वंचित वर्ग के उत्थान में लगे हुए हैं. जब कोरोना (कोविड 19) महामारी से बचाव हेतु सरकार द्वारा पूरे देश में अचानक से लॉकडाउन घोषित कर दिया गया और सभी नागरिक अपने अपने घरों में कैद हो गए सभी के काम धंधे बंद हो गए इस स्थिति में हालत इतने बदतर हुए की गरीब और वंचित वर्ग के लोग जोकि रोज के कमाने-खाने पर निर्भर थे उनके घर में भोजन सामग्री पूरी तरह से खत्म हो गयी. अब उनके पास न तो भोजन था और न पैसे थे. ऐसी स्थित में लोगों को भूख से बचाने के लिए गोपाल किरण सामाजिक संस्था के टीम के सदस्य आगे आये और ग्वालियर शहर की बस्तियों में जरूरतमंदों और हाईवे पर अपने घरों को वापस लौट रहे प्रवासी मजदूरों के लिए भोजन सामग्री और पका हुआ भोजन जुटाने और वितरण का काम शुरू किया. टीम के सभी लोगों का एक ही विचार था कि, कोई भी भूखा न सोये, संस्था द्वारा भोजन और राशन वितरण का काम लॉकडाउन के पहले चरण की शुरुआत से ही किया जा रहा है और आजतक निरंतर जारी है, संस्था द्वारा किये जा रहे प्रयासों की सराहना स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक की जा रही है, संस्था द्वारा किये जा रहे इन मानवीय प्रयासों के लिए राजस्थान की संस्था “उम्मीद सोशल वेलफेयर डेवलपमेंट सोसायटी जयपुर” एवं पड़ोसी देश नेपाल की संस्था “गाँधी पीस फौंडेशन नेपाल” द्वारा श्री निमराजे को प्रशंसा पत्र प्रदान किये गए हैं.
स्वैच्छिक संस्थाओं ने सदैव ही समाज की बेहतरी के लिए अच्छे काम किये हैं और आज भी कर रही हैं. आजादी के पहले भी महात्मा ज्योतिबा फुले और डॉ. आंबेडकर द्वारा किये गए कार्यों को भुलाया नहीं जा सकता है, शिक्षा के क्षेत्र में महात्मा फुले जी ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है सबसे पहले तो उन्होंने अपनी पत्नी सावित्री बाई फुले को पढ़ाया इसके बाद बालिका शिक्षा को बढ़ाने के लिए काम किया और अपना पूरा जीवन समाज के लिए दिया. प्लेग की महामारी के दौरान सावित्री बाई और ज्योतिबा फुले ने बच्चों और महिलाओं की देखभाल की जिस कारण सावित्री बाई खुद भी संक्रमित हो गयीं और उसी से उनकी मृत्यु हुई थी. लेकिन बालिका शिक्षा की जो अलख उन्होंने जगाई थी वह आज भी जारी है. सामाजिक और विकास के कामों को आगे बढ़ाने में स्वयंसेवी संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है इसी विचार के साथ संस्था अपनी भूमिका निभाते हुए अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर रही है.
निमराजे जी बताते हैं कि बिना किसी पूर्व सूचना के, बिना तैयारी के लॉकडाउन किया गया, एक दिन जनता कर्फ्यू और अगले दिन से लॉकडाउन कर दिया गया. बस्तियों में कई ऐसे मजदूर हैं जिनके पास दूसरे दिन के लिए खाने को नहीं होता है वे रोज कमाते खाते हैं, अचानक से आई इस विपदा से सभी परेशान थे दुकानें बंद हो गयी थीं, रोड पर निकलने पर पुलिस डंडे मार रही थी, इन स्थितियों को समझने के लिए कुछ लोगों ने हमें फोन किया तो कुछ ऑफिस तक आ गए, हर एक का एक ही सवाल था कि काम धंधा कब शुरू होगा, हमारे घर में न तो खाने का सामान है और न ही पैसा है, बस एक ही चिंता सता रही थी कि आखिर कैसे जियेगें. इनमे से अधिकांश लोग ग्वालियर से बाहर के हैं और किराये के मकानों में रह कर मजदूरी कार्य या छोटा धंधा करते हैं. कई लोगों ने अपनी समस्याओं को लेकर हमें और टीम के सदस्यों को फोन किये, कई लोग अपनी समस्याओं को लेकर संस्था के कार्यालय भी आये. इस स्थिति में शुरुआत में तो व्यक्तिगत टीम के सदस्यों ने पहले तो कुछ लोगों की व्यक्तिगत मदद की परन्तु स्थितियां बेहतर होती नहीं दिखीं तो फिर टीम के सदस्यों ने तय किया कि हम लोगों की जरूरत के अनुसार मदद करेंगे जिन्हें पके हुए भोजन की जरूरत होगी उन्हें पका हुआ भोजन देंगे और जिन्हें सूखे राशन की जरूरत होगी उन्हें राशन देंगे, इस हेतु संस्था द्वारा एक हेल्पलाइन नंबर जारी किया गया, जिस पर कोई भी जरूरतमंद कॉल करके भोजन या राशन की मांग कर सकता है, संस्था द्वारा कॉल आने पर उनके कॉल को सुना जाता है और उसके अनुसार बतायी जगह पर संस्था के कार्यकर्ता द्वारा मदद पहुंचाई जाती है साथ ही लोगों को कोरोना से बचाव की जानकारी दी जाती है और हाथों साफ करने के लिए सेनेटाइजर और मास्क भी वितरित किये जाते हैं। संस्था द्वारा शुरू किये गए ये कार्य आज भी जारी हैं. ये पूरा अभियान हम प्रशासन (जिला कलेक्टर और क्षेत्र के इंसिडेंट कमांडर) की अनुमति से संचालित कर रहे हैं, इंसिडेंट कमांडर या नायब तहसीलदार जी का फोन आने पर हम प्रवासी मजदूरों के लिए रात को ११ बजे भी भोजन पहुँचाते हैं.
ग्वालियर के संदर्भ में बात की जाये तो लोग ये कहते हैं कि ये बड़ी बात है कि हम लोग इतने लंबे समय तक इस अभियान को चला पाए, इस निरंतर प्रयास में हमारे साथ सहयोगियों की संख्या निरंतर बढ़ती रही है, सामाजिक कार्यों में रूचि रखने वाले लोग इस अभियान में पूरी निष्ठा और सेवाभाव से जुड़ रहे हैं, ५० से अधिक टीम के सदस्य इस कार्य में सघन रूप से लगे हुए हैं और अपनी क्षमता के अनुसार मदद कर रहे हैं, कुछ लोग राशि उपलब्ध करने में, कुछ राशन जुटाने में, कुछ लोग पकाने में, कुछ पैकिंग में तो कुछ लोग वितरण में सहयोग कर रहे हैं, संस्था से जुड़े मेडिकल प्रोफेशनल बीमार लोगों को दवाई देने के साथ साथ गंभीर केस को अस्पताल पहुंचाने में भी सहयोग कर रहे हैं. इस टीम में छात्र से लेकर रिटायर्ड आई.ए.एस. अधिकारी भी शामिल हैं.
निमराजे जी ने बताया कि लोकडाउन के दो-तीन दिन बाद एक महिला हमारे पास आयी, उस महिला ने बताया कि उसका लड़का ठेला लगाता था, किन्तु कर्फ्यू की वजह से काम पूरी तरह बंद हो गया, घर में उसकी बहू बीमार है साथ ही बहू का छोटा बच्चा भी बीमार है, सबसे पहले हमने उस महिला को भोजन कराया, बच्चों के लिए दूध उपलब्ध कराया और दवा आदि खरीदने के लिए कुछ राशि भी दी इसके साथ ही उनके घर पर राशन (आटा, दाल, चावल, नमक, तेल, मसाले) आदि भिजवाए. उसके बाद से आज तक हमारे यहाँ से २५० से ३०० पैकेट प्रतिदिन वितरित किये जाते है, प्रशासन हमें लिस्ट भेजता है और हम भोजन के पैकेट पहुंचाते हैं, भोजन की स्वच्छता और गुणवत्ता का पूरा ध्यान रखा जाता है.
संक्रमण से बचाव के लिए हमने हर व्यक्ति को मास्क उपलब्ध कराना शुरू किया शुरुआत में जब हम पर्याप्त संख्या में मास्क उपलब्ध नहीं करा पाए तो समूह से जुड़ी महिलाओं ने मास्क बनाने में सहयोग किया, इस काम में समूहों के जुड़ जाने के बाद से हमारे पास पर्याप्त मास्क होने लगे इसके बाद से हम लोग भोजन और राशन वितरण के साथ लोगों को सेनेटाईज करते हुए जिन लोगों के पास मास्क नहीं होते हैं उन लोगों को मास्क भी देते हैं. टीम के कुछ सदस्य बस्तियों में कोरोना से बचाव के लिए लोगों को जागरूक भी कर रहे हैं जैसे- घर के अंदर ही रहना, भीड़ वाली जगहों पर न जाना, अन्य व्यक्ति से कम से कम ६ फीट की दूरी रखना, साबुन और पानी से कम से कम २० सेकेंड तक हाथ धोना, और स्वस्थ्य शिक्षा से सम्बंधित बातें बताते हैं.
इस महामारी के दौरान चलाये गए अभियान से हमें ये सीख मिली कि, किसी जरूरतमंद की मदद करने के लिए सरकारी प्रक्रिया या अन्य प्रक्रिया में पड़कर लंबे समय तक इंतज़ार नहीं किया जा सकता है, इसके लिए हमें तत्काल मदद उपलब्ध करानी होती है इन स्थितियों को ध्यान में रखते हुए संस्था द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर आपदा राहत कोष बनाया जा रहा है, ताकि जरूरत होने पर लंबी प्रक्रियाओं में ना पड़ते हुए तत्काल मदद उपलब्ध करा सकें.
संस्था द्वारा लोक डाउन के 56 वें दिन तक कुल १2००० कपड़े के मास्क, ३०० पैकेट भोजन प्रतिदिन वितरित किये गए. ७०० परिवारों को राशन किट उपलब्ध कराया गया है. इसके साथ ही ग्वालियर से गुजर रहे पलायन वाले मजदूरों को भोजन कराना, सैनिटाइज करना, मास्क वितरण आदि की संख्या तो हजारों में है, इनमें से करीब ८० से १०० लोगों को नगद राशि की मदद भी की गयी है.
ओरछा निवासी राजकुमार जी परिवार सहित फसल कटाई के लिए भिंड जिले के अटेर ब्लाक में गए थे, वहां से फसल कटाई के दौरान ही लोकडाउन हो गया, और जिसके खेत में काम कर रहे थे उसने इनको कोई पैसा नहीं दिया तो खाली हाथ ही ये लोग अपने घर ओरछा के लिए पैदल चल दिए. ग्वालियर में मजदूरों को भोजन कराते समय राजकुमार जी से हमारी मुलाक़ात हुई, पुलिस की उपस्थिति में हमने उनके पूरे परिवार को सेनिटाइज किया, उन्हें भोजन कराया इसके साथ ही राजकुमार ने अपनी व्यथा भी सुनाई, फिर आगे के सफर पर जाते समय हमने उनको कुछ रूपए भी दिए ताकि रास्ते में जरूरत पड़ने पर काम आ सकें. घर वापस लौट रहे मजदूरों के लिए सहयोग का काम जारी है और लोकडाउन चलने तक निरंतर जारी रहेगा.
राजस्थान के कोटा का रहने वाला एक मजदूर ग्वालियर में होटल पर काम करता था, जब लोक डाउन हुआ तो शुरूआ़त में तो होटल मालिक उसका फोन उठा लेता था उससे बात करता था परन्तु जब इस मजदूर ने अपनी जरूरतों के लिए पैसे मांगे तो उसने फोन उठाना भी बंद कर दिया, उसने अपनी समस्या प्रशासन के सामने रखी तो उसे आलू और ५ किलो राशन नगरनिगम द्वारा उपलब्ध कराया गया. उसके पास पैसे भी नहीं थे, ऐसे में घर में गैस खतम हो गयी तो उसे मकान मालिक ने घर में चूल्हा जलाने से मना कर दिया और कहा कि मकान खाली करा लेंगे. इन विकट परिस्थितियों में वह पैदल चल कर हमारे पास आया और अपनी दिक्कतों के बारे में बताया तो सबसे पहले तो हमने उसे खाना खिलाया, फिर घर के लिए राशन किट दिया और गैस भराने और दवा आदि के खर्च के लिए कुछ रुपये भी दिए. उस व्यक्ति का हमारे शहर में कोई नहीं है, वह राजस्थान का रहने वाला है.
कोरोना से पीडितों की विपदाएं भी अब सामने आने लगी हैं, ग्वालियर का एक व्यापारी जब कोरोना पोजिटिव पाया गया तो उसके बेटों और परिवार के सदस्यों ने उससे मुंह मोड लिया, ये व्यापारी अपना घरवार छोड़ कर अब ग्वालियर के बस स्टैंड पर रहता है, हमारे भोजन वितरण की लिस्ट में ये एक नाम और जुड़ गया है.
संस्था की संरक्षक श्रीमती संगीता शाक्य मानती हैं कि कोरोना का ये संकट समुदाय के लिए एक काला अध्याय है इससे मिली सीख को आने वाली पीढियां तक याद रखेंगी. अभी १-२ साल तक स्थितियां ठीक नहीं रहेंगी, बेरोजगारी बहुत बढ़ेगी इसलिए हमें संभावनाओं को पुन: तलाशना होगा। बहुत सीधे तौर पर दिखाई दे रहा है कि आने वाला समय बीते हुए समय की भांति नहीं रहने वाला है। इस डिजिटल युग में हम पुन: लोकल और वस्तु विनिमय (बार्टर) युग में आ पहुंचे हैं। हर महिला किसी न किसी कार्य में पारंगत हैं। कोई बहन खाना अच्छा बना लेती है, कोई सजावट अच्छी करती है, कोई घरेलू काम अच्छा करती है, कोई पटरा बनाना जानती है, कोई उत्तम अलमारी बनाना जानती है, कोई महिला बीज एकत्र करना जानती है। पुराने कपड़ों से थैले इत्यादि बनाने का कार्य कर रही है। सभी किसी ना किसी कार्य में निपुण हैं। हमारे समूहों से जुड़ी हुयी महिलाएं तो शुरुआत से ही मास्क बनाने का काम कर रही हैं। इसी तरह से सभी महिलाएं घर में ही बैठे-बैठे कोई ना कोई ऐसी चीज अवश्य तैयार करें, जिसमें वे निपुण हों। आपके द्वारा तैयार की गयी सामग्री आपको जीविकापार्जन लिए लोकल बाजार उपलब्ध कराएगी। आप भी अपनी हाथ की बनी वस्तुओं के विक्रय के लिए संपूर्णा से संपर्क कर सकते हैं। हमारी कोशिश रहेगी कि हम तुरंत आपको एक बाजार दें ताकि आपका सामान सबसे पहले कहीं और नहीं यहीं बिक जाए।
संस्था की सचिव जहांआरा कहती हैं कि, कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने की चिंता हमको स्वयं ही करनी पड़ेगी। इस शत्रु को समझदारी से पराजित करना होगा। संकट के इस आपदा काल में एक भी परिवार ना उजड़े। यह ध्यान देना होगा कि प्रत्येक को भोजन मिले और साथ ही साथ सम्मान पूर्वक जीवनयापन के लिए कारोबार मिले। इस समय यह बहुत बड़ी आवश्यकता है। आजकल हम सब घरों में बैठे हैं। क्यों नहीं हम अपनी-अपनी निपुणता का सदुपयोग करके किसी ना किसी कार्य में निपुण होकर पहले की तरह अपने लोकल सिस्टम को मजबूत करें। अभी-अभी ख्याल आया कि 15 वर्ष पूर्व संपूर्णा के मेलों में एक महिला गोलगप्पे बना कर लाती थी, एक महिला मंगोड़ी पापड़ बना कर लाती थी, तो एक गले में सजने वाली माला बनाकर लाती थी. मेरी इन्हीं बहनों का सामान सबसे पहले बिक जाया करता था। क्योंकि इन सामानों की गुणवत्ता/क्वालिटी सबसे अच्छी और घर जैसी होती थी। आजकल पुन: छोटी-छोटी कलाओं को जीवित करके हम भारत को आगे बढ़ा सकते हैं। आप यदि अन्य कोई काम करना चाहते हैं या आपके मन में कोई सुंदर विचार है जिससे किसी का घर चल सके तो आप अपने उत्तम विचार को इस व्हाट्सएप नंबर 9953612425 पर भेज सकते हैं। हम उन विचारों को पढ़कर, समझ कर, चर्चा करके गोपाल किरन समाज सेवी संस्था, ग्वालियर,द्वारा चलाए जा रहे स्किल प्रोजेक्ट में शामिल करेंगे।

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