महंगाई और बेरोजगारी पर एक और संस्थागत प्रहार हैं बिजली संशोधन विधेयक – तरुण भनोत

जबलपुर दर्पण। देश जब एक तरफ नोटबंदी, जीएसटी जैसे मोदी सरकार के एकतरफा फैसलों से भीषण महंगाई और बेरोजगारी की चपेट में हैं, वही मोदी सरकार द्वारा लगातार सरकारी संस्थाओं मे निजी भागीदारी बढ़ाने से देश के आम नागरिकों का जीवन बेहद मुश्किल दौर में पहुंचता जा रहा हैं | देश के सभी प्रमुख कोर सेक्टर्स में मोदी सरकार अपने उद्धोगपती मित्रों की शत-प्रतिशत भागीदारी सुनिश्चित करना चाहती हैं | उक्त आरोप प्रदेश सरकार में पूर्व वित्त मंत्री एवं जबलपुर पश्चिम से विधायक तरुण भनोत ने केंद्र सरकार द्वारा संसद में बिजली संशोधन विधेयक -2022 को पेश किए जाने को लेकर लगाया हैं |
श्री भनोत ने बताया कि सरकार की मंशा हैं कि बिजली संशोधन विधेयक के माध्यम से बिजली वितरण क्षेत्र में एक से ज्यादा लाइसेन्स जारी करने का रास्ता खोल देगा | नया लाइसेन्स लेने वाली कंपनी सरकारी क्षेत्र की मौजूदा वितरण कंपनी के नेटवर्क का इस्तेमाल कर सकेगी, किन्तु निजी कंपनियों की सेवाएं जनता को राहत देने के बजाये ज्यादा मुनाफा कमाने को लेकर होगी, ऐसे में बिजली दरों मे अप्रत्याशित वृद्धि देश की बड़ी आबादी को प्रभावित करेगी |
गौरतलब हैं कि पिछले कुछ महीनों से लगातार देश भर की बिजली उत्पादन संयत्र कोयले की भारी कमी से जूझ रही हैं, जबकि मोदी सरकार लगातार यह दावा करती रही कि कोयले का उत्पादन और भंडारण उनके शासनकाल में ऐतिहासिक स्तर पर पहुँच चुका हैं | राज्यों के बिजली संयंत्रों को चलाने के लिए उनकी क्षमता और मांग के अनुरूप कोयले का आवंटन की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की हैं, लेकिन कोयले की भारी कमी से उत्पादन संयंत्रों के बंद होने के कगार पर केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को स्वयं कोयलें की खरीद कर संयत्रों को चलाने को कहा गया | उन्होंने बताया कि जिस कोयले को राज्यों द्वारा कोल इंडिया लिमिटेड के द्वारा लगभग 3000 रुपये प्रति मैट्रिक टन थी, निजी कंपनियों द्वारा उन कोयले को राज्यों को लगभग 30-40 हजार रुपये प्रति मैट्रिक टन के भाव से खरीदने पर राज्यों को मजबूर होना पड़ा और बढ़े हुए रेट पर कोयले की खरीद का खामियाजा प्रदेश के आम नागरिकों को बढ़े हुए बिजली टैरिफ के माध्यम से भुगतना पड़ रहा हैं |
श्री भनोत ने बताया कि प्रदेश में भाजपा डबल-इंजिन की सरकार चलाने का दावा करती है किन्तु हकीकत इनके दावों से विपरीत हैं | कोयले की कमी से जूझ रहे प्रदेश के बिजली संयत्रों को कोयले की आपूर्ति करने के नाम पर प्रदेश सरकार द्वारा हजारों करोड़ों रुपये का कर्ज लिया जा रहा हैं, और उसके बावजूद भी प्रदेश के सभी संयंत्रों को शत-प्रतिशत उत्पादन क्षमता के साथ चला पाने में विफल रही हैं | सौभाग्य योजना और हर घर बिजली के नाम पर लाखों की संख्या में बिजली उपभोक्ताओं को जोड़ा गया किन्तु उपलब्ध क्षमता के हिसाब से बढ़ी हुई मांग को पूरा करने के लिए जिस इन्फ्रस्ट्रक्चर को बढ़ाने पर सरकार को ध्यान देना चाहिए था उसमे शिवराज सरकार पूरी तरीके से विफल रही हैं और उसका परिणाम हैं कि प्रदेश के लगभग हर जिले और खासकर ग्रामीण मध्यप्रदेश अघोषित बिजली कटौती जैसे संकटों से गुजर रहा हैं। केंद्र एवं प्रदेश भाजपा सरकार पर आरोप लगाते हुए बताया कि बिजली कंपनियों को निजी कंपनियों को सौंपने की तैयारी काफी पहले से की जा चुकी थी, किन्तु विपक्ष और बिजली कंपनी कर्मचारी संगठनों के बढ़ते विरोध को देखते हुए बिजली संशोधन विधेयक को लाया जा रहा हैं, जिसके माध्यम से प्रदेश के विधुत क्षेत्र में निजी भागीदारी को बढ़ाकर ऊर्जा क्षेत्र में अप्रत्याशित प्रतिस्पर्धा को खड़ी किया जा सके | उन्होंने बताया कि सरकार जानबूझकर सरकारी बिजली कंपनियों की बुनियाद को कमजोर कर देना चाहती हैं ताकि निजी कंपनियों को इस क्षेत्र में व्यापक अवसर दिया जा सके | इस विधेयक के पारित होने से जहां एक तरफ बिजली उपभोक्ताओं की एक आबादी को हाशिये पर धकेलने का प्रयास हैं बल्कि सकरी बिजली कंपनियों में कार्य कर रहे कर्मचारियों के भविष्य पर भी तलवार लटक रहा हैं।



