जबलपुर दर्पण

सम्राट के जवाने की प्राचीन धरोहरों में बावली एवं मंदिरों का अस्तित्व खतरे में,

मनीष श्रीवास जबलपुर दर्पण । जबलपुर जिले के ग्रामीण एवं सिहोरा तहसील मुख्यालय अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत गोसलपुर एवं ग्राम पंचायत जुझारी में स्थित दो अलग अलग जगहों में प्राचीनकाल की बनी हुई बावली एवं मंदिरों की दुर्दशा किसी से छुपी नहीं हैं। आज हालात और समय जितनी तेजी से विस्तार की ओर कदम तो बढ़ा रहा हैं पर मानव सुविधाओं की ओर बहुत आगे पहुंच गया हैं। पर आज के मशीनी दौर में इन प्राचीन विरासतों की ओर कोई भी रूचि और ध्यान नहीं दे पा रहा हैं। “कहते हैं ना उस वस्तु की क्या जरूरत, जब तक वह किसी के काम न आए, और वह विरासत क्या जिसे हम संभाल न पाएं” बढ़ती हुई जनसंख्या में जरूरतों की भर मार, कुआं, बावली, पोखर, झरने घटते हुए आज। तालाब कुआं में बन गए महल अब भला इन्हें पूछे ज़रा कौन। वास्तविक प्राकृतिक संरचना इन पेड़ पौधों, तालाब, कुआं, झरना, बावली, पहाड़, हरे भरे वनों में सुन्दरता की झलक दिखाई देती हैं। अगर ये सब विलुप्त हो गई तो मानो कि मनुष्य का जीवन बंदकमरे में अंधेरे जैसा नज़र आयेगा। आज अगर इन प्राचीन धरोहरों को नहीं बचाया गया तो भविष्य में पानी के लिए रेगिस्तान जैसे हालात दिखाई दे सकतें हैं। और आने वाली पीढ़ियों को न जाने केवल ये फ़ोटो चित्र में ही नज़र आएगी।
जिस प्रकार से दिनों दिन घटते जल स्तर और जमीन का सीना छल्ली कर नल कूपों के लिए खनन किए जा रहे हैं और तालाब, कुआं, बावली, को पूरते जा रहे हैं। बुजुर्गों का कहना – गोसलपुर क्षेत्र में बुजुर्गों ने मीडिया के सामने चर्चा रखते हुए इन प्राचीन विलुप्त हो रहीं धरोहरों को बचाने के लिऐ आग्रह करते मांग की हैं। सबको मिलकर इन्हें बचाना है और जीवन खुशहाल बनाना है। जुझारी ग्राम पंचायत की बावली – पुरातत्व विभाग के हवाले – कई वर्षों से पड़ी हुई वीरान।
हमारे मीडिया प्रतिनिधि ने जब इन विलुप्त प्राचीनकाल की धरोहरों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर लगातार मुहिम चला कर जागरूकता के साथ दिन रात इन्हें बचाने में लगे हुए हैं। अब सवाल उठता हैं कि 1999 वर्ष में जब मध्यप्रदेश संरक्षित स्मारक के रूप में प्राचीन पुरातत्व स्थल अवशेष अधिनियम 1964/ 1964-3 अंतर्गत राजकीय महत्व की घोषणा जारी तो कर दी लेकिन इसकी सुरक्षा व्यवस्था और अन्य जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। जिससे इसकी दुर्दशा अलग झलक रहीं हैं।
न तो इसकी कभी समय पर रंग, कलर की पुताई हो पाई न ही इसका सौंदर्य करण।
सूचक संदेश बोर्ड – बावली के आसपास कोई खनन और इसे क्षति पहुंचाने वाले निर्देशन बोर्ड को तो लगा दिया गया हैं पर सालों बीत जाने के बाद भी कोई सुध लेने नहीं आ पाता हैं।
प्राचीन बावली (सीढ़ीदार कुआँ) भारतीय वास्तुकला और जल प्रबंधन का एक अद्भुत उदाहरण हैं। इनकी सुरक्षा, संरक्षण और इनसे संबंधित कानून (धाराएँ) इस प्रकार हैं:
प्राचीन बावली की सुरक्षा और संरक्षण – ऐतिहासिक महत्व: ये केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि सामाजिक समागम के केंद्र और ठंडे आश्रय स्थल (विशेषकर रेगिस्तानी क्षेत्रों में) के रूप में कार्य करती थीं।
संरक्षण के प्रयास- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ( ए एस आई ) महत्वपूर्ण बावड़ियों को राष्ट्रीय महत्व के स्मारक के रूप में संरक्षित किया जाता है।
स्थानीय प्रयास- “जल गंगा संवर्धन अभियान” जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से पुरानी बावड़ियों की साफ-सफाई और जीर्णोद्धार किया जा रहा है। जैसा कि राजगढ़ (मध्य प्रदेश) में देखा गया।
पुनरुद्धार: राजस्थान जैसे राज्यों में ‘मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान’ के तहत बंद पड़ी बावड़ियों को पुनर्जीवित किया जा रहा है।
कानूनी धाराएं –
प्राचीन बावड़ियों को नुकसान पहुँचाने या उनके संरक्षण से संबंधित मुख्य कानून निम्नलिखित हैं:
प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल और अवशेष अधिनियम – 1958 इस अधिनियम के तहत, कोई भी व्यक्ति यदि संरक्षित बावली को नुकसान पहुँचाता है और उस पर कब्जा करता है या उसे गंदा करता है तो उसे कारावास (3 साल तक) या भारी जुर्माना (1 लाख रुपये तक) या दोनों हो सकते हैं।
जल संरक्षण अधिनियम – कई राज्यों में स्थानीय नगरपालिका, जनपद कार्यालय के अंर्तगत कानूनों के तहत ऐतिहासिक जल स्रोतों को भरने या नष्ट करने पर प्रतिबंध है।
वर्तमान स्थिति और चुनौतियाँ
अतिक्रमण और उपेक्षा – कई प्राचीन बावड़ियाँ आज कूड़ेदान में बदल चुकी हैं या अतिक्रमण का शिकार भी हैं।
सुधार की अति आवश्यकता – मध्य प्रदेश के कई जिलों एवं विभिन्न तहसीलों के स्थानों में, प्राचीन बावड़ियों को पुनर्जीवित करने और संरक्षित करने के लिए और अधिक ध्यान देने की भी आवश्यकता है। ताकि वे जल संरक्षण जैसी सुरक्षा में योगदान दे सकें।
यदि आप किसी विशिष्ट राज्य या स्थान की बावली के बारे में जानना चाहते हैं, तो कृपया जरूर बताएं।

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