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बुंदेलखंड के बक्साहा वन अभ्यारण राष्ट्र की अमूल्य धरोहर

जबलपुर दर्पण/जबलपुर संवाददाता/राजेश सिंह की रिपोर्ट। मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले के अंतर्गत बक्साहा विकासखंड में प्राकृतिक सघन वन आच्छादित है इन वनों में भरपूर जैव विविधता पाई जाती है। प्राणी विविधता में 6651 प्रजातियां भारत में है। जिसमें से 3248 प्रजातियां मध्य प्रदेश में पाई जाती हैं मध्यप्रदेश में शेरों की संख्या अधिक होने के कारण इसे टाइगर स्टेट तथा पर्याप्त मात्रा में तेंदुआ पाए जाने के कारण इसे लेपर्ड स्टेट के नाम से भी जाना जाता है। मध्यप्रदेश में पक्षी 450, मछलियां 180, तितलियां 145 तथा वनस्पतियों की 5000 से अधिक प्रजातियां पाई जाती है जिनमें से बक्साहा के जंगल में जो छतरपुर, सागर और दमोह की सीमा के अंतर्गत वन रेंज आते हैं जैसे सगोरिया, कसेरा, वीरमपुर, जरा, हिनौता तथा दरदोनिया क्षेत्र है।पर्यावरणीय, आर्थिक, वैज्ञानिक, ऐतिहासिक, शैक्षणिक, सौंदर्यात्मक, सांस्कृतिक, नैतिक एवं औषधीय महत्व रखने वाला यह मनोरम स्थल अतुलनीय है।बक्साहा के अंतर्गत बहुत से जीव-जंतु पाए जाते हैं जिनमें संकटापन्न, अतिसंवेदनशील, विरल, संकटग्रस्त, संकटमुक्त एवं मध्यवर्ती जातियों के साथ मछलियों में भारतीय मेजर कार्प, केटफिश, उभयचर में मेंढक में राना टिग्रीना, टोड सरीसृप में विभिन्न प्रकार के सांप, छिपकली, गिरगिट खासतौर से दो-मुंहा सांप जिसे अंग्रेजी में सेंड स्नेक कहते हैं जिसका उपयोग कॉस्मेटिक, दवाओं के अलावा कई स्थानों में इसे भाग्यशाली प्रतीक माना जाता है। इसकी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में  कीमत 2.5 करोड़ से 7 करोड़ रुपए तक होती है। छतरपुर जिले में पक्षियों की 73 प्रजातियों का उल्लेख इंटरनेशनल  जर्नल ऑफ ग्लोबल साइंस रिसर्च 2014 में किया गया है। विभिन्न प्रकार के पक्षियों में गौरैया, गलगलिया, नीलकंठ, बुलबुल, राष्ट्रीय पक्षी मोर, तोता, कोयल, कठफोवडा, मैना, कौआ, टिटेहरी, बया, चील, गिद्ध तथा मौसमी पलायन पक्षी जैसी अन्य महत्वपूर्ण प्रजातियां विचरण करती हैं। एक विभागीय पशुगणना के अनुसार 2021-23 में तेंदुआ 1, भालू 2, लकड़बग्घा 8, सोन कुत्ता 13, भेड़िया 4, के अलावा हिरण, चीतल, नीलगाय, सियार, सांभर, बंदर, बारहसिंगा इत्यादि इत्यादि पाए जाते हैं । बहुत से कीट पतंगा जो कि पारिस्थितिक तंत्र में पॉलिनेशन की महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। जिनमें मधुमक्खी, तितली तथा हजारों की तादाद में इंसैक्ट मिलते हैं। औषधीय जंतु भी पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं। नदी तालाबों में पाये जाने वाले सीप घोंघे जो दवाओं में प्रयुक्त होते हैं। पेड़ पौधों में बहुत से औषधीय एवं फलदार पौधे जैसे जामुन, बहेड़ा, अर्जुन, नींम के अलावा बहुवर्षीय पौधे, पीपल, सागौन, तेंदू, बेल, खैर, गूलर, टेसू, चिरौंजी, कोहा, इमली, सेमल, महुआ, चरवा, आंवला, बरगद   तथा अन्य इमारती वृक्ष और वनस्पतियां प्राकृतिक रूप से विद्यमान है। खनिजों की बात करें तो पिछले समय में आस्ट्रेलियन कंपनी के द्वारा हीरे की बहुतायत में उपलब्धता बताई गई है बताया जाता है कि यहां बहुमूल्य हीरे का भंडारण है। इसके अलावा इस क्षेत्र में यूरेनियम की भी संभावना जताई जा रही है । इस क्षेत्र में अन्य खनिज भंडार होने की संभावना है। जो शोध का विषय है।प्राकृतिक जल स्रोत जिसमें झरना, नदी, तालाब, जलाशयों के अलावा छोटे-छोटे वेटलैंड एरिया जिसमें प्रकृति को संतुलन करने वाले सूक्ष्मजीव पाए जाते हैं। यह जंगल वैज्ञानिक एवं पर्यावरण दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण तब हो जाता है जब इन पर आश्रित आदिवासियों के लिए वन संपदा जीवन उपार्जन का प्रमुख माध्यम बन जाता है। एक वृक्ष प्रतिदिन 230 लीटर का ऑक्सीजन देता है जिसमें 7 लोगों को प्राणवायु मिलती है।आध्यात्मिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से प्राकृतिक सौंदर्य, शांत एवं सुरम्य वातावरण के लिए महत्वपूर्ण है। शैक्षणिक एवं शोध की दृष्टि से भी यह क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ प्राकृतिक संपदा का अपार भंडार है। यदि भारतीय वैज्ञानिकों, शैक्षणिक संस्थाओं, विश्वविद्यालय के प्राध्यापक एवं शोधकर्ताओं को कार्य करने का अवसर मिले तो यहां पर मानव जीवन को बचाने वाली बहुमूल्य औषधियों प्राप्त हो सकती हैं इसमें कोई संदेह नहीं है।प्राप्त जानकारी के अनुसार बक्सवाहा के 382.131 हेक्टेयर जमीन जिसमें वन विभाग के अनुसार  लगभग 215875 वृक्षों से आच्छादित है, को मध्य प्रदेश सरकार द्वारा 50 साल के लिए अस्सी  हजार करोड़ रुपए में आदित्य बिड़ला समूह को लीज पर दिए जाने का करार किया है । मानवीय हस्तक्षेप के कारण विकास के नाम पर हमेशा से ही पृकृति को दोहन होता रहा है। तो यहां पर भी प्राकृतिक संपदा के साथ-साथ पूरा जैवमंडल प्रभावित होने की प्रबल  संभावना बढ़ जाती हैं। इतना ही नहीं बल्कि यहां के लोगों को रोजगार उपलब्ध भी नहीं हो पाएगा पन्ना जिले में कई सालों से हीरे के उत्खनन का काम एन एम डी सी के द्वारा किया जा रहा है। हीरा को तराशने का केंद्र बनाने  के लिए कई बार घोषणा की जा चुकी है। उसके बावजूद वहां पर इस संबंध में कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए और पन्ना जिला हमेशा से पिछड़ता चला गया। ऐसी स्थिति में बक्सवाहा के क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएं प्रतीत नहीं होती और यदि कंपनी के द्वारा रोजगार उपलब्ध कराया जाता है तो यह निम्न स्तर का ही होगा (चपरासी सफाई कर्मचारी) के रोजगार स्थानीय स्तर पर करते हैं । अधिकारी एवं सिक्योरिटी गार्ड अधिकांशतः बाहर के रहते हैं। यहां  का भूजल स्तर निम्न हो जाएगा । जमीन बंजर होने लगेगी। मृदा, वायु और जल प्रदूषण बढ़ेगा। भारी तादाद में जंगल कटने से तापक्रम में वृद्धि होगी। प्राकृतिक आपदाएं बढेंगी। बाढ़ आने की संभावना होगी और तो और कोविड 19 से भी भयंकर बीमारियां इस क्षेत्र में पनपने लगेगी जो मानव जाति के लिए खतरनाक साबित होगी। ऑक्सीजन संकट गहराने लगेगा। जलवायु परिवर्तन से कृषि कार्य प्रभावित होगा। पर्यावरण असंतुलित होने लगेगा। वैश्विक स्तर पर ओजोन छिद्र पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। मजदूरों एवं किसानों के साथ स्थानीय पलायन बढ़ेगा। रोजगार न मिलने से क्षेत्र में अराजकता एवं आतंकवाद की संभावना से इंकार नही किया जा सकता है।भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए कई शासकीय एवं अशासकीय अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय संस्थाओं के कार्य करने के बावजूद भी सत्रहवीं, अठारहवीं, उन्नीसवीं सदी में जंतुओं की क्रमशः सात, ग्यारह, एवं सत्ताइस जातियां विलुप्त हुई हैं। जबकि अकेले बीसवीं सदी में जंतुओं की 67 जातियां विलुप्त हुई हैं।छतरपुर जिले के अलावा भारत के विभिन्न स्थानों पर पर्यावरण के क्षेत्र में कार्य करने वाले संगठन एवं व्यक्तियों को अपने पर्यावरण संरक्षण करने की चिंता सताने लगी है। केंद्र, राज्य और स्थानीय शासन प्रशासन से इस विशाल पारिस्थितिक मंडल को बचाने का सकारात्मक प्रयास करना चाहिये।मुझे विश्वास है की मध्स्यप्रदेश शासन अपनी संवेदनशीतला के चलते हर क़ीमत पर प्रकृति के पक्ष में ही निर्णय लेगा। क्योंकि ‘प्रकृति की लय से लय मिलाकर ना चलना ही प्रलय का कारण होता है।

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