माझी समाज ने राष्ट्रपति के नाम धरना देकर एसडीएम को दिया ज्ञापन

जबलपुर दर्पण । मछली पालन का अधिकार आदिवासी भाईयों को दे दिया गया है। इस पेसा एक्ट के बाद प्रदेश मे आदिवासी विकासखंडों के तालाबों से अब वंशानुगत मछुआरे बेदखल हो गए है। अतः शासन व्दारा लागू पेसा एक्ट में संशोधन कर आदिवासी विकासखंडों के तालाबों जलाशयों में मछली पालन का काम वंशानुगतं मछुआरों को ही वापस दिया जाना चाहिए. नदी तालाब जलाशय से खुलने वाली जमीनों पर तरबुज खरबुज ककड़ी व साग-सब्जी आदि लगाने के लिए इन जमीनों के 15 वर्षीय पट्टे दिए जाए। ज्ञात रहे कि सन् 1988 से तत्कालीन म. प्र. सरकार ने 15 वर्षीय अवधि के ऐसे पट्टे प्रदेश में इस समाज के हजारों लोगों को दिए भी थे जो शासन के राजस्व रिकार्ड में अनेकों जिलों में दर्ज भी है, नदियों से निकलने वाली रेत के पचास प्रतिशत पर माझी मछुआ समाज का अधिकार होना चाहिए, वहीं इस दौरान अनुरोध किया गया कि प्रदेश के माझी मछुआ समाज के आर्थिक शैक्षणिक और सामाजिक स्तर टंको ऊपर लाने के लिए दर्शित बिंदुओं को लागू कराया जाना न्यायसंगत होगा, आदि की मांग की गई । इन मांगों को लेकर सिविक सेंटर में आयोजित प्रदर्शन के दौरान कोमल रैकवार, राम कुमार, आर डी रैकवार, महेश सोंधिया, गिरजाशंकर, अशोक बर्मन, प्रह्लाद रैकवार, उमा रैकवार, भूमा रैकवार, मेघा रैकवार नीता रैकवार, धर्मेन्द्र रैकवार, राजेश केवट, रविकिशन सोंधिया, करण रैकवार, माया रैकवार, सुमन कश्यप, सतीश पवैया आदि मौजूद रहे ।



