चने में कालर राॅट रोग से बचाने की वैज्ञानिकों ने दी जानकारी

जनेकृविवि के वैज्ञानिकों की टीम ने मझौली, कंटगी और पाटन के किसानों के खेतों का किया भ्रमण
जबलपुर दर्पण। जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर के कुलपति डाॅ. प्रमोद कुमार मिश्रा की सद्प्रेरणा एवं संचालक विस्तार सेवायें डाॅ. दिनकर प्रसाद शर्मा के निर्देशन पर किसानों की फसलों पर लगने वाली विभिन्न प्रकार के रोगों की समस्याओं के निराकरण के लिये चार सदस्यी वैज्ञानिक दल का गठन किया गया। यह वैज्ञानिकों का दल मझौली, पाटन और कंटगी विकासखण्डों का भ्रमण किया, साथ ही किसानांे की चना की फसल पर लगने वाले रोग के संबंध में विस्तार से जानकारी ली।
इस दौरान प्रमुख वैज्ञानिक डाॅ. अनीता बब्बर ने बताया कि चने मे तना विगलन रोग प्रमुख हैं, जो मृदा में अधिक नमी के कारण स्क्लेरोसियम रॉल्फसी नामक फफूँद के कारण बोनी से 6 सप्ताह तक की फसल में आता है। काॅलर राॅट रोग का प्रकोप फसल में न हो, इसके लिए कृषकों को महत्वपूर्ण सलाह दी गई है कि, मृदा में नमी आवश्यकता से अधिक न हो। रोग के प्रबंधन हेतु गर्मियों में खेत की जुताई करनी चाहिए। चना बोनी से पूर्व खेत में पूर्व फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन किया जाना आवश्यक है। पलेवा के बाद खेत तैयार कर ट्राइकोडर्मा विरिडी 1-1.5 किग्रा प्रति एकड़ का प्रयोग कर बोनी करनी चाहिए। साथ ही रोग ग्रसित खड़ी फसल में रोग का प्रकोप न बढ़े, इस हेतु ट्राइकोडर्मा विरिडी 2-3 मिलीलीटर प्रति लीटर अथवा कारबेंडाजिम 1 ग्राम प्रति लीटर अथवा टेबुकनोजोल 0.5 मिलीलीटर प्रति लीटर की दर से जड़ क्षेत्र में छिड़काव करने की सलाह वैज्ञानिकों द्वारा दी गई।
वैज्ञानिक दल का नेतृत्व डाॅ. अनीता बब्बर, चना विषेषज्ञ के रूप में साथ ही डाॅ. एस.बी. अग्रवाल ने पौध रोग वैज्ञानिक प्रो. प्रमोद गुप्ता द्वारा प्राकृतिक व जैविक खेती आदि पर विस्तार पूर्वक चर्चा की गई।



