विश्व कवि गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर जी की 163वीं जयंती पर दी श्रद्धांजलि

जबलपुर दर्पण। भारतीय राष्ट्रगान के रचयिता विश्वख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और नोबेल पुरुस्कार से सम्मानित गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर जी की 163वीं जयंती के अवसर पर शांतम प्रज्ञा आश्रम में श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया गया, कार्यक्रम का शुभारम्भ राष्ट्रगान गाकर किया गया।
इस अवसर पर आश्रम संचालक क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट मुकेश कुमार सेन ने आश्रम में उपचार ले रहे नशा पीड़ितों को गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर जी के जीवन के विषय में बताया कि किस प्रकार गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर जी ने अपनी कविताओं और दर्शन के माध्यम से गुलाम भारत की जनता के मन में स्वतंत्रता के प्रति जागरूकता पैदा की.भारत के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता और महान कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की आज 163वीं जयंती मनाई जा रही है। रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई, 1861 को कोलकाता में हुआ था। साल 1913 में रवीन्द्रनाथ टैगोर को साहित्य में नोबेल पुरस्कार मिला था। 1913 में रवीन्द्रनाथ टैगोर साहित्य में नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले नॉन-यूरोपियन और पहले भारतीय थे। टैगोर को नोबेल पुरस्कार उनकी सबसे प्रसिद्ध कविता संग्रह गीतांजलि के लिए दिया गया था। वह एक कवि, लेखक, नाटककार, संगीतकार, दार्शनिक, समाज सुधारक थे। बंगाली नवजागरण के एक प्रमुख व्यक्ति, रवीन्द्रनाथ टैगोर भी एक दूरदर्शी शिक्षक थे, जिन्होंने पारंपरिक कक्षा शिक्षण में क्रांति ला दी और पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन में विश्व-भारती विश्वविद्यालय की स्थापना की।
कविता, उपन्यास, लघु कथाएँ और निबंधों तक फैली उनकी साहित्यिक रचनाएँ विश्व स्तर पर लेखकों और कलाकारों को प्रेरित करती हैं। टैगोर के प्रसिद्ध कविताओं के संग्रह ‘गीतांजलि’ को 1913 में साहित्य में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। विशेष रूप से, ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार, उन्हें दो देशों के राष्ट्रगान लिखने का अनूठा गौरव प्राप्त है: भारत के लिए जन गण मन और दूसरा अमर। बांग्लादेश के लिए सोनार बांग्ला.
रवींद्रनाथ टैगोर बंगाल के बेहद अच्छे घराने से आते थे। उनका जंम कोलकाता में जाने माने समाज सुधारक देवेन्द्रनाथ टैगोर के यहां हुआ था। उनका माता का नाम सारदा देवीवास था। गुरुदेव का मानना था कि अध्ययन के लिए प्रकृति का सानिध्य ही सबसे बेहतर है. उनकी यही सोच 1901 में उन्हें शांति निकेतन ले आई। उन्होंने खुले वातावरण में पेड़ों के नीचे शिक्षा देनी शुरू की। रवींद्रनाथ टैगोर के पिता ने 1863 में एक आश्रम की स्थापना की थी, जिसे बाद रवींद्रनाथ टैगोर ने शांतिनिकेतन (Shanti Niketan) में बदला।
रवीन्द्रनाथ टैगोर को 1915 में नाइट हुड की उपाधि से सम्मानित किया गया था। लेकिन उन्होंने वर्ष 1919 में अमृतसर (जलियांवाला बाग) नरसंहार के विरोध में ये सम्मान अंग्रेजों को वापस लौटाया दिया था। रवीन्द्रनाथ टैगोर को’गुरुदेव’, ‘कबीगुरु’ और ‘बिस्वकाबी’ जैसी उपाधियों से सम्मानित किया गया है। साहित्य, संगीत और कला में अपने उल्लेखनीय योगदान के लिए दुनिया भर में सम्मानित, पश्चिम बंगाल के प्रसिद्ध बंगाली कवि, लेखक, चित्रकार, समाज सुधारक और दार्शनिक, टैगोर ने भारत के सांस्कृतिक और राजनीतिक इतिहास को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया है।वह एक कवि और लेखक होने के साथ-साथ एक प्रभावशाली कलाकार और संगीतकार भी थे। उन्होंने 2,230 से अधिक गीतों की रचना की और 3,000 से अधिक पेंटिंग बनाईं। उन्होंने भारत, बांग्लादेश और श्रीलंका के राष्ट्रगान लिखे।उन्होंने पारंपरिक शैक्षिक प्रतिमानों को चुनौती देते हुए 1901 में शांतिनिकेतन में ब्रह्मचर्य आश्रम की स्थापना की, जो 1921 में विश्व-भारती विश्वविद्यालय में विकसित हुआ। अपनी साहित्यिक उपलब्धियों के अलावा, टैगोर का दार्शनिक और शैक्षिक योगदान गहरा था, जो ‘साधना – द रियलाइज़ेशन ऑफ़ लाइफ’ और ‘द रिलिजन ऑफ़ मैन’ जैसे कार्यों में स्पष्ट है। टैगोर के दार्शनिक चिंतन ने शिक्षा, राजनीति और आध्यात्मिकता को फैलाया, ‘राष्ट्रवाद’ जैसे कार्यों में निहित गहन अंतर्दृष्टि से मानवता को समृद्ध किया।
रवीन्द्र नाथ टैगोर का 80 वर्ष की आयु में सर्जरी के एक सप्ताह बाद 7 अगस्त 1941 को कलकत्ता में निधन हो गया। वह गंभीर यूरीमिया से पीड़ित थे। डॉ. ज्योतिप्रकाश सरकार और डॉ. बिधान चंद्र रॉय ने 30 जुलाई को अवरुद्ध मूत्राशय की सर्जरी की। सर्जरी के एक सप्ताह बाद उनकी मृत्यु हो गई।
कार्यक्रम के अंत में सभी ने नशा मुक्त रहने की प्रतिज्ञा की। इस अवसर पर शांतम प्रज्ञा आश्रम के के संचालक मुकेश कुमार सेन, सदस्य संतोष अहिरवार, राकेश सेन, मुकेश अहिरवार उपस्थित रहे।



