संघर्ष के पर्याय और आदर्श व्यक्तित्व के धनी सुभाष जी

जबलपुर दर्पण। भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने कहा था…सच कहूं तो सुभाष जी के बिना जबलपुर की कल्पना अधूरी है। यह शब्द उन्होंने महाकौशल में आरएसएस, जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के आधारस्तंभ रहे स्व. सुभाषचंद्र बैनर्जी के लिए कहे थे। सच में बाजपेयी जी जैसा विराट व्यक्तित्व यदि किसी के विषय में इतने उच्च कोटि के विचार रखे तो उस व्यक्तित्व के आदर्श जीवन को सहज ही समझा जा सकता है। सुभाष जी वास्तव में कड़े संघर्ष के पर्याय, निस्वार्थ साधक और आदर्श व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने जनसंघ के दौरान पार्टी के संकट वाले दिन भी देखे और भारतीय जनता पार्टी की उत्तरोत्तर उन्नति को भी देखा लेकिन सुभाष जी न संकट में घबराए और ना ही पार्टी की उन्नति देखकर अति उत्साहित हुए। उन्होंने अपनी श्रम साधना से आरएसएस संगठन व जनसंघ को मजबूत बनाया बिल्कुल नींव का पत्थर बनकर। उनमें कभी स्वार्थ भावना नहीं रही, तभी तो राजनीति से जुड़े उनके समकालीन मित्र उन्हें राजनीति का संत कहा करते थे। 14 अगस्त 1921 को जबलपुर में जन्मे सुभाषचंद्र बैनर्जी की शिक्षा जबलपुर में ही हुई। उन्होंने महाकौशल महाविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की। शिक्षा दीक्षा के दौरान ही आपको देश व समाज की चिंता ने आरएसएस से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। आपने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए पारिवारिक जीवन का त्याग किया और प्रचारक के रूप में 10 वर्षों तक रायपुर में रहे। इस दौरान आपने छत्तीसगढ़ अंचल में आदिवासियों को संघ से जोड़ने का काम किया। बाद में संघ के निर्देश पर जनसंघ का कार्य आपने अपने बड़े भाई विमलचंद्र बैनर्जी व छोटे भाई विभाषचंद्र बैनर्जी के साथ प्रारंभ किया। सुभाष जी 10 वर्षों तक जबलपुर जिला व शहर जनसंघ में अध्यक्ष पद पर कार्यरत रहे। वर्ष 1956 में आपका विवाह जयश्री बैनर्जी के साथ हुआ। आपने धर्मपत्नी को भी इसी कार्य से जोड़ लिया। वर्ष 1967 में लोकसभा में आपने जनसंघ प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा। इस चुनाव के माध्यम से जनसंघ की छाप जन-जन तक पहुंचाने में सफलता मिली। आपकी मिलनसारिता, सहजता व वाकपटुता के कारण संगठन और बाहर भी आप सभी को स्वीकार रहे। देश व समाजसेवा के लिए बैनर्जी परिवार सदैव समर्पित रहा। बच्चों की शिक्षा एवं उनके समुचित उत्थान के लिए आपने अपने गलगला स्थित निवास की भूमि दान में दे दी। यहां 1972 में जबलपुर शहर के प्रथम सरस्वती शिशु मंदिर की स्थापना की गई। जून 1975 से मार्च 1977 तक आपातकाल के दौरान बैनर्जी परिवार के 6 सदस्य जेलों में बंद रहे। इस दौरान आपको, पत्नी जयश्री, बड़े भाई विमलचंद्र, छोटे भाई विभाषचंद्र और उनके दो पुत्रों अरुण व विपिन को मध्य प्रदेश के विभिन्न जेलों में बंदी बनाकर रखा गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी का कार्य करते समय गुरुजी गोलवलकर जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी, एकनाथ रानाडे, कुशाभाऊ ठाकरे, दत्तोपंत ठेंगड़ी, नानाजी देशमुख, अटल बिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी आदि दिग्गजों से आपका निकट का संबंध रहा, जिन्होंने विभिन्न अवसरों पर आपके विलक्षण गुणों का वर्णन किया। सही मायनों में सुभाष जी ने अपने जीवन में निष्काम कर्म किया, उनके कर्तव्यपथ पर स्वार्थपरता की भावना नहीं रही। संगठन में उन्होंने हजारों युवाओं में राष्ट्रभक्ति की अलख जगाई। इनमें से अनेक युवा देश और प्रदेश के जाने-माने नेता बने लेकिन सुभाष जी ने बदले में कभी कोई अपेक्षा नहीं की।
अपने कर्तव्यपथ पर चलते हुए उन्होंने 15 नवंबर 2000 को इस संसार सागर से विदा ली। सुभाष जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को उनके वरिष्ठजन, सहयोगी और मित्रगण कभी नहीं भूल सके। सभी ने अपने मन में सुभाष जी के साथ बिताए पलों को संजोकर रखा था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सर संघचालक कुप. सी सुदर्शन ने लिखा था… सुभाष जी का पूरा जीवन सात्विक, संयमित एवं परहित रहा। भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक दत्तोपंत ठेंगड़ी ने लिखा था कि… सुभाष जी एक संयत, मृदुभाषी, कुशल योजक और निस्पृह व्यक्ति थे। उनमें लोगों को संगठित करने का अद्भुत कौशल था। भाजपा के पूर्व अध्यक्ष कुशाभाऊ ठाकरे का कहना था कि… सुभाष जी में कार्यकर्ता तैयार करने की अद्भुत क्षमता थी, इसका मुख्य कारण यह था कि उन्होंने स्वयं को कभी प्रोजेक्ट नहीं किया।



