जबलपुर दर्पणमध्य प्रदेश

मन में आस्था, धर्म पथ पर अग्रसर रूबी

जबलपुर दर्पण । रूबी छठ मैया की बेटी है – यदि कहूं तो अतिश्योक्ति न होगी । रूबी के मायके का नाम रंजना है। रंजना जब छोटी थी तो पापा सदा इसे प्यार से रुक्खी के नाम से पुकारा करते रहे हैं । आरा बिहार में गिलहरी को रूक्खी कहते हैं। श्री रामचंद्र जी की सबसे प्यारी है गिलहरी जिसने राम सेतु बनाने में अपना योगदान दिया था। रुक्खी भी अपने पापा की सबसे प्यारी बिटिया रही है। कुछ समय पहले रुबी के पापा बैकुंठ धाम गमन कर गए हैं। पापा के साथ बिताये बचपन के एक-एक क्षण का स्मरण कर रुबी चाहे भी तो अपने आंसू रोक नहीं पाती। सबको सम सम्मान देने वाली, कोमल हृदय वाली रूबी‌। निर्भीक और दबंग भी है। सदाचरण इसका 24 कैरेट का आभूषण है। रूबी का विवाह अपने समान शिष्ट सभ्य भद्र‌ प्रज्ञ कन्हैया पांडे के संग हुआ। रूबी और कन्हैया दोनों ही शहर आरा बिहार के रहने वाले हैं। रूबी के पति कन्हैया पांडे की नौकरी जबलपुर में लग गई । एक सोसाइटी में पांडे दंपति ने अपना मकान भी खरीद लिया । रूबी का एक बेटा भी है यश जो इस समय 16-17 वर्ष का है। यश बहुत होनहार और अति मेधावी है।रूबी को मैं तब से जानता हूं जब रूबी ने मेरे द्वारा लिखे एक देवी गीत को अपनी सुरीली आवाज में गाकर मुझे व्हाट्सएप पर भेजा था। इतनी सुंदर आवाज में गाया था कि मैं अपना गीत सुनकर अपने आंसू नहीं रोक पाया था। इतना भाव विभोर हो उठा था कि अभी जाऊं और जाकर छठ मैया की बिटिया रूबी के समक्ष हाथ जोड़कर आभार प्रकट कर आऊं। फिर भी मैंने व्हाट्सएप पर कन्हैया और रूबी दोनों का अपने शब्दों में अभिनंदन कर आभार प्रकट किया। धीरे-धीरे रूबी बिटिया से मेरा परिचय बढ़ने लगा। हमारी सोसाइटी के पार्क में शारदीय नवरात्रि के समय देवी गीत गायन‌ की एक मंडली आई । उस समय भी रूबी ने अपने मधुरतम स्वर में एक से एक बढ़िया देवी गीत गाए और उसमें मेरा भी एक लिखित गीत गाया। रूबी सदैव मुझे आराध्या सी लगी।
2 नवंबर 2019‌‌ को रूबी ने छठ मैया का 36 घंटे का व्रत रखा। छठ मैया मां कात्यायनी का रूप है। सूर्य को अर्घ्य खरना से लेकर व्रत की समाप्ति तक मैंने अपनी पत्नी श्रीमती शारदा के साथ रूबी के इस कठोर व्रत के तप को प्रत्यक्ष देखा। यूं लग रहा था जैसे सच में मां छठ रूबी में आ गई हो । बिहार का छठ पर्व कठिन पर्वों में से एक है जो 4 दिनों तक लगातार चलता है। इस पर्व में 36 घंटे निर्जला व्रत रख सूर्य देव और छठी मैया की पूजा की जाती है और उन्हें अर्घ्य दिया जाता है। कथा है कि सूर्य भगवान के परम भक्त दानवीर कर्ण नदी में खड़े होकर नित सुर्य‌‌ को अर्घ्य दिया करते थे। सूर्य की कृपा से वे महान योद्धा बने । तभी से ये परंपरा चली आ रही है। रुबी की धर्मपरायणता धर्मनिष्ठता आस्था निष्ठा और मां प्रति विश्वास से मैं कायल होता गया।
यह घटना उस समय की है जब रूबी अविवाहित थी। इंटर का एग्जाम होना था। एग्जाम मई में होना था लेकिन मार्च में हो गया। लगभग 4000 बच्चे इस एग्जाम में बैठे ।‌ सभी बच्चों के साथ रूबी ने भी एग्जाम दिया। रिजल्ट आने के पूर्व कुछ बच्चों ने सुसाइड भी किया। क्योंकि उन्हें मालूम था कि वे पास नहीं हो पाएंगे। रूबी के माता-पिता भी बहुत सहमें सहमें रहते थे कि कहीं रूबी भी कुछ कर न बैठे। रिजल्ट आया कुल 40 बच्चे पास हुए। रूबी भी अच्छे नंबरों से पास हुई तो माता-पिता की सांस में सांस आई और पिताजी लड्डू लेकर घर आए। रूबी के घर में छठ मैया ने कृपा की । रूबी के माता पिता के पास न घर था न जमीन थी। जैसे ही रूबी अपनी मां के पेट में आई जमीन खरीद ली गई। और जब रूबी ने जन्म लिया उस समय मकान भी बना लिया गया ‌। ऐसी ही एक स्मृति रूबी ने बातों-बातों मुझे बताई। रूबी की शादी कन्हैया पांडे से तय हो गई थी। ‘रोका’ के समय रूबी के ससुर बहुत अधिक रोए। पूछने पर बताया कि रूबी अपने माता-पिता से जुदा हो जाएगी ये मैं सहन नहीं कर पा रहा हूं। शादी पश्चात रूबी का एक बेटा‌ हुआ यश । उस समय रूबी को होश न था। रुबी के होश में न आने के कारण पिता बहुत दुखी थे और आंसू नहीं थम रहे थे। नर्स के पूछने पर रूबी के पिता ने बताया कि नाती होने से मैं खुश तो हूं पर मेरा बच्चा ( रूबी ) तो होश में आए। ‌जब रूबी को होश आया तो उन्होंने अपनी खुशी का इजहार किया। लेकिन ससुराल में तो असीम खुशी का माहौल था। श्वसुर तो जैसे नाच रहे थे। पांडे परिवार में 14 वर्ष बाद रूबी को यश पैदा हुआ था। कन्हैया घर में सबसे छोटा है और वह सब का लाडला है ‌। एक तो बेटा लाडला और दूसरे 14 वर्ष बाद पांडे परिवार में पुत्र रत्न की प्राप्ति रूबी के श्वसुर तो मानो नाचे ही जा रहे थे। जीवन में जैसे उन्हें पहली बार इतनी खुशी मिली हो।
विगत वर्ष हमारी सोसाइटी के पार्क में भागवत पुराण कथा का आयोजन हुआ। वृंदावन से प्रख्यात कथावाचक आचार्य मधुरम पचोरी जी पधारे थे। श्रीमती ज्योत्सना और राकेश चौरसिया जी यजमान थे। रूबी कन्हैया और उनके बेटे यश तीनों ने इस कथा का सातों दिन खूब आनंद लिया और बड़े मनोयोग से कथा का श्रवण किया । रूबी कन्हैया और यश ने आशीर्वाद स्वरूप आचार्य जी से दीक्षा भी‌ ली। आस्था में अत्यंत विश्वास रखने वाली रूबी अपने पति कन्हैया और बेटे यश के साथ अभी-अभी वृंदावन धाम में आचार्य मधुरम पचोरी जी से मिलकर भी आई है। यूं कह सकता हूं कि साधना तप भक्ति में पूर्णतया लीन रुबी मन में निर्मलता निश्छलता लिए धर्म और सच के पथ पर चलती जा रही है चलती जा रही है।

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