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श्री नृसिंह पीठाधीश्वर डॉ स्वामी नरसिंहदास जी महाराज

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जबलपुर दर्पण। अनेक जन्मों के पुष्यों का उदय होता है तब यह पावन कथा जीवन में सुलभ होती है। यह कथा स्वर्ग लोक में नहीं सत्य लोका में नहीं कैलाश में तथा वैकुण्ठ में भी नही जो कथा मृत्युलोक मे सहज ही प्राप्त है, “स्वर्गे सत्येच कैलाशे बैकुण्ठे नास्त्ययं रसः कथा श्रवण से मन शुद्धि तथा भगवान की कृपा प्राप्त होती है, इसलिए कथा सदा सर्वदा श्रवण करना चाहिए। भगवान को भूलना नहीं चाहिए परीक्षित के चरित्र वर्णन करते हुए कहा, माता कुन्ती ने भगवान से संवाद करते हुए भगवान ने कहा तुम मुझसे मांगो क्या चाहिए कुन्ती जी ने कहा था “विपद:सन्तु नः शश्वत् ” मुझे विपत्ति दे दो है वासुदेव तेरी याद विपत्ति में ही आती है यदि संपत्ति दे दोगे तो कहीं में आप को भूल न जाऊँ, भक्त भगवत प्राप्ति के लिए कष्ट में ही रहना चाहता है। कपिल देवहूति संवाद की सुंदर गूढ़ रहस्यों की व्याख्या की, सती चरित्र, मनु सतरूपा के जीवन चरित्र, उत्तानपाद, की विस्तृत कथा और उक्त उद्गार तृतीय दिवस पर श्रीमद्भागवत कथा पुराण की मीमांसा में नरसिंह पीठाधीश्वर डॉक्टर स्वामी नरसिंह दास जी महाराज ने नरसिंह मंदिर में कहे। इस अवसर पर व्यास पीठ पूजन अर्चन यजमान श्रीमती शालिनी पांडे ,श्रीमती गीता तिवारी, सावित्री उपाध्याय, विजय तिवारी, ने किया प्रो. वीणा तिवारी, जीवन कपिल, विध्येश भापकर, अंबर पुंज,आचार्य रामफाल शास्त्री एस बी मिश्रा कामता शास्त्री उपस्थिति रही।

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