शांतम प्रज्ञा आश्रम में मनाई सीता नवमी

जबलपुर दर्पण। नंदनी,जानकी,भूमिपुत्री ,जनकात्मजा , रामवल्लभा , भूसुता , मैथिली , जगत जननी मां सीता जी के पावन प्राकट्योत्सव सीता नवमी के शुभ अवसर पर शांतम प्रज्ञा आश्रम नशा मुक्ति, मनोआरोग्य, दिव्यांग पुनर्वास केंद्र में पूजन कार्यक्रम का आयोजन किया गया, इस शुभ अवसर पर आश्रम में उपचार ले रहे नशा पीड़ित बन्धुओं ने माँ जानकी स्तुति, जानकी स्त्रोत और माँ जानकी गायत्री मंत्र का पाठ कर माँ सीता और प्रभु श्री राम जी का पूजन कर सबके सुख,स्वास्थ्य,समृद्धि, खुशहाली की कामना की. शांतम प्रज्ञा आश्रम के संचालक क्लिनिकल साइकोलॉजीस्ट, फिलोसोफर मानस शास्त्री मुकेश कुमार सेन आश्रम में उपचार ले रहे नशा पीड़ितों को माँ सीता के जीवन के विषय में बताया.
सीता नवमी के दिन प्रभु राम और मां जानकी की पूजा करने से सुखी दांपत्य जीवन का आशीर्वाद मिलता है। साथ ही सभी मनोकामनाओं की भी पूर्ति होती है।आज यानी कि 16 मई 2024 को सीता नवमी मनाई जा रही है। इस दिन मां सीता की विधिपूर्वक पूजा और व्रत रखने का विधान है। हर साल वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को सीता नवमी का त्यौहार मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन माता सीता धरती पर प्रकट हुई थीं। इसीलिए आज के दिन को सीता नवमी के रूप में मनाया जाता है। बता दें कि सीता जी राजा जनक की पुत्री थीं, इसलिए उनका एक नाम जानकी भी है। सीता नवमी को जानकी जयंती के नाम से भी जाना जाता है। भी जाना जाता है।
पौराणिक कथा के मुताबिक, मिथिला की धरती पर कई वर्ष तक पानी की एक बूंद भी नहीं पड़ी थी। राजा जनक का पूरा राज्य पानी के बिना रेगिस्तान बना हुआ था। भयंकर अकाल और सूखे की वजह से मिथिला के लोगों को पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसना पड़ रहा था। अपनी भूखे और प्यासी प्रजा को देखकर राजा जनकर जी विचलित से रहने लगे। मिथिला की बिगड़ती हालात को देखकर ऋषियों ने राजा जनक से कहा कि वो सोने की हल खुद खेत में चलाएं, जिससे इंद्रदेव की कृपा उनके राज्य पर हो। इसके बाद जनक जी ने हल से खेत जोतना शुरू किया तभी उनका हल किसी बक्से से टकराया। फिर उन्होंने उस बक्सा को बाहर निकालकर देखा तो उसमें एक बच्ची थी। राजा जनक की उस समय कोई संतान नहीं थी, इसलिए उन्होंने उस बच्ची को गोद ले लिया और उसका नाम सीता रखा। राजा जनक की बेटी होने के कारण उन्हें जानकी जी भी कहा जाता है। इसके अलावा माता सीता को मैथिली और भूमिजा के नाम से भी पुकारा जाता है। दरअसल, भूमि से जन्म लेने की वजह से उनका नाम भूमिजा पड़ा। कहते हैं कि सीता जी के प्रकट होते ही मिथिला राज्य में जमकर बारिश हुई और वहां का सूखा दूर हो गया। माता सीता के चरित्र को शब्दों में लिख पाने का प्रयास करना भी बहुत ही जटिल कार्य है। माता सीता का स्वभाव से जितनी कोमल, मृदुभाषी और धैर्यशील थी, समय पड़ने पर उन्होंने अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए चंडी का रूप भी धारण कर लिया। श्रीराम के साथ माता सीता महल में राजसी ठाट-बाट के साथ भी रहीं और उन्होंने वनवास में रहकर अभावों में भी जीवन बिताया लेकिन उन्होंने कभी भी धैर्य नहीं खोया। रावण जब माता सीता का अपहरण करके ले गया, तो उन्होंने रावण के सामने हार नहीं मानी और अपने पतिव्रता धर्म पर अडिग रहीं। उन्होंने रावण की दुष्टता का विरोध किया और उसके छल को भी समझा। आखिर में जब श्रीराम ने लक्ष्मण द्वारा उन्हें वन में छोड़ आने को कहा, तो माता सीता ने लव-कुश को अकेले ही पाला और अंत में राम के पास वापस लौटने के स्थान पर अपने आत्मसम्मान के लिए धरती माता की गोद में समा गईं।



