उच्च न्यायालय ने पेंशन भोगी के विरुद्ध वसूली आदेश को रद्द किया

जबलपुर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति विवेक जैन की एकल पीठ ने अपने एक निर्णय में सेवानिवृत्ति प्राप्त पुलिस उप-निरीक्षक से ₹२,१२,८५४ की वसूली के राज्य आदेश को अवैध घोषित कर दिया है। माननीय उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता सी.एम. शुक्ला के प्रकरण में प्रतिपादित आदेश में स्पष्ट किया कि जब किसी पेंशनभोगी की मंशा, छल या दुराव छिपे न हो, तो प्रशासनिक त्रुटिवश प्रदत्त धनराशि की वसूली सेवानिवृत्ति के पश्चात न्यायसंगत नहीं है।
उल्लेखनीय है कि याचिकाकर्ता श्री सी.एम. शुक्ला, मध्य प्रदेश पुलिस के सेवानिवृत्त तृतीय श्रेणी के उप-निरीक्षक, ने दिनांक ३०.०४.२०२१ के वसूली आदेश को चुनौती दी थी, जिसके अधीन उनसे ₹१,२४,१३९ (मूलधन) एवं ₹८८,७१५ (ब्याज) सहित कुल ₹२,१२,८५४ की वसूली का प्रावधान था। राज्य का तर्क था कि यह राशि द्वितीय समयबद्ध वित्तीय उन्नयन (एसीपी) के रूप में ०१.०४.२००६ से त्रुटिवश प्रदान की गई थी। माननीय न्यायालय ने अपने आदेश में इस तथ्य पर विशेष बल दिया कि वसूली की कार्यवाही याचिकाकर्ता की सेवानिवृत्ति (३०.०४.२०२१) के पश्चात प्रारंभ की गई थी।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता श्री असीम त्रिवेदी ने न्यायालय में तर्क प्रस्तुत किया कि यह भुगतान प्रशासनिक भूल थी तथा इसमें न याची की ओर से न कोई छल था, न ही कोई मिथ्या विवरण दिया गया था और न ही उक्त लाभ देने के पूर्व इस आशय का कोई प्रतिज्ञापत्र निष्पादित किया गया था कि गलत भुगतान पर लाभ वापिस किये जायेंगे ।
न्यायालय ने अपने निर्णय में न्यायिक सिद्धांतों पर बल देते हुए निरूपित किया कि याचिकाकर्ता पर किसी प्रकार के कपट या तथ्यों के प्रति जानबूझकर गोपन का आरोप नहीं लगाया गया था। याचिकाकर्ता की सेवानिवृत्ति के पश्चात पेंशन निपटान प्रक्रिया (मई २०२१) के दौरान प्राप्त किए गए क्षतिपूर्ति बॉण्ड को “बलपूर्वक प्राप्त प्रतिज्ञापत्र” मानते हुए माननीय न्यायालय ने इसे सेंट्रल इनलैंड वाटर ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन लि. बनाम ब्रोजो नाथ गांगुली (एआईआर १९८६ एससी १५७१) एवं मध्य प्रदेश पूर्ण पीठ निर्णय (राज्य बनाम जगदीश प्रसाद दुबे, डब्ल्यूए संख्या ८१५/२०१७) के सिद्धांतों के अनुसार अवैध घोषित किया।
न्यायालय ने पंजाब राज्य बनाम रफीक मसीह (२०१५ (४) एससीसी ३३४) के ऐतिहासिक निर्णय को लागू करते हुए अभिनिर्धारित किया कि निम्न श्रेणी के सेवानिवृत्त कर्मचारियों से राज्य की भूलों के लिए वसूली नहीं की जा सकती।
उच्च न्यायालय ने याचिका स्वीकार करते हुए वसूली आदेश को निरस्त करते हुए आदेशित किया कि वसूली गई समस्त राशि का भुगतान याचिकाकर्ता को आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत होने की तिथि से तीन मास के भीतर किया जाए और निर्धारित अवधि में धनवापसी न होने पर याचिकाकर्ता को आदेश की तारीख से ६% वार्षिक दर से ब्याज प्राप्त करने का अधिकार होगा। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता असीम त्रिवेदी, आनंद शुक्ल, विनीत टेहेनगुरिया, शुभम पाटकर आदि ने पैरवी की।



