साहित्य दर्पण

बेसहारा मासूम बचपन

तनिक तो सुनलो ये बाबू
अब भूख नहीं होती काबू
न कोई छत हमारे सर
नंगे-भूखे है खाली कर l
सड़कों पर मलिन गलिन में
कर फैलाये धूप-वारिश में
ये मजबूरी विकट खडी है
उदर भरण की ठेय नहीं है l
कोई धुतकारे कोई है मारे
मजबूरी के हम है सारे
कोई तो सुध लो हे बाबू
अब भूख नहीं होती काबू l
पढ़ने-लिखने का मन करता
पाठशाला को मन तरसता
अच्छा लगता कन्धे बस्ता
ये अरमान नहीं है सस्ता l
तनिक तो सुध लो ये बाबू
सड़को पर नींद नहीं काबू
हम भी है ईश्वर की संतान
हमको भी मिले प्यार दुलार l
15 अगस्त और 26 जनवरी
मानते सब है राष्ट्रिय त्यौहार
हमें भी झंडा है फैराना
हमें भी राष्ट्रगान है गाना l
हमें भी लगाओ कोई क़तर
झण्डे को देना है सर सार
कोई तो सुध लो ये बाबू
मंच पे नाचने को मन बेकाबू l

कवी/लेखक
श्याम कुमार कोलारे
सामाजिक कार्यकर्ता
चारगांव प्रहलाद, छिन्दवाड़ा
मो. 9893573770

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