जबलपुर दर्पण

स्वास्थ्य विभाग में नाक के नीचे, चलता रहा पैसे का खेल

भ्रष्टाचार की मास्टरमाइंड’ दीपिका साहू के काले कारनामों का खुलासा मझोली स्वास्थ्य विभाग में लाखों का गबन हेर फेर एक और झलक

मनीष श्रीवास जबलपुर दर्पण । जबलपुर जिले में हुऐ स्वास्थ्य विभाग के लंबी भ्रष्टाचारी में एक और कारनामा उजागर हुआ हैं। देखा जाए तो विगत वर्षों में मझौली ब्लॉक के स्वास्थ्य विभाग की सारी सीमा पार हुई – जहां मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण विकासखंड मझौली में देखने को मिला है। यहाँ दीपिका साहू नामक कर्मचारी पर शासन की राशि का सुनियोजित ढंग से गबन करने और पद का दुरुपयोग कर पूरी जांच प्रक्रिया को ही ठप करने के गंभीर आरोप लगे हैं।

भ्रष्टाचार का ‘मोडस ऑपरेंडी’: ऐसे हुआ सरकारी धन का गबन –
सूत्रों से प्राप्त जानकारी और दस्तावेजों के अनुसार, दीपिका साहू ने कथित तौर पर एक संगठित गिरोह की तरह कार्य करते हुए शासन को लाखों की चपत लगाई है। उनके गबन का तरीका बेहद चौंकाने वाला भी दिखाई दिया है।
क्यों किया गया फर्जी भुगतान – सबसे पहले चुनिंदा आशा कार्यकर्ताओं को मिलीभगत कर 40,000 हज़ार से 45,000 हज़ार रुपये तक की अत्यधिक राशि का भुगतान कराया गया।

खुले आम राशि की अवैध वसूली – जैसे ही यह राशि आशा कार्यकर्ताओं के खातों में पहुंची, दीपिका साहू ने कथित तौर पर एक कंप्यूटर ऑपरेटर के माध्यम से डरा-धमका कर वह पैसा वापस नकद में ले लिया।

दस्तावेजों में हेराफेरी – ऑनलाइन कार्य और सरकारी पोर्टल में आशा सॉफ्टवेयर’ में गलत डेटा फीड कर इस अवैध भुगतान को वैध दिखाने का भी प्रयास किया गया।
( डिजिटल सेंधमारी ऐसा हुआ सरकारी धन का बंदर बांट )
दस्तावेज और प्राप्त जानकारी के अनुसार भ्रष्टाचार का यह खेल तकनीक और मिलीभगत के सहारे खेला गया है
लेखा जोखा में बड़ा खेल – आईडी पासवर्ड पर अवैध कब्जा का दुरुप्रयोग कर दीपिका साहू ने कथित तौर पर आशा सॉफ्टवेयर के महत्वपूर्ण आईडी एवं पासवर्ड अपने नियंत्रण में रखे हुए हैं इसी का फायदा उठाकर उत्तर में हेरा फेरी की और वित्तीय गवन को बड़ा अंजाम दिया।

नियम विरूद्ध पदभार क्यों दिया गया? – दीपिका साहू द्वारा खुद किया गबन, खुद बनीं ‘जांच अधिकारी यहीं पड़ी जिम्मेदारी भारी।

इस पूरे प्रकरण का सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि जब इस वित्तीय अनियमितता की खबरें उठीं, तो दीपिका साहू ने बड़ी चालाकी से खुद को ही जांच अधिकारी नियुक्त करवा लिया।

जांच पड़ताल में हुआ गोलमाल – खुद जांच अधिकारी बनकर उन्होंने अपने खिलाफ उठ रहे सबूतों को मिटाया और पूरे मामले में ‘गोलमाल’ कर अपनी नौकरी और गर्दन तो बचा ली थीं। फ़िर भी आ गए झमेले में।

क्यों रहा है मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारीका संरक्षण –
चर्चा है कि तत्कालीन रहे मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारीडॉ. संजय मिश्रा के वरदहस्त और संरक्षण के कारण दीपिका साहू ने बेखौफ होकर इस भ्रष्टाचार को अंजाम देती रहीं।

सरकारी आंकड़ों में धांधली की पूर्ण पुष्टि नजर आई –मुख्य खंड चिकित्सा अधिकारी द्वारा जारी पत्र (क्र/आशा/2024-25/1617) स्पष्ट करता है कि वंदना साहू जैसी कार्यकर्ताओं को एक ही माह में 46,175 रुपये तक का भुगतान किया गया । जो कार्य के अनुपात में असंभव है। यह सीधे तौर पर दीपिका साहू की निगरानी में हुआ आर्थिक अपराध बनता है।

कठोर कार्रवाई की उठीं मांग –इस खुलासे के बाद अब मझौली क्षेत्र में भी हड़कंप मच गया है। यहां मांग की जा रही है कि सुश्री दीपिका साहू को तत्काल पद से पृथक किया जाए।
उनकी और उनके करीबियों की संपत्तियों की जांच ईओडब्ल्यू से जरूर कराई जाए।
पूर्व मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारीकी भूमिका की भी सूक्ष्मता से जांच होनी चाहिए।
राज्य स्तर तक मिली भगत..
इस घोटाले के तार केवल स्थानी स्तर तक सीमित नहीं है आप है कि राज्य कार्यालय में पदस्थ (स्टेट कम्युनिटी मोबिलाइजर)के साथ साठ गांठ कर जिला कम्युनिटी मोबिलाइजर दीपिका साहू इन अवैध कार्यों को निर्बाध अंजाम दे रही है
इस प्रकार से शासन के वरिष्ठ अधिकारियों और भ्रष्टाचार में लिप्त विरोधी को यह चेतावनी है कि यदि दीपिका साहू महिला जैसी “भ्रष्ट” अधिकारियों पर लगाम नहीं कसी गई । तो जनता के टैक्स का पूरा पैसा इसी तरह लुटता रहेगा। और जाँच के नाम पर संरक्षण मिलता रहेगा।
इस बड़े भ्रष्टाचार मुद्दे और विभागीय जांच में कितनी बारीकी से जांच पड़ताल प्रशासन कर्ता हैं। फिलहाल मुख्य भूमिका इनकी क्या रहेगी

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