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मैं करूँ तो क्या करूँ.?

कल मैं शाम के समय अपने प्रांगण में टहल रहा था, तभी एक नवयुवक अपने मोटर साइकिल में आ पहुँचाउसने मुझसे कहा- मैं आपसे मिलना चाहता हूँमैं उसे ऑफिस में ले आया और उससे पूछा- क्या करते हो? उसने सहज ही उत्तर दिया- कुछ नहीं। तब मैंने कहा- कुछ तो करो। तो उसने उत्तर दिया- क्या करूँ? तो मैंने पूछा- कितना पढ़े हो? उसने उत्तर दिया- बी.ए. पास हूँ। तो मैंने कहा- कहीं काम पर लग जाओ। उसने कहा- मन नहीं लगता है। तो मैंने कहा- जीवन में आगे बढ़ने के लिये कहीं ना कहीं तो मन लगाना पड़ेगाआप चाहें तो दुकानों में भी काम कर सकते हैं, या अपने से कोई छोटा-मोटा धंधा शुरु कर सकते हैं, जिससे आपका जीवन अच्छा हो जाये। तब उसने कहादुकानों में से तनख्वाह बहुत कम मिलता है और धंधा चलता कहाँ है, तो मैं करूँ तो क्या करूँ, समझ में नहीं आतायुवाओं को समझ तभी आता है जब वह कुछ काम करना शुरु करते हैं। काम शुरु किये बिना ही हम ये सोच बैठते हैं कि इस काम में लाभ कम हैलाभ का शुरुआत हम कहीं से भी कर सकते हैंलेकिन काम करने का जज्बा और तमन्ना होना चाहिये। लेकिन यदि काम करने की इच्छा ही न हो, तो हम भी उसी नवयुवक के समान कहते फिरेंगे कि मैं क्या करूँ? जीवन में करने के लिये बहुत कुछ हैयदि इन्सान कार्य करने के लिये शुरु कर दे तो यह जीवन भी कम पड़ेगा, क्योंकि काम तो बहुत है। कुछ करने के लिये दृढ़ इच्छाशक्ति और लगन की जरुरत पड़ती है। यदि करने की इच्छा हो तो कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता है काम करने वाला बड़ा होता है, नहीं तो हर काम उसे बोझ लगने लगता है और जब बोझ बढ़ जाता है तो वह मनुष्य निराश, हताश और निठल्ला बैठ जाता है। ऐसे लोगों के लिये कहा जाता है- धोबी का कुत्ता, न घर का न घाट का। ऐसे व्यक्ति अपने माता-पिता के लिये बस बोझ बन कर रह जाते हैं। जहाँ उन्हें माता-पिता के लिये सहारा बनने की जरुरत है, वहीं माता-पिता इनकी जरुरतें पूरी करते हैं। इसीलिये मुझे और आपको जीवन में अपने आपको कुछ करने लायक बनायें ताकि जीवन व्यस्थित और उज्जवल हो सके।

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