भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष की नियुक्ति में विलम्ब क्यों : सांसद विवेक तन्खा

जबलपुर दर्पण। भारतीय प्रेस परिषद हमारे संविधान के चौथे स्तम्भ का वह सजग प्रहरी है जो भारतीय प्रेस की स्वतंत्रता अक्षुण रखने के साथ ही इस पर भी अपनी कड़ी नजर रखता है कि प्रेस एवं मीडिया अपनी आजादी का दुरूपयोग न कर सकें। प्रेसों द्वारा स्वतंत्र एवं निष्पक्ष सूचना का प्रसारण सुनिश्चित करना इसकी एक महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी है| प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया की स्थापना 4 जुलाई 1966 को हुई थी| यह केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत एक स्वायत्तशासी संस्था है। सर्वोच्च न्यायालय के निवर्तमान न्यायाधीश जस्टिस सी. के. प्रसाद ने प्रेस कौंसिल के अध्यक्ष के रूप में नवम्बर 2014 से नवम्बर 2021 तक सफलतापूर्वक अपने दो कार्यकाल को पूर्ण किया| किन्तु इसके पश्चात, विगत तीन महीने से भी अधिक समय से इस महत्त्वपूर्ण स्व-नियामक निकाय में अध्यक्ष की नियुक्ति न हो पाने के कारण इसमें एक शून्यता सी आ गयी है जिस कारणवश प्रेस हाउस की निगरानी अव्यवस्थित सी हो गयी है| इसके अध्यक्ष के अभाव में आज स्वतंत्र पत्रकारिता खतरे में है। देश में ऐसे कई व्यावसायिक घराने है जो इस निकाय की विचारधारा से समझौता कर सकते है। इस बात की भी सम्भावना है कि सरकारें अपने उद्द्येश्यों की पूर्ति के लिए प्रेस को एक निरंकुश उपकरण के रूप में इस्तेमाल कर सकती है। देश की जनता ने प्रेस कौंसिल को महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी दी हुई है। इस विचार के साथ मध्य प्रदेश से राज्य सभा सांसद विवेक तन्खा ने विशेष उल्लेख की सूचना द्वारा संसद में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का ध्यान आकर्षित किया कि केंद्र सरकार ने इतने महत्वपूर्ण पद को काफी लम्बे समय से खाली रखा है और साथ ही यह भी जानना चाहा कि क्या सरकार ने भारतीय प्रेस परिषद के अगले अध्यक्ष के चयन की प्रक्रिया शुरू कर दी है, और यदि हां, तो ऐसी महत्त्वपूर्ण नियुक्ति में विलंब क्यों किया जा रहा है।



