जबलपुर दर्पणमध्य प्रदेश

कबीरपरमेश्वर निर्वाण दिवस विशेष

जबलपुर दर्पण। हमारे सद्ग्रंथ प्रमाण देते हैं कि परमात्मा सह शरीर पृथ्वी पर प्रकट होते हैं तथा सह शरीर अपने निज धाम सतलोक को प्रस्थान करते हैं यही लीला 600 साल पूर्व कबीर साहेब जी ने की थी। आज तक जिन्हें पूरी दुनिया कवि मान रही थी वास्तव में वह पूर्ण परमात्मा सारी सृष्टि के रचनहार हम सभी आत्माओं के पिता हैं। वर्ष 1398 (विक्रम संवत 1455) को ज्येष्ठ की पूर्णिमा के दिन कबीर साहेब कमल के पुष्प पर प्रकट हुए तथा 120 साल इस पृथ्वी पर लीला करने के बाद सन् 1515 विक्रम संवत 1575 में परमात्मा कबीर साहेब जी सह शरीर सतलोक को प्रस्थान कर गए परंतु सबसे बड़ी विडंबना यह है आज तक किसी भी संत महंत या गुरु ने यह जानकारी भक्त समाज को नहीं दी क्योंकि वह सब खुद भी परमात्मा की लीलाओं से अनजान थे। वर्तमान में तत्वदर्शी संत रामपाल महाराज अपने सत्संगों के माध्यम से भक्त समाज को पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब तथा वेदों तथा अन्य सद्ग्रंथों में वर्णित परमात्मा की अद्भुत लीलाओं की सत्य जानकारी दे रहे हैं इसके साथ परमात्मा को प्राप्त करने की शास्त्र अनुकूल साधना बता रहे हैं।

‘कबीर साहेब द्वारा पाखंड का पर्दाफाश:-‘
कबीर साहेब का नाम सर्व विदित है। कबीर साहेब का नाम सभी जानते हैं और यह भी जानते हैं कि वे भारतीय इतिहास के मध्यकाल में भक्ति के कितने बड़े पुरोधा थे। कबीर साहेब पहले थे जिन्होंने रंग, लिंग, धर्म, जाति के परे भक्ति के द्वार सभी मनुष्यों के लिए खोले। कबीर साहेब ने हिंदू व मुस्लिम दोनों धर्मों के लोगों की कुरीतियों एवं अंध विश्वासों के लिए कड़ी फटकार जन सामान्य को लगाई। कबीर साहेब ने न केवल रूढ़ियों का खण्डन किया बल्कि जन सामान्य के लिए एक भक्ति का मार्ग प्रशस्त किया। यह सदैव ध्यान रहे कि वह युग नकली एवं दंभी ब्राह्मणों द्वारा धार्मिक रूप से जनता को गुमराह करने का था। काशी का करौंत, मगहर और काशी के संबंध में भ्रामक जानकारी, केवल संस्कृत पठन को अध्यात्म मानना, जाति बंधन और केवल उच्च जाति को भगवान की भक्ति का अधिकार इस प्रकार की भ्रांतियां इसका प्रमाण हैं।

कबीर, पत्थर पूजें हरी मिले तो मैं पूजूं पहाड़ |
तातें तो चक्की भली, पीस खाए संसार ||

‘कबीर साहेब का प्राकट्य:-‘
कबीर साहेब आज से 600 वर्ष पहले काशी के लहरतारा तालाब पर उपस्थित कमल के फूल पर प्रकट हुए थे। इस दृश्य के गवाह थे रामानंद जी के शिष्य ऋषि अष्टानंद जो उस समय तालाब के किनारे ही साधना कर रहे थे। नीरू और नीमा नामक ब्राह्मण दंपत्ति (जबरन मुस्लिम धर्म परिवर्तन किया गया था) को कबीर साहेब प्राप्त हुए। वेदों में वर्णित परमात्मा के लक्षणों के अनुसार उन्होंने अपना पोषण कुंवारी गायों के दूध से किया (ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 1 मन्त्र 9 में)। कबीर साहेब ने स्वामी रामानंद जी को स्वयं अपनी लीला से गुरु चुना और उन्हें सत्यलोक की स्थिति एवं अपने परमेश्वर रूप से परिचित करवाया।

‘कबीर साहेब की लीलाएं:-‘
आज से 600 वर्ष पहले जब आबादी नाम मात्र हुआ करती थी, कबीर साहेब के 64 लाख शिष्य बन गए थे। कबीर साहेब की क्षमता, लोकप्रियता और ज्ञान से सिकंदर लोदी का पीर शेख तकी, कबीर साहेब का दुश्मन बन बैठा। सिकंदर लोदी कबीर साहेब के समक्ष नतमस्तक रहता था क्योंकि कबीर साहेब ने सिकंदर लोदी को ऐसा स्वास्थ्य लाभ दिया था जिसे अनेकों वैद्य, ज्योतिष और तंत्र मंत्र साधक ठीक नहीं कर सके थे। शेख तकी इस ईर्ष्या भाव से कबीर साहेब को जान से मारने की योजना बनाता लेकिन हर बार असफल होता क्योंकि परमेश्वर अजर, अमर और सर्वशक्तिमान है। शेख तकी की बदमाशियों में कबीर साहेब को आरे से काटना, गंगा में डुबाने का प्रयास करना, खूनी हाथी से कुचलवाना आदि सम्मिलित हैं
किंतु प्रत्येक बार कबीर साहेब ने सभी को क्षमा किया था। शेख तकी ने एक बार कबीर साहेब के नाम से पूरे देश भर में भंडारे के आमंत्रण की झूठी चिट्ठियां फैला दीं। कबीर साहेब ने केशव रूप बनाकर 18 लाख साधु संतों को विशाल भंडारा करवाया और आमंत्रण में कहे अनुसार स्वादिष्ट भोजन, एक दोहर और एक स्वर्ण मोहर दान में दी। परमेश्वर के लिए कुछ भी असंभव नहीं है इस बात का प्रमाण कबीर साहेब ने दिया। साथ ही यह प्रमाणित किया कि जो भी इस प्रकार के आदर्श जीवन को अपनाएगा, परमेश्वर में पूर्ण आस्था रखेगा और भक्ति करेगा उस भक्त की आवश्यकता पड़ने पर कबीर साहेब सहायता करेंगे। इस प्रकार कबीर साहेब ने सदैव अपनी समर्थता का परिचय दिया।
कबीर साहेब का संपूर्ण जीवन अपनी आत्माओं के प्रति समर्पित रहा, उन्होंने सही तत्वज्ञान सुनाया और जनता को जगाया। उन्होंने पूर्ण परमेश्वर और उसके लक्षणों से जनता को परिचित करवाया। कबीर साहेब ने अनेकों चमत्कार भी किए। आम जनमानस के लिए यह चमत्कार थे। कमाल और कमाली जिन्हें परमेश्वर कबीर की संतानें कहा जाता है वे मुर्दे थे जिन्हे अनेकों की भीड़ के समक्ष कबीर साहेब ने जीवित किया और पूरे जीवन अपना बेटा बेटी मानकर पोषण किया।

‘सबसे बड़े समाज सुधारक, कबीर साहेब:-‘
कबीर साहेब ने अनेकों भ्रांतियां तोड़ीं। उन्होंने अपनी वाणियों के माध्यम से अंधविश्वास, जाति प्रथा, अनुचित मान्यताओं के लिए आवाज उठाई। कबीर साहेब वास्तव में परमात्मा थे। कबीर साहेब ने दोनों धर्मों को प्रेम से रहने का संदेश दिया। स्वयं एक जुलाहे की भूमिका निभाते हुए एक आदर्श जीवन कैसा होना चाहिए इसका परिचय दिया। स्वयं निरक्षर होने की भूमिका की किंतु सृष्टि रचना से जुड़े अनेकों रहस्यमय उद्घाटन उन्होंने जनता के समक्ष किए। सभी धर्मों और शास्त्रों के आधार पर एक सर्वोपरि आध्यात्मिक ज्ञान को तर्क सहित बताना और सबके समक्ष प्रमाण सहित पेश करना निश्चित ही स्वयं परमेश्वर कर सकते हैं। वेदों में प्रमाण भी है कि परमात्मा स्वयं इस संसार में आते हैं और अपना तत्वज्ञान अपनी प्रिय आत्माओं को सुनाते हैं। कबीर साहेब ने आडंबरों एवं गलत प्रथाओं जैसे मूंड मुड़ाना, मांसाहार करना, बलि चढ़ाना, मंदिरों एवं मस्जिदों में पूजा, हिंदू मुस्लिम भेदभाव का पुरजोर विरोध किया।

अपने लला के बाल उतरवावैं, कह कैंची न लग जइयाँ |
एक बकरी का बच्चा लेकर, उसका गला कटाईयाँ ||

‘काशी करौंत के पाखंड का उजागर करना:-‘
हिंदू धर्म में तत्कालीन समय के ब्राह्मणों ने अतिशय लालच के कारण एक योजना बनाई कि शिव जी का आदेश हुआ है कि काशी में मरने वाला बिना रोक टोक स्वर्ग जाता है एवं मगहर में मरने वाला नरक जाता है। धर्मगुरुओं की आज्ञानुसार लोगों ने अपने वृद्ध माता पिता को काशी में ही छोड़ना शुरू कर दिया। काशी के पंडितों ने आज की तरह ही काशी में अलग अलग क्षेत्र बांट रखा था। जब उन्होंने देखा कि काशी में भीड़ बढ़ रही है तो उन्होंने एक अमानवीय उपाय अपनाया। गंगा के किनारे एकांत स्थान पर एक करौंत (एक प्रकार का बहुत बड़ा आरा) दो तरफ से लगाया और यह झूठ फैला दिया कि गंगा के किनारे परमात्मा ने एक करौंत भेजा है, जो अपनी मुक्ति चाहता है वह करौंत से सीधा मुक्ति पा सकता है। इसकी उन्होंने दक्षिणा भी बताई। वृद्ध भी अपने जीवन से तंग आकर कह देते कि हमारा जल्दी उद्धार करवा दो। इस प्रकार का यह आडम्बर उस समय बहुत प्रसिद्ध हुआ। लोग अपनी मुक्ति करवाने लगे। काशी के करौंत के विषय में कबीर साहेब ने समझाया कि यदि बिना भक्ति किए मोक्ष पाना इतना सरल होता तो वनों में जाकर तपस्या क्यों करते। राजा अपना राजपाट तक केवल मोक्ष की आशा में त्याग देते हैं। इस निंदनीय कृत्य के फलस्वरूप यह धारणा पक्की हो गई कि काशी में मरने वाला स्वर्ग जाता है और मगहर में मरने वाला नर्क। इस रूढ़ी को तोड़ने के लिए कबीर साहेब ने मगहर लीला की।

गरीब बिना भगति क्या होत है, भावैं कासी करौंत लेह।
मिटे नहीं मन बासना, बहुविधि भर्म संदेह ।।

‘कबीर साहेब का मगहर प्रस्थान:-‘
कबीर साहेब के प्राकट्य के साक्षी ऋषि अष्टानंद थे किंतु उनके सशरीर सतलोक गमन के समय हजारों की संख्या में लोग मौजूद थे। उस समय ब्राह्मणों ने यह भ्रांति फैला रखी थी कि काशी में मरने वाला स्वर्ग जाता है और मगहर में मरने वाला गधा बनता है। कबीर साहेब ने अपने शरीर त्याग के समय काशी में एलान किया कि मैं मगहर से सतलोक जाऊंगा। सभी काशी के पंडित और ज्योतिषों से भी कहा कि वे अपने पोथी पत्र लेकर चलें और बांच लें कि कबीर साहेब कहां गए हैं। कबीर साहेब के सभी शिष्य भी साथ चले उन शिष्यों में मगहर रियासत के स्वामी बिजली खान पठान और काशी नरेश वीर सिंह बघेल भी सम्मिलित थे। कबीर साहेब के साथ पूरा काफिला मगहर चल पड़ा। मगहर पहुंचते ही कबीर साहेब ने स्नान की इच्छा जताई। मगहर रियासत के स्वामी बिजली खान पठान ने बताया कि इतना जल उपलब्ध नहीं है कि हजारों लोग स्नान कर पाएं किंतु शिव जी के श्राप से सूखी पड़ी एक आमी नाम की नदी है। तब परमेश्वर कबीर के पूछने पर वह नदी उन्हें दिखाई गई जिसे कबीर साहिब ने अपने आशीर्वाद से पुनः जलमग्न कर दिया।

‘हिंदू मुस्लिम के बीच विशाल गृहयुद्ध को टालना:-‘
कबीर साहेब के शिष्यों में हिंदू और मुसलमान दोनों ही धर्मों के लोग थे और दोनों धर्मों के लोग अपनी अपनी रीति से उनका अंतिम संस्कार करना चाहते थे। उन्होंने पूरी तैयारी कर रखी थी कि कबीर साहब के शरीर त्यागने के पश्चात वे आपस में युद्ध करके साहिब का शरीर हासिल करेंगे। एक चादर बिछाई गई और उसके ऊपर फूलों की तह बिछाई गई। परमात्मा से कुछ नहीं छिपा है। कबीर साहब ने दोनों धर्मों के लोगों को एक साथ रहने और आपस में लड़ाई झगड़ा ना करने की शिक्षा दी थी। अंत समय भी उन्होंने कहा कि कोई भी आपस में झगड़ा नहीं करेगा, चादर के नीचे जो भी मिले उसे आप दोनों ही धर्मों के लोग आपस में आधा-आधा बांट ले। चादर पर परमेश्वर कबीर जी दूसरी चादर ओढ़कर लेटे। कुछ समय में आकाशवाणी हुई कि चादर उठाकर देख ली जाए इसके नीचे कुछ भी नहीं है और जब चादर हटाई गई तो वास्तव में उसके नीचे केवल सुगंधित पुष्प मिले। इस दृश्य के गवाह हजारों लोग थे। आज भी इतिहास की किसी पुस्तक में यह उल्लेख नहीं मिलता कि कबीर साहेब का कोई शरीर पाया गया था। चादर के नीचे मिले उन पुष्पों को आपस में बांटकर हिन्दुओं और मुसलमानों ने अपनी- अपनी यादगार बनाई। कुछ पुष्प काशी ले जाए गए और एक चबूतरा बनाया गया जो कबीर चौरा के नाम से प्रसिद्ध है। यह कबीर साहेब की मगहर लीला थी।

कीन्हाँ मघर पियाँना हो, दोन्यूं दीन चले संगि जाकै, हिंदू मुसलमाना हो ||
मुक्ति खेत कूं छाडि चले है, तजि काशी अस्थाँना हो |
शाह सिकन्दर कदम लेत है, पातिशाह सुलताँना हो ||

‘कबीर परमात्मा का 505वां निर्वाण दिवस:-‘
जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज के सानिध्य में “परमेश्वर कबीर बंदी छोड़ जी के 505वें निर्वाण दिवस” के उपलक्ष्य में अमरग्रन्थ साहेब के 3 दिवसीय अखंड पाठ का 30-31 जनवरी 2022 से 01 फ़रवरी 2023 तक सतलोक आश्रम, रोहतक (हरियाणा) से सीधा प्रसारण होगा। आप समापन समारोह को साधना चैनल और पॉपकॉर्न मूवी चैनल पर 1 फरवरी को सुबह 9:15 बजे देख सकते है। आज से लगभग 505 वर्ष पूर्व (महीना माघ, शुक्ल पक्ष, तिथि एकादशी वि. स. 1575 सन् 1518 को) परमेश्वर कबीर बंदी छोड़ जी उत्तरप्रदेश के मगहर कस्बे से लाखों लोगों के सामने सशरीर सतलोक (ऋतधाम) को प्रस्थान किए थे, उसी दिन की याद में 9 सतलोक आश्रमों में विशाल महाभंडारे का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें निःशुल्क नामदीक्षा, रक्तदान शिविर, दहेज व आडंबर रहित आदर्श विवाह आदि का भी आयोजन किया जा रहा है। इस विशाल महा-भंडारे में आप सभी सादर आमंत्रित हैं।

संत रामपाल जी से निःशुल्क नामदीक्षा लेने के लिए या अपने नजदीकी नामदीक्षा सेंटर का पता करने के लिए संपर्क करें 8222880541.

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