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सत्य से बढ़कर धर्म नहीं

आलेख : आशीष जैन (उप संपादक) दैनिक जबलपुर दर्पण

नहीं सताऊं किसी जीव को, झूठ कभी ना कहा करू। पर धन वनिता पर लुभाउँ, संतोषमृत पिया करूँ। अहंकार का भाव रक्खूँ, नहीं किसी पर क्रोध करूँ। देख दूसरों की बढ़ती को, कभी न ईष्या भाव धरूँ। रहे भावना ऐसी मेरी, सरल सत्य व्यवहार करूँ। बने जहां तक इस जीवन में, औरों का उपकार करूँ।

दशलक्षण पर्यूषण महापर्व के शुभ अवसर पर उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव एवं उत्तम शौच धर्म के बाद उत्तम सत्य धर्म का पालन जैन धर्मावलंबी श्रावक श्राविकाएँ पालन करते हुए उत्तम सत्य धर्म को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करते हैं। जैन समाज के प्रमुख सूत्रों में सत्य को विशेष महत्व दिया गया है। सत्य से बड़ा इस जीवन में और कोई दूसरा धर्म नहीं हो सकता सत्य को छुपाया या दबाया नहीं जा सकता।

भारत का राष्ट्रीय चिह्न के नीचे देवनागरी लिपि में राष्ट्रीय आदर्श वाक्य सत्यमेव जयते लिखा रहता है। जिसका अर्थ सत्य ही जीतता है या सत्य की ही जीत होती है। सत्य का शाब्दिक अर्थ होता है सते हितम् यानि सभी का कल्याण हो। इस कल्याण की भावना को हृदय में बसाकर ही व्यक्ति सत्य बोल सकता है। एक सत्यवादी व्यक्ति की पहचान यह है कि वह वर्तमान, भूत अथवा भविष्य के विषय में विचार किये बिना अपनी बात और सत्य पर दृढ़ रहता है।

उत्तम सत्य धर्म से तात्पर्य है सत्य बोलो और धर्म का आचरण करो। क्रोध, लोभ, भय और हँसी-मजाक आदि के कारण ही झूठ बोला जाता है। जहाँ न झूठ बोला जाता है, न ही झूठा व्यवहार किया जाता है वही लोकहित का साधक सत्यधर्म होता है। मनुष्य के मन, वाणी तथा शरीर द्वारा एक जैसे कर्म होने चाहिए। ऐसा हमारे धर्म शास्त्र कहते हैं। मन में कुछ हो, वाणी कुछ कहे और कर्म सर्वथा इनसे भिन्न हों, इसे ही मिथ्या आचरण कहा गया है। चार उत्तम सत्य हैं, जहाँ न झूठ बोला जाता है, न ही झूठा व्यवहार किया जाता है वही लोकहित का साधक सत्यधर्म होता है।

जैनागम के अनुसार जैन आचार्य एवं मुनि सभी जाति एवं धर्म के लोगों को सत्य बोलने और धर्म का आचरण करना सिखाते है। क्रोध, लोभ, भय और हँसी-मजाक आदि के कारण ही झूठ बोला जाता है। जहाँ न झूठ बोला जाता है, न ही झूठा व्यवहार किया जाता है वही लोकहित का साधक सत्यधर्म होता है। सभी को कठोर, कर्कश, मर्मभेदी वचनों का प्रयोग नहीं करना चाहिए जब भी बोलें मधुर बोलें। एक प्रसिद्ध दोहे में कहा गया ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय। औरन को शीतल करे, आपहुँ शीतल होय। सत्य का संबंध तो अहिंसा से है। अहिंसा सत्य को सौंदर्य प्रदान करती है और सत्य ‍अहिंसा की सुरक्षा करता है। अहिंसा रहित सत्य कुरूप है और सत्य रहित अहिंसा क्षणस्थायी है। अहिंसा और सत्य एक सिक्के के दो पहलू है। अहिंसा के अभाव में सत्य एवं सत्य के अभाव में अहिंसा की स्थिति नहीं है। साबुन से वस्त्र स्वच्छ होता है। वैसे ही वाणी सत्य से निर्मल होती है। सत्य पर सारे तप निर्भर करते हैं। जिन्होंने सत्य का पालन किया, वे इस संसार से पार हो गए, मुक्त हो गए। सत्य ही संसार में श्रेष्ठ है। सत्यवादी की जग में सदा ही विजय होती है। सभी को दशलक्षण पर्व की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। जय जिनेंद्र।

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