गणेश उत्सव में होती है महालक्ष्मी की विशेष आराधना

जबलपुर दर्पण। मराठा साम्राज्य के अधिपत्य के बाद जबलपुर संस्कारधानी में मराठी भाषी आकर यहीं पर बस गए मराठी तीज त्यौहार भी धूम धाम शुरू हो गई। महाराष्ट्र का प्रमुख गणेशोत्सव के साथ महालक्ष्मी की तीन दिवसीय विशेष पूजन अर्चन किया जाता है , पूजन में नक्षत्रों का विशेष महत्व होता है, जेष्ठा अनुराधा मूल नक्षत्र में तीन दिवसीय उत्सव होता है।
जेष्ठा में स्थापना अनुराधा का पूजन अर्चन और मूल नक्षत्र के लगते हैं महालक्ष्मी के विसर्जन का पूजन होता है। जबलपुर के मराठी परिवारों में महालक्ष्मी की स्थापना की गई है। घरों में महालक्ष्मी के पद्चिन्ह बनाकर तीन दिवसीय लक्ष्मी पूजन का शुभारंभ हुआ। मराठी समाज में मान्यता है कि तीन दिनों के लिए देवी महालक्ष्मी अपने परिवार के साथ पृथ्वी लोक में भ्रमण के लिए आती हैं। उनके स्वागत के लिए ही यह पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा। स्थापना, पूजन और विदाई
पहले दिन लक्ष्मी के रूप ज्येष्ठा-कनिष्ठा दोनों बहनों की प्रतिमाओं के साथ उनके बेटे-बेटी की भी स्थापना की जाती है। जिस प्रकार बेटी मायके आती है उसी प्रकार माना जाता है कि महालक्ष्मी भी अपने मायके आईं हैं। परिवार के छोटे-बड़े सभी मिलकर आराधना करते हैं। घरों में फूलों, रंगोली और आकर्षक विद्युत सज्जा की जाती है। बनते हैं पकवान करंजी , सेव, अनारसे, लाडू, पापडी, नारियल खोबरे के लड्डू सहित विशेष पकवान बनाए जाते हैं। स्थापना, पूजन और विदाई पहले दिन लक्ष्मी के रूप ज्येष्ठा-कनिष्ठा दोनों बहनों की प्रतिमाओं के साथ उनके बेटे-बेटी की भी स्थापना की जाती है। जिस प्रकार बेटी मायके आती है उसी प्रकार माना जाता है कि महालक्ष्मी भी अपने मायके आईं हैं। परिवार के छोटे-बड़े सभी मिलकर आराधना करते हैं। घरों में फूलों, रंगोली और आकर्षक विद्युत सज्जा की जाती है। स्थापना के दूसरे दिन सभी रिश्ते-नातेदारों व दोस्तों को प्रसाद वितरित किया जाता है। इस दिन विशेष तौर पर पूरन पोली, लड्डू, सोलह प्रकार की सब्जी, चटनी, कढ़ी व अन्य पकवान बनाए जाते हैं। तीसरे दिन महालक्ष्मी को विदा किया जाता है। महिलाएं महालक्ष्मी का सुहागिनों की तरह सोलह श्रृंगार करती हैं। गोद भरी जाती है। साथ ही महिलाएं और अन्य परिजन भी नए कपड़े पहनकर तैयार होकर महालक्ष्मी का पूजन करते हैं। परिवार वाले तन-मन-धन से महालक्ष्मी की सेवा करते हैं ताकि कोई कमी न रह जाए। हेमंत प्रेरणा पोहरकर ने बताया कि हमारे यहां महालक्ष्मी के पूजन की परंपरा वर्षों पुरानी है। देवी की प्रतिमा मुखौटे जो लगभग 150 वर्ष पुराने हैं। शास्त्री नगर निवासी प्रवीण प्राजक्ता बिप्रदास ने बताया कि परिवारों में अपनी-अपनी परंपराओं के अनुसार ही महालक्ष्मी का पूजन किया जाता है। हमारे यहां 16-16 दूर्वा, अधध्दा झारा ,कैना की जुडी विशेष रूप से चढाई जाती हैं। प्रभाकर पोहरकर, प्रतिभा पोहरकर, प्रेरणा पोहरकर, साधना पोहरकर, प्रवीण विप्रदास,
परिवार में उत्सव की धूम धाम है।



