साहित्य दर्पण
शाम और ख़्याल

शाम होते ही ख्याल आता है
जिंदगी की सांझ सा तू
गुज़र गया है जिंदगी से
हर अब्र और आवाज,
झलक तुम्हारी देख कर,
हलक पर रह गई है।
मेरी हर नजर को,
शाम होते ही ख्याल आता है।
जिंदगी की उलझनों को
सुलझा जिंदगी की पहेलियां,
तुम्हें, अपनी सुबह बनाउंगा
हां फिर से दोहराऊंगा
अपने प्रेम गीत को
साथ तुम्हारे गाऊंगा।
सपने जो है मेरे,
आंखों में तुम्हारे
मैं जरूर सजाऊंगा।
छूट गये रिश्तों में
फिर से जान दिलाऊंगा ।
तुम्हें मैं अपने शब्दों में पिरो,
अपनी कविताओं में सजाऊंगा।
शाम होते ही ख़्याल आता है।



