जबलपुर दर्पणमध्य प्रदेश

अभीष्ट गुणों की किंग …. श्रीमती नीतू सिंह

संस्कारों में लिपटी पैदा हुई नीतू ‌। आरा जिले में अपने संस्कारित माता पिता के आंगन में यह नन्ही परी उतरी थी ‌। शांतचित, श्रोता का भाव लिए, सहजता की मूर्ति, आनन पर स्थाई सौम्यता लिए, शालीनता की धनाढ्य, सदाचार, सद व्यवहार, धीर गंभीर, मंजुलता के गुण लिए धीरे-धीरे बड़ी हो गई। संस्कारी तो थी ही संग में पढ़ लिख कर ये प्रज्ञ सुबोध सुधी मनीषी भी बन कर निखरी।प्रभु में भी आस्था की कोई कमी न थी। समय रहते अपने ही समान सुंदर कलित ललाम आरा जिले के ही जितेंद्र सिंह से नीतू जी का विवाह हुआ। नीतू के सास ससुर आरा के अत्यंत सभ्रांत और प्रतिष्ठित‌ जाने माने जाते हैं। सिंह कुल में आज भी पुत्रवधुएं बड़ों का सम्मान करने हेतु घूंघट लिए रहती हैं। अति मर्यादित नीतू ने इसे सहर्ष स्वीकार किया। अंतराल में नीतू और जितेंद्र के दो बहुत ही सुंदर पुत्र हुए। जितेंद्र की नौकरी क्योंकि जबलपुर में लग गई थी इसलिए नीतू और जितेंद्र अपने दोनों पुत्रों शिवांश और शौर्य सहित जबलपुर में रहने लगे। एक सोसाइटी में इन्होंने अपना मकान भी ले लिया। आदर्श पुत्रवधु तो थी ही आदर्श पत्नी और आदर्श मा का रुप भी नीतू में हम सबने देखा ।पहले परिचय में ही नीतू मुझे बहुत कुलीन सरल और भोली लगी । आंखों में लज्जा, वाणी में मधुरता, और सम्मान का भाव लिए अपना परिचय दे रही थी। उस समय वह अपने दोनों बच्चों को मेन रोड से घर ला रही थी। नीतू नित अपने बच्चों को स्कूल छूटने के बाद जब बच्चे मेन रोड पर बस से उतरते थे तो मेन रोड से लाती थी । सुबह उठकर जितेंद्र को टिफिन बना कर देती‌ हूं फिर पूजा पाठ में ध्यान लगाती हूं और फिर बच्चों को‌ मेनरोड से लाकर उन्हें खाना खिलाती हूं। मेरे पूछने पर नीतू ने यह सब बताया। जब नीतू यह सब बता रही थी उस समय वह बच्चों के बस्ते अपने कंधों पर टांगे थी। अपनी बात बहुत मंद मंद और मीठी वाणी में कर रही थी यूं लग रहा था जैसे धीमा धीमा संगीत बज रहा हो।
एक बार जितेन्द्र के माता-पिता एक महीने के लिए बेटे बहू के घर रहने आरा से जबलपुर आए । पूरा महीना नीतू घर से नहीं निकली । जब भी अपने किसी कार्य के लिए निकली तो सिर पर सदैव पल्लू रहा। मुझे नीतू की एक महिला मित्र ने बताया कि नीतू के सास-ससुर जब जब रहने को आते है तो नीतू मर्यादा और संस्कार की मूर्ति बन जाती है। ससुर के सामने सदा घूंघट ओढ़े रहती है और सिर पर पल्लू रखे‌ रहती है। सास ससुर की खूब सेवा करती है। सास ससुर भी अपनी इस बड़ी बहू को बहुत स्नेह और लाड़ देते हैं। नीतू इस समय किसी रेस्टोरेंट अथवा होटल में नहीं जाती। नीतू जीतेंद्र दोनों बेटे शौर्य और शिवांश और नीतू के सास ससुर मिलकर किसी न किसी मंदिर के दर्शन करने जाते हैं । शालीनता‌ में एक रत्ती भी कमी नहीं रखती नीतू । संस्कारों की गठड़ी कहने में मुझे कोई संकोच नहीं होगा।नीतू के जीवन में एक ऐसी घटना घटी थी जो वह आज तक उसे भुला नहीं पाई है। आज भी उस घटना को याद करके सिहर जाती है और छठ माता को धन्यवाद देती रहती है। यह बात 8 सितंबर 2012 की है। नीतू प्रेग्नेंट थी और आरा में थी । जितेंद्र उस समय भोपाल में जॉब में था और उसे जबलपुर में पावर प्लांट में नौकरी मिल गई थी और भोपाल में वह अपना सामान पैक कर जबलपुर आने की तैयारी कर रहा था। नीतू का अभी सेवेन मंथ ही चल रहा था कि अचानक नीतू को बहुत भयंकर पेनहुआ। आरा में डॉक्टरों ने उसे पटना हॉस्पिटल में रेफर कर दिया। नीतू को पटना लाया गया। जितेंद्र को जैसे ही पता लगा उसने असिस्टेंट द्वारा अपना सामान जबलपुर भिजवा दिया और ऑनलाइन ‌से‌ एक माह के‌ बाद की जॉइनिंग का अग्रिम आदेश ले लिया। जितेंद्र झट से पटना पहुंच गये । सात महीने के प्रीमेच्योर शिशु शौर्य ने जन्म लिया। शिशु को नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट में रखा गया। शिशु को लगभग एक माह नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट में रखा गया। यह एक महीना जितेंद्र नीतू और जितेंद्र की मम्मी ने किस प्रकार व्यतीत किया होगा उसके लिए मेरे पास शब्द नहीं है। हर समय ह्रदय में भय लिए ये तीनों छठ माता की प्रार्थना करते रहे। एक एक पल भारी था। आशंका में जी रहे थे। हर सप्ताह डाक्टर निरीक्षण करते थे और कहते थे एक सप्ताह और। फिर एक माह पश्चात माता ने पुकार सुनी और शौर्य स्वस्थ हो गये। डॉक्टर ने नीतू को आरा में जाकर आराम करने की सलाह दी पर नीतू वही डटी रही। अपना दर्द सब कुछ भूल गई और बच्चे की चिंता में लगी रही। इस प्रकार इन तीनों का तप और साधना रंग लाई।
मुझे इस सोसाइटी मे़ं रहते लगभग 6 वर्ष हो गए है। नीतू मुझसे पहले ही इस सोसाइटी में रह रही है। इन 6 वर्षों में मैंने कभी भी नीतू को किसी के प्रति अपशब्द कहते अथवा किसी की निंदा करते सुनी हो। सबके बीच चुपचाप आकर बैठ जाती है। सबकी बातें चुपचाप सुनती रहती है कुछ नहीं बोलती। ये बात एकदम सच है कि संस्कारी ही एक अच्छा श्रोता हो सकता है । यदि नीतू को कुछ बोलना भी होता है तो हंसकर बहुत थोड़ा बोलकर चुप हो जाती है। बड़ों को सम्मान देना कोई नीतू से सीखे। शाम को जब मैं सोसाइटी में टहलता हूं तो वह पार्क में अपने मित्र महिलाओं के साथ मार्बल की पट्टी पर बैठी मिलती है। मुझे दूर से ही देख कर दोनों हाथ जोड़कर नमन करती है। ये एक बार नहीं हर बार करती है। मुझे यूं लगता है जैसे नीतू नहीं मेरे सामने संस्कार हैं। मुझ अकेले को ही नहीं नीतू सभी बड़ों का हृदय से सम्मान करती है।नीतू अर्थात बबली । जितेंद्र जी नीतू को घर में प्रायः बबली के नाम से पुकारते हैं । एक बार मैं सोसाइटी की गलियों में टहल रहा था। जैसे ही मैं नीतू के घर के सामने से निकला पीछे से जितेंद्र जी ने आवाज लगाई अंकल अंकल आओ चाय पी लें। मैं जितेंद्र के स्नेह से भरे आग्रह को टाल नहीं पाया और जितेंद्र के घर चला आया। अभी बैठा ही था की नीतू एक बहुत बड़े बाउल में गाजर का हलवा ले आई। गाजर का हलवा बचपन से मेरी कमजोरी रहा है। जैसे ही नीतू ने कहा अंकल जी हलवा खाइए मैंने झट से हलवा उठाया और फट से खा गया। इतना स्वादिष्ट गाजर का हलवा खाकर मेरे मुंह से वाह वाह निकल गया। सच में नीतू गाजर का हलवा बहुत अच्छा बनाती है। जब से खाया तब से अभी तक उसका स्वाद मुझे याद है। फिर नीतू चाय और नमकीन भी ले आई। ये नीतू के संस्कार ही थे जिसे मैंने उसे एक आदर्श ग्रहणी के रूप में देखा।
संस्कारी नीतू। लोग कहते हैं कि संस्कार लुप्त हो गए हैं । लेकिन मैंने जब जब नीतू को देखा मुझे कहीं भी नहीं लगा कि संस्कार लुप्त हो गए हैं। संस्कारों में लिपटी सदैव एक आदर्श बिटिया बहू पत्नी और मां के रूप में रहती है नीतू। 15 वर्ष के दांपत्य जीवन में नीतू और जीतेंद्र एक आदर्श पति पत्नी के रूप में देखे गए हैं। ये नहीं कि संस्कार नीतू का दिखावा मात्र है लेकिन सच में ये अति संस्कारी है। जो संस्कारी होता है वही अभीष्ट गुणों को जन्म देता है। अभीष्ट गुणों की स्वामिनी है नीतू।

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