औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों के भर्ती नियमों की संवैधानिकता को चुनौती
जबलपुर दर्पण। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायमूर्ति रवि मलिमथ व न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा की खंडपीठ ने राज्य सरकार द्वारा संविधान के अनुच्छेद 309 के अंतर्गत निर्मित म.प्र. इंडस्ट्रीयल (गजटेड) सर्विस रिक्रुटमेन्ट रुम्स, २००9 के संबंधित प्रावधानों को संविधान के अनुच्छेद 14, 16 व 73 का हनन निरूपित कर इसकी संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर केन्द्र सरकार व राज्य सरकार के संबंधित विभागों को नोटिस जारी किया है। राज्य सरकार की से उप महाधिवक्ता व केद्र सरकार के अधिवक्ता ने नोटिस ग्रहण कर लिया है।
याचिकाकर्ता म. प्र. डिप्लोमा इंजीनियर्स एसोसिएशन की ओर से शकील अहमद खान ने याचिका दायर करते हुए तथ्य प्रस्तुत किए कि केन्द्र सरकार ने घरेलू उद्योगों में गुणावत्तापूर्ण औद्योगिक उत्पादन हेतु कुशल कर्मचारियों की सतत आपूर्ति हेतु कुशल कर्मचारियों के प्रशिक्षण की दृष्टि से देश भर में औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान स्थापित किए हैं और इनके दैनिक प्रशासन की जिम्मेदारी राज्य सरकारों में निहित की है किन्तु इनके संबंध में नीति निर्धारण, मानक निर्धारण की जिम्मेदारी केन्द्र सरकार में ही निहित है। आई टी आई में इंजीनियरिंग के 45 विभिन्न व्यवसायिक पाठ्यक्रमों में औद्योगिक प्रशिक्षण दिया जाता है जबकि भारतीय तकनीकी परिषद ने लगभग 250 इंजीनियरिंग के पाठ्यक्रमों को मान्यता प्रदान की है। केन्द्र सरकार के प्रशिक्षण महानिदेशालय ने आई टी आई के प्राचार्य, उप प्राचार्य के पदों में भर्ती हेतु योग्यता यह निर्धारित की है कि अभ्यार्थी के पास इंजीनियरिंग की उपयुक्त शाखा में इंजीनियरिंग की डिग्री होना चाहिए। ऐसा इसलिए कि इंजीनियरिंग की सभी मान्यता प्राप्त पाठयक्रमों में औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों में प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है, केवल कुछ विशिष्ट पाठ्यक्रमों तक ही प्रशिक्षण सीमित है। राज्य सरकार ने अनुच्छेद 309 के अंतर्गत निर्मित नियमों में उक्त योग्यता में निर्धारित किया है कि इंजीनियरिंग की किसी भी शाखा में डिग्री धारक प्राचार्य व उपप्राचार्य पद अर्हता रखता है और इसी नियम के अंतर्गत भर्ती प्रक्रिया शुरू कर दी है। उक्त योग्यता आई टी आई के प्राचार्य पद से जुड़े कर्तव्यों के अनुरूप नहीं है और असंगत पाठयक्रम में डिग्री धारक व्यक्ति की नियुक्ति आई टी आई की गुणवत्ता में गिरावट लाएगा । संविधान की सातवीं अनुसूची के अंतर्गत सूची एक की प्रविष्टि 66 में व्यवसायिक संस्थानों व उच्च तकनीकी संस्थानों के मापदंडों से संबंधित कानून बनाने का एकमात्र अधिकार संसद को हैं । अनुच्छेद 73 के अंतर्गत जिन मामलों में संसद को कानून बनाने का अधिकार हैं, किसी कानून के अभाव में केन्द्र सरकार कानून कार्यकारी आदेश जारी कर सकती है। इस विषय में नियम बनाने का राज्य सरकार को अधिकारिता नहीं हैं व केन्द्र सरकार के योग्यता संबंधी आदेश राज्य सरकार पर बंधनकारी हैं। इसके अलावा राज्य सरकार ने पदोन्नति से भर्ती का कोटा कम कर दिया है व पदोन्नति हेतु अनुभव बढ़ा दिया है जिससे पदोन्नति के अवसर समाप्त हो गए हैं। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रशान्त अवस्थी, आशीष त्रिवेदी, असीम त्रिवेदी, अपूर्व त्रिवेदी, आनंद शुक्ला, आशीष तिवारी, अरविन्द सिंह चौहान, शुभम मिश्रा ने पैरवी की।



