नरेश सक्सेना का दर्शन भी एक सौभाग्य है

जबलपुर दर्पण। लय के नाविक’ के रूप में प्रसिद्ध हिंदी के वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना की हिन्दी की साहित्यिक-सांस्कृतिक दुनिया में विशिष्ट पहचान है।वे अपनी बहुआयामी काव्येतर सक्रियताओं के लिए भी जाने जाते हैं।वे अपनी अनुभूतियों,संवेदनाओं और सृजन की मौलिकता,गुणवत्ता व वस्तुनिष्ठता को लेकर अत्यन्त सतर्क रहे हैं।नरेश सक्सेना से पहली मुलाकात लखनऊ में एक साहित्यिक वर्कशॉप में हुई थी-वह नवांकुर कवियों को काव्य-सृजन की बारीकियां समझा रहे थे। दूसरी मुलाकात सितम्बर,2019 में जयपुर में प्रगतिशील लेखक संघ का 17वें राष्ट्रीय अधिवेशन में हुई थी।अभी जबलपुर में प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय अधिवेशन में भी उनका दर्शन का सौभाग्य मिला।वर्तमान कवि-सम्मेलनों और काव्य सृजन पर उनकी टिप्पणी काबिल-ए-गौर है कि आजकल बहुत से कवि भी रिपोर्टिंग की ही तर्ज पर कविताएं रच रहे हैं.बिना समझे कि भले ही कविता कथ्य पर टिकी होती है,कथ्य कविता नहीं होता.
राजभाषा के तौर पर हिन्दी की वर्तमान दशा पर उनकी तल्ख टिप्पणी रही है कि हिन्दी का भला इसीमें है कि उसको फौरन राजभाषा पद से हटा दिया जाये.आखिर अब तक क्या हासिल क्या कर पाई है वह राजभाषा बनकर?वह अन्य भारतीय भाषाओं की घृणा झेलने को अभिशप्त रही है.उसे ज्ञान की भाषा बनाये जाने की बात होती ही नहीं. जबकि सच यह है कि दुनिया के उन्हीं देशों ने ठीक से तरक्की की है,जिन्होंने अपनी भाषा को ज्ञान की भाषा बनाया.यहां तरक्की से मेरा आशय सिर्फ आर्थिक तरक्की से नहीं,सामाजिक व सांस्कृतिक तरक्की से भी है समाज के मध्यमवर्ग से वह अत्यन्त निराश हैं।उनका कहना है कि हमारा मध्यवर्ग पतित तो पहले से ही था. भूमंडलीकरण की शक्तियों ने जैसे-जैसे देश को बाजार बनाने में सफलता पाई है,यह और संस्कारहीन होता गया हैराजनीति में कोई प्रतिपक्ष ही नहीं बचा.बचा होता तो उन लोगों के लिए लड़ता जरूर दिखता, जिन्हें अब तक जबरन भूखा-प्यासा और निरक्षर बनाये रखा गया है. तब युद्ध और प्यार में सब-कुछ जायज है जैसे कुतर्क न चलते. भलमनसी की बातें होतीं. सद्भाव के पैरोकार विलुप्त न होकर न रह जाते. साहित्यकारों-संस्कृतिकर्मियों से उनकी अपील है कि समाज के कोढ़ों और विद्रूपताओं पर वज्र की तरह ही गिरें, शब्दों से ही नहीं कर्मों की मार्फत भी



