दृष्टिकोण का परिष्कार आवश्यक

जबलपुर दर्पण। हम अपने भीतरी दृष्टिकोण को बदलें तो बाहर जो कुछ भी दिखाई पड़ता है, वह सब कुछ बदला-बदला दिखाई देगा ।आँखों पर किस रंग का चश्मा पहना होता है, बाहर की वस्तुएँ उसी रंग की दिखाई पड़ती हैं । अनेक लोगों को इस संसार में केवल पाप और दुर्भाव ही दिखाई पड़ता है । सर्वत्र उन्हें गंदगी ही दीख पड़ती है ।इसका प्रधान कारण अपनी आंतरिक मलिनता ही है ।इस संसार में अच्छाइयों की कमी नहीं, श्रेष्ठ और सज्जन व्यक्ति भी सर्वत्र भरे पड़े हैं, फिर हर व्यक्ति में कुछ न कुछ अच्छाई तो होती है । छिद्रान्वेषण छोड़कर यदि हम गुण अन्वेषण करने का अपना स्वभाव बना लें तो घृणा और द्वेष के स्थान पर हमें प्रसन्नता प्राप्त करने लायक भी बहुत कुछ इस संसार में मिल जाएगा । बुराइयों के सुधारने के लिए भी हम घृणा का नहीं,सुधार और सेवा का दृष्टिकोण अपना लें तो वह कटुता और दुर्भावना उत्पन्न न होगी जो संघर्ष और विरोध के समय आमतौर से हुआ करती है ।दूसरों को सुधारने से पहले हमें अपने सुधार की बात सोचनी चाहिए । दूसरों से सज्जनता की आशा करने से पूर्व हमें अपने आप को सज्जन बनाना चाहिए । दूसरों की दुर्बलताओं के प्रति एकदम आग बबूला हो उठने से पहले हमें यह भी देखना उचित है कि अपने भीतर कितने दोष – दुर्गुण भरे पड़े हैं। बुराइयों को दूर करना एक प्रशंसनीय प्रवृत्ति है ।अच्छे काम का प्रयोग अपने से ही आरंभ करना चाहिए ।हम सुधरें, हमारा दृष्टिकोण सुधरे तो दूसरों का सुधार होना कुछ भी कठिन न रह जाएगा ।



