कृष्ण-सुदामा चरित्र प्रसंग पर श्रद्धालु भाव-विभोर

जबलपुर दर्पण। श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान की अमृत वर्षा के दौरान कथा व्यास आचार्य दिनेश गर्ग जी महाराज ने कृष्ण और सुदामा के अद्भुत मित्रता की कथा सुनाई, जिससे श्रद्धालु भाव विभोर हो उठे। उन्होंने संगीतमय तरीके से सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि जीवन में धैर्यता सुदामा जी से सीखनी चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि सच्चा मित्र वही है, जो अपने मित्र की परेशानी को समझे और बिना बताए मदद कर दे। आचार्य जी ने आजकल की स्वार्थी मित्रता पर भी टिप्पणी की और कहा कि अब मित्रता केवल तब तक रहती है, जब तक स्वार्थ पूरा न हो।
कथा के दौरान आचार्य ने भगवान श्री कृष्ण द्वारा राजकुमारियों को बचाने की कथा सुनाई, जो भौमासुर के बंदीगृह में कैद थीं। सत्यभामा के साथ प्राग्ज्योतिषपुर गए भगवान कृष्ण ने भौमासुर का उद्धार कर उन कन्याओं के साथ विवाह किया। इसके साथ ही, राजा नृग की कथा भी सुनाई, जिसमें बताया गया कि कैसे राजा नृग ने इतने अधिक दान किए कि उनकी गणना असंभव थी, लेकिन एक गलती के कारण उन्हें गिरगिट का रूप धारण करना पड़ा। आचार्य गर्ग जी ने कहा कि हम भी अक्सर थोड़े से दान पुण्य को बड़ा मान लेते हैं, जबकि हमें सदैव विनम्र रहना चाहिए।
कृष्ण-सुदामा के रिश्ते पर चर्चा करते हुए आचार्य ने बताया कि जब सुदामा जी द्वारका पहुंचे, तो श्री कृष्ण उनका स्वागत इस तरह करने दौड़े, जैसे गौ माता का बछड़ा अपनी माता से मिलते हुए दौड़ता है। भगवान ने सुदामा जी के चरण धोकर उन्हें सम्मानित किया और उनके चरणों की सेवा की। कथा में कृष्ण भगवान के 16,108 विवाहों का भी वर्णन किया गया।
कथा के समापन पर राजा परीक्षित को कथा के अमृत से परम पद प्राप्त हुआ। आचार्य जी ने कहा कि यदि व्यक्ति सच्चे मन से भागवत कथा का श्रवण करता है, तो उसका संबंध कृष्ण से जुड़ जाता है और कृष्ण की कृपा हमेशा उसके साथ रहती है। कथा का समापन व्यास पीठ पूजन और भगवान के पूजन के साथ हुआ।
इस अवसर पर यजमान गणेश पटेल, आयोजक रुपेश पिंटू पटेल, नीलम पटेल, नवीन पटेल, विनोद पटेल, सुनील पटेल, अभिषेक कोरी, प्रदीप मिश्रा, प्रवीण नामदेव, अनिल पटेल, रोहित पटेल सहित अन्य गणमान्य लोग उपस्थित थे। इस दौरान प्रसाद वितरण भी किया गया।



