जीवन में शांति चाहते हो तो शांत रहना सीखो: आचार्य श्री सुनील सागर

अपने जीवन में शांति तो सब चाहते हैं लेकिन शांत रहना कोई नहीं चाहता। यदि हमने शांत रहना सीख लिया तो जीवन में शांति स्वत: ही आ जाएगी। ये उद्गार आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज ने आज यहां आचार्य श्री शांति सागर वाटिका ऋषभ विहार में प्रवचन के दौरान व्यक्त किये।
श्री दिगम्बर दिगम्बर जैन सभा, ऋषभ विहार के महामंत्री विपुल जैन ने बताया कि इन दिनों आचार्य श्री जैन धर्म के प्रमुख ग्रंथ समयसार की गाथाओं की विवेचना कर उनके ऊपर प्रवचन कर रहे हैं। वहीं चेयरमैन विजय कुमार जैन ने बताया कि दिगम्बर जैन संप्रदाय का महान ग्रंथ समयसार जैन परंपरा के दिग्गज आचार्य कुन्द कुन्द द्वारा रचित है। दो हजार वर्षों से आज तक दिगम्बर साधु स्वयं को कुन्कुन्दाचार्य की परंपरा का कहलाने का गौरव अनुभव करते है।
आचार्य श्री ने अपने प्रवचन में कहा कि हमारे जीवन में शांति तभी आ सकती है जब हम स्वयं को शांत रखेंगे लेकिन विडंम्बना है कि आज शांति तो सब चाहते हैं लेकिन शांत रहना कोई नहीं चाहता हम दूसरों को तो शांत रहने की सीख तो देते हैं लेकिन यदि कोई दूसरा हमें शांत रहने के लिये कहे तो तुरंत उखड़ जाते हैं। उन्होंने कहा कि यह कैसी मानसिकता हो गई है हम जीवन में शांति तो चाहते हैं लेकिन खुद का शांत रहना मंजूर नहीं जबकि शांति तो हमारे स्वयं के अंदर ही है जिस दिन हमने अपने आप को शांत कर लिया तो शांति खुदबखुद हमारे जीवन में आ जाएगी।
आचार्य श्री सुनील सागर जी ने कहा कि हमें हमेशा मुस्कराते हुए रहना चाहिये। 24 घंटों में एक बार जिन प्रतिमा को अवश्य निहारना चाहिये । तीर्थंकर प्रभू की शांत मुद्रा को से मुस्कराना सीखना चाहिये। उन्होने कहा कि साक्षात जीवन का दर्शन करवाता है समयसार तनाव को दूर कर जीने की राह और सच्चे जीवन का सार बताए वही समय सार है।
आचार्य श्री ने कहा कि किताबी ज्ञान और वेद ज्ञान के साथ साथ व्यवहार का ज्ञान भी जरुरी है। शास्त्र पढ़ने का मतलब यह नहीं कि उसे तोते की तरह रटना शास्त्र पढ़ने का सही मतलब और सार्थकता तभी है जब हम उसे आचरण में उतारें । उन्होने कहा कि साक्षर वे होते हैं जो अपने अक्षर स्वभाव को पहचानते हैं। साक्षर होने का मतलब यह नहीं कि किताबी और अक्षरों का ज्ञान होना जबकि साक्षर होने का सही अर्थ अपनी आत्मा के स्वभाव व स्वयं को पहचानना।
आचार्य श्री सुनील सागर जी ने कहा कि जो संसाधन हमारे सदुपयोग के लिये बनाए गए हैं उनका दुरुपयोग भी ज्यादा होने लगा है। जैसे मोबाईल, कंप्यूटर व लैपटॉप आदि हमारी सुविधा व सहजता के लिये बनाए हैं । लेकिन हम उनका उपयोग गलत कामों व गलत चीजें देखने के लिये करने लगे। उन्होने कहा कि हमारी जिंदगी में विकृतता लाने और हमारी भावी पीढी़ को भटकाव और गलत रास्ते पर ले जाने का सबसे बडा़ माध्यम यह छोटा सा मोबाईल ही होगा।
आचार्य श्री सुनील सागर जी ने कहा कि मनुष्य को अपनी इच्छाओं, भावनाओं और कामनाओं को संतुलित रखना चाहिये। जिस दिन हमने इन सब पर काबू रख कर स्वयं के भीतर झांक लिया तो हम जीवन की अनेक समस्याओं से मुक्त हो जाएंगे। उन्होने कहा कि पहले हमारे पास समय था तो हमारे पास समझ नहीं थी और अब जब हमारे पास समझ है तो हमारे पास समय ही नहीं है। जिस दिन हमारे पास समय और समझ दोनों एक साथ हो जाएंगे उस दिन हमारा जीवन सार्थक हो जाएगा।
दिगम्बर जैन समाज ऋषभ विहार के अध्यक्ष सुनील जैन ने बताया कि इस चातुर्मास में दिल्ली एनसीआर के सभी मंदिरों व समाजों को जोड़ने का प्रयास किया है क्योंकि यह चातुर्मास खाली ऋषभ विहार दिगम्बर जैन समाज का नहीं बल्कि सम्पूर्ण दिल्ली व एनसीआर के जैन समाज का है। उन्होने बताया कि इसके तहत प्रत्येक दिन प्रवचन के दौरान अलग – अलग मंदिर कमेटियों व समाजों को आमंत्रित कर उनसे आचार्य श्री के चित्र अनावरण, पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट करने आदि की प्रक्रियाएं आदि संपन्न करवाई जाती हैं। जिससे सभी समाज व मंदिर इस चातुर्मास से स्वयं को जुडा़ हुआ महसूस करें।



