सर्व समर्पण ही गुरू भक्ति

जबलपुर दर्पण। ब्रम्ह संसार की उत्पत्ति का मूल कारण है। आत्मा शरीर मे निवास करती है और परमात्मा आत्मा मे निवास करती है। जो मनुष्य को मानसिक रूप से दर्शन दे वो भगवान। ज्ञान मे समर्पण नही होता, कर्म मे समर्पण होता है। सर्व रूप से समर्पण ही भक्ति है। साधक को जगद्गुरुदेव का अनुग्रह मिलता है तो जीवन के सभी प्रश्नो के उत्तर स्वयं प्राप्त हो जाते है। मेरा मुझमे कुछ भी नही है जो है सब ईश्वर स्वरूप है, जगद्गुरुदेव डा स्वामी श्रीश्यामदेवाचार्य जी महाराज सभी साधक, साधु संतो का सदैव आदर और सम्मान करते हुए सभी के प्रति समर्पण भाव रखते थे, वो सदैव कहते थे जो भी भक्ति, वैदिक ज्ञान, आचार्य वैभव सभी कुछ नरसिंह भगवान और गुरूदेव भगवान का मानते हुए कहते थे की श्यामदास मात्र रखवाला मानते थे। गुरू को योग्य शिष्य और पिता को योग्य पुत्र प्राप्ति के बाद सर्वस्व प्राप्ति का अनुभव होता है।
जिसने मन मस्तिष्क को समर्पित कर मंजिल ढूंढी उसे सफलता प्राप्त होती है। गुरू साक्षात भगवत स्वरूप है। श्रीमद्भागवत मे गुरू और गोविंद की कथा है।वो यादे कैसी जो मष्तिष्क से चली जाये जीवन के अंतिम क्षण तक गुरूदेव की स्मृति रहना चाहिए। गुरू दया करते है गोविंद कृपा करते है। जो भक्त गुरू गोविंद की याद करता है उसे दया सदैव प्राप्त होती है। उक्त भावुकतापूर्ण सदुपदेश जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी विश्वेशप्रपन्नाचार्य जी महाराज, नरसिंहपीठाधीश्वर स्वामी डा नरसिंह दास महाराज , महामंडलेश्वर बृज किशोर दास महाराज ने नरसिंह मंदिर मे साकेतवासी जगद्गुरुदेव डा स्वामी श्रीश्याम देवाचार्य महाराज की प्रथम पुण्यतिथि पर श्रीमद्भागवत कथा, श्रीराम कथा के तृतीय दिवस पर कहे। आज संत समागम मे महामंडलेश्वर बृज किशोर दास,स्वामी कलिकानंद प्यारेनंद महाराज, स्वामी प्रह्लाद दास , स्वामी राधे चैतन्य जी ,स्वामी राजारामाचार्य, ब्रम्हचारी चैत्यानंदजी, भृगुदत महाराज, स्वामी हनुमान दास, स्वामी बालकदास, स्वामी कालीनंद, आचार्य वासुदेव शास्त्री , आचार्य राजेन्द्र शास्त्री,स्वामी प्रकाशान्द, साध्वी मनीषादास, साध्वी शोभा, आचार्य अनूप देव महाराज, सुमनदास महाराज, पं लालमणि, आचार्य रामछवि शास्त्री, आचार्य दीपनारायण, पं रामफल प्यासी, आचार्य अरूणेश शास्त्री, सहित संत महात्माओ का सनिध्य प्राप्त हुआ।



