सड़कों पर यमराज बन घूम रहे आवारा मवेशी

प्रशासनिक शासनिक अनदेखी से बढ़ रहे हादसे, कलेक्टर के प्रतिबंधात्मक आदेश की भी उड़ रही धज्जियां
जबलपुर दर्पण। जबलपुर शहर की सड़कों पर आवारा मवेशियों का आतंक दिन-ब-दिन गंभीर होता जा रहा है। सड़कों पर विचरण करते ये मवेशी अब केवल ट्रैफिक में बाधा ही नहीं बन रहे, बल्कि आम नागरिकों के लिए यमराज बन चुके हैं। आए दिन हो रही दुर्घटनाएं इस लापरवाही की गवाही दे रही हैं, वहीं नगर निगम द्वारा हर माह लाखों रुपये खर्च करने के बावजूद मवेशियों की संख्या में कोई कमी नहीं आई है। नगर निगम के हांका गैंग द्वारा मवेशियों को पकड़ने का दावा जरूर किया जाता है, लेकिन हालातों को देखकर लगता है कि यह केवल कागजों तक सीमित रह गया है। शहर की सड़कों पर सुबह-शाम घूमते मवेशियों के झुंड इस बात के गवाह हैं कि नगर निगम की कार्यप्रणाली महज खानापूर्ति बनकर रह गई है।
सड़कों पर जानलेवा संकट बनते मवेशी-जहां देखो, वहां सड़कों पर मवेशी झुंड बनाकर बैठे या घूमते मिल जाएंगे। वाहन चालकों को इनकी वजह से जाम और दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता है। खासकर रात के समय जब रोशनी कम होती है, तब ये मवेशी और भी खतरनाक साबित होते हैं। पिछले कुछ महीनों में मवेशियों से टकरा कर हुए सड़क हादसों में कई लोग अपनी जान गंवा चुके हैं या गंभीर रूप से घायल हुए हैं।
कलेक्टर का आदेश भी बेअसर-मंगलवार को जिला दण्डाधिकारी एवं कलेक्टर दीपक सक्सेना ने आवारा मवेशियों से उत्पन्न हो रही सड़क दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाने हेतु भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 163 के तहत प्रतिबंधात्मक आदेश जारी किया था। आदेश के मुताबिक, कोई भी व्यक्ति या पशुपालक अपने मवेशियों को सड़कों पर खुला नहीं छोड़ सकता। उल्लंघन करने पर कार्रवाई का प्रावधान भी जोड़ा गया था। लेकिन हकीकत में इस आदेश की धज्जियां उड़ रही हैं। हांका गैंग और पशुपालकों के बीच मिलीभगत की खबरें सामने आ रही हैं। मवेशियों के मालिकों को पहले से ही सूचना दे दी जाती है कि हांका गैंग किस समय किस क्षेत्र में पहुंचेगी, जिससे वे अपने मवेशियों को पहले ही छुपा लेते हैं। इसके एवज में कथित रूप से उन्हें ‘दान-दक्षिणा’ भी दी जाती है।
प्रशासनिक अनदेखी और सुविधाओं का अभाव-नगर निगम हर माह लाखों रुपये आवारा मवेशियों को पकड़ने, उनके भोजन व देखभाल पर खर्च करता है। चार कैटल वैन और दर्जनों कर्मचारी प्रतिदिन सड़कों पर निकलते हैं, लेकिन इन सबके बावजूद मवेशियों की मौजूदगी में कोई अंतर नहीं आता। इससे साफ जाहिर होता है कि कार्रवाई सिर्फ दिखावे की जा रही है।वहीं, शहर के भीतर अब कोई भी कांजी हाउस मौजूद नहीं है। पहले शहर के मध्य में कांजी हाउस था, जहां कोई भी आवारा मवेशी को पकड़कर बंद करा सकता था। अब कांजी हाउस शहर से दूर होने के कारण लोग मवेशियों को पकड़वाने में रुचि नहीं दिखाते, जिससे समस्या और अधिक बढ़ गई है।
कानूनी प्रावधानों के बावजूद ढीलापन प्रतिबंधात्मक आदेश के अनुसार:-ग्राम पंचायतों और नगरीय निकायों को मवेशियों की निगरानी और कार्रवाई की जिम्मेदारी दी गई है।सड़क निर्माण विभागों को सड़क पर पेट्रोलिंग कर मवेशियों को हटाने और सड़क पर मृत मवेशियों के निस्तारण की जिम्मेदारी दी गई है।किसी भी मवेशी मालिक को बीमार या विकलांग मवेशी सड़क पर छोड़ने की अनुमति नहीं है।सार्वजनिक सूचना, मुनादी और जागरूकता अभियान चलाने के निर्देश दिए गए हैं।किसी भी प्रकार के उल्लंघन पर भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 223, पशु क्रूरता अधिनियम 1960 और नगर पालिक निगम अधिनियम 1956 की धारा 358 के तहत दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है।
अब क्या हो?-शहरवासियों की मांग है कि नगर निगम और प्रशासन केवल आदेश जारी न करें, बल्कि इन पर कठोर अमल भी सुनिश्चित करें। मवेशियों को खुला छोड़ने वाले पशुपालकों पर दंडात्मक कार्रवाई की जाए, कांजी हाउस को फिर से शहर के भीतर स्थापित किया जाए और हांका गैंग की कार्यप्रणाली की स्वतंत्र जांच कराई जाए। जब तक प्रशासन और निगम इस गंभीर समस्या को केवल आंकड़ों तक सीमित रखकर नजरअंदाज करते रहेंगे, तब तक शहर की सड़कों पर मौत का यह मूक खतरा मंडराता रहेगा।



