मध्य प्रदेशसंपादकीय/लेख/आलेखसाहित्य दर्पण
इधर आह्, उधर जा

जिंदगी गजलों से भरी पड़ी है
इधर आह् उधर जा
जरा थमकर फिर निकलती है
आह भरी दिल में जो उतरती है
कभी इधर आह् कभी उधर जा
उड़ते पखेडू की जिद में अड़ी है
लड़खड़ाते पग को चलाने में पड़ी है
कभी इधर आह् कभी उधर जा
चूम कर दो दिलो को मायूश करी है आग दिल में जलाके रखी है
चन्द लफ्ज़ो की क़द्र करी है
वाह जिंदगी तू अभी भी चल पड़ी है जिंदगी ग़ज़लों से भरी पड़ी है।।



