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विकास से कोसों दूर जारुआ गांव बिजली पानी तक नहीं

मध्यप्रदेश के दमोह जिले के तेन्दूखेड़ा ब्लॉक के ग्राम पंचायत इमलीडोल का मामला जहां गांव जाने के लिए आज भी जंगल के रास्ते पांच किमी की पगडंडी का करना होता है उपयोग जननी वाहन भी नहीं पहुंचता

पूरे गांव की प्यास बुझाने के लिए मात्र एक नाला जिसमें में पानी को छान कर पीना पड़ता है अगर कोई बीमार हो जाए तो मुख्य सड़क तक लाने में छूट जाते हैं पसीने

तेन्दूखेड़ा-9630278207. मध्यप्रदेश में जहां एक तरफ देश के आधुनिकीकरण की बात की जा रही है तो वहीं कुछ गांव ऐसे है जहां आज भी लोग जंगली जीवन जीने मजबूर है तेन्दूखेड़ा ब्लॉक का एक ऐसा गांव जहां न तो पहुचने के लिए सड़क है न गांव में बिजली और न ही अन्य आवश्यक सुविधाएं गांव के लोग पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर है पंचायती राज भी इस गांव को मौलिक सुविधाएं नहीं दे सका और न ही यहां के जनप्रतिनिधि इस गांव की सुध ले पाए हम बात कर रहे हैं तेन्दूखेड़ा तहसील के इमलीडोल पंचायत के जारुआ गांव की जिसमें आदिवासी समाज के 60 से अधिक घरों की बस्ती है इनमें लगभग 300-350 के लगभग जनसंख्या निवास करती है आजादी 72साल गुजर जाने के बाद भी इस गांव में बिजली पानी चिकित्सा सड़क परिवाहन आदि सुविधाएं गांव के लोगों को नहीं मिल पाई है वहीं दूसरी ओर यदि इस गांव तक पहुचना है तो पगडंडी का सहारा लेना पड़ेगा गांव पहुंचने के लिए आज तक सड़क नहीं बनी है पानी की सुविधा के लिए इस गांव में एक जंगल में निकला एक नाला है जिसके पानी से यहां के लोग अपनी प्यास बुझाते है और अन्य खर्च में उपयोग करते हैं वहीं आवास के अभाव में गांव के लोग कच्चे मकानों में रहने को मजबूर है जो झोपड़ी में समतुल्य
*महिलाओं के लिए नहीं चिकित्सा सुविधाएं*
लोगों का कहना है कि हमारी पंचायत इमलीडोल है जो हमारे यहां से पांच किलोमीटर की है शासन द्वारा योजना कार्य तो बहुत है पर हमारेगांव में शासन और प्रशासन कुछ करने को इच्छुक नहीं है हालांकि लोगों ने समस्याओं हेतु प्रशासन को कई बार अवगत कराया परंतु किसी ने ध्यान नहीं दिया इस गांव में चुनाव के समय ही नेता व प्रशासनिक अधिकारी गाड़ी लेकर आते हैं चुनाव खत्म होते ही गांव को भूल जाते हैं स्वच्छता मिशन के तहत शौचालय की राशि भी सचिव और सरपंच की मिली भगत से हड़प ली जाती है
*नहीं पहुंचता वाहन*
गांव में पक्की सड़क न होने के कारण प्रसूता महिलाओं को जननी वाहन की सुविधा भी नहीं मिल पाती परिजन जननी वाहन को फोन लगाते हैं तो वह 2 किमी दूर जाकर खड़ा हो जाता है और ग्रामीण प्रसूता महिला को बैलगाड़ी के सहारे वहां तक पहुंचते हैं इतनी दूरी तय करने में ही एक घंटे से अधिक का समय लग जाता है वाहन चालक का यही कहना रहता है कि ऊबड़ खाबड़ रोड पर वाहन लेकर नहीं आ सकता समय पर वाहन सुविधा न मिलने से मरीज की जान पल भी बन आती है
*नहीं मिलता शासन की योजनाओं का लाभ*
जारुआ गांव में आदिवासी समाज के लोग निवास करते हैं गांव की आबादी भी 300 के आसपास है यहां शासन की योजनाओं का लाभ ग्रामीणों को नहीं मिल पाता है जिसका कारण यह भी है कि यहां अधिकारियों का निरीक्षण नहीं होता जिससे ग्रामीण अपनी समस्या भी किसी को नहीं बता पाते गांव के लोगों का मुख्य व्यवसाय तेंदूपत्ता और लकड़ी बेचना है इसी से वे अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं
*राशन लेने पांच किमी दूर जाने को मजबूर ग्रामीण*
वहीं राशन दुकान इमलीडोल में होने के कारण लोगों को पदैल ही इतने दूर जाना पड़ता है लेकिन सबसे ज्यादा परेशानी जब होती है जब बारिश का समय आ जाता है क्योंकि जंगलों में से होते हुए जाना पड़ता है
*वोट लेने के बाद नहीं आते नेता*
यह क्षेत्र जबेरा विधानसभा में आता है स्थानीय ग्रामीण मुन्नी आदिवासी प्रमोद आदिवासी रामेश आदिवासी सुनील आदिवासी आदि ने बताया कि केवल यहां नेता चुनाव के समय वोट मांगने आते हैं जीत जाने के बाद वे इस गांव की सुध तक नहीं लेते सरपंच से कई बार गांव की मूलभूत समस्याओं से अवगत कराया लेकिन उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया ग्रामीणों का कहना है कि जारुआ गांव में आज तक सड़क देखने नहीं मिली लोग जंगल के पथरीले मार्ग से मंगलवार को तेन्दूखेड़ा का बाजार करने के लिए आते रहते हैं
*स्कूल और आंगनबाड़ी केंद्र भी बंद मिले*
आदिवासियों को शिक्षा मिले इसके लिए ग्राम में आंगनबाड़ी केंद्र और प्राथमिक शाला भी है लेकिन स्कूल के जितने भी शिक्षक पदस्थ है वो कभी भी समय पर स्कूल नहीं पहुंचते है इस पर शिक्षा अधिकारी कोई कार्रवाई नहीं करते हैं जब शिक्षक ही समय पर नहीं आते तो शिक्षा का स्तर कैसा होगा आप अंदाजा लगा सकते हैं ग्रामीणों का कहना की जबसे स्कूल खुला है जब से आज तक कोई भी शिक्षक समय पर नहीं आये हैं और न बच्चों का कोई स्तर सुधरा है जब कोई भी मासाव नहीं आता है तो बच्चे बाहर ही बैठकर इंतजार करते हैं
*स्वास्थ्य सुविधाओं का भी बुरा हाल*
बात स्वास्थ्य सुविधाओं की की जाए और वह भी ग्रामीणों को नहीं मिल पाती है ग्रामीणों का कहना है कि महीने में एक बार एएनएम गांव पहुंचती है ग्रामीणों को यह तक पता नहीं कि गांव का जनस्वास्थ्य रक्षक कौन है मिनी आंगनबाड़ी है लेकिन भवन नहीं बनाया गया ग्रामीणों ने मूलभूत सुविधा न मिलने से पंचायत चुनाव में मतदान का बहिष्कार करने की बात भी कहीं है

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