साहित्य दर्पण

किलकारियां से विलाप तक का सफर

जबलपुर दर्पण। ग्रामांचल निवार पहाड़ी के प्रतिष्टित शिक्षक कुंजी लाल दुबे श्रीमती सीता दुबे का घर आंगन खुशियों से किलकारियां से चहकने लगा जब पहली संतान के रूप में शैलेन्द्र (शल्लू) जन्मे। शुरू से कुशाग्र वुद्धि, मेहनती, साहसी बालक जबलपुर विश्वविद्यालय से एमएससी गणित विषय लेकर प्रथम श्रेणी में शानदार सफलता अर्जित कर घर परिवार व क्ष्रेत्र का नाम गौरवांवित करने वाले शैलेन्द्र के रिटायर्ड माता पिता, 2 छोटी बहिनें व 4 भाई है, जिनका समाज मे मान सम्मान बहुत अच्छा है। शेलेंद्र बहुत ही साहसी, मददगार, परोपकारी, प्रतिभाशाली की मध्य प्रदेश शासन में उच्च श्रेणी शिक्षक के प्रतिष्ठा पूर्ण पद पर नियुक्ति हो गई तभी कटनी के सम्भ्रांत शिक्षक पंडित धनीराम दुबे, श्रीमती मनोरमा दुबे ने अपनी दूसरे नम्बर की शालीन, सौम्य बेटी मंजू का विवाह टीचर शेलेंद्र से कर दिया। दोनों का दाम्पत्य जीवन बहुत अच्छे से बीतने लगा। मोनिका और अनामिका दोनों बेटियों को पाकर और वही प्रिंसिपल पद पर पदोन्नति पाकर इनकी खूबसूरत ज़िंदगी में चार चाँद लग गए। सोने में सुहागा हो गया। मान सरोवर कॉलोनी कटनी में अपने मधुर व्यवहार, सहयोगी सद्भावना से सभी का दिल जीत लिया करते थे सभी बहुत सम्मान करते भी थे । स्कूल का दायित्व सर्वोपरि था, बोर्ड परीक्षा के समय केंद्राध्यक्ष की जिम्मेदारी हमेशा निभाते थे । उच्च अधिकारी इनकी लगन, समर्पण कार्यशैली की बहू सराहना करते रहते थे। धीरे धीरे अनचाही आदतों के बस में होने लगे समय बीतता गया परिवार इस भरोसे में की आदतों में सुधार हो। लेकिन अब बहुत देर ही चुकी थी, बीमारी ने इन्हें अपनी आगोश में ले लिया, धर्म परायण जीवनसंगनी मंजू ने पति को बीमारी से निजात करने में कोई कोरकसर नही छोड़ी कटनी, जबलपुर, नागपुर, दिल्ली एम्स, जैसे हॉस्पिटलो से लगातार इलाज कराती रही । बीच बीच मे जब कभी ठीक लगता तो घूमने का मन बना लेते कभी अपने बचपन के मित्रों से मिलने कैमोर चल दिये तो कभी, शिमला, ग्वालियर, कभी धर्म स्थल वैष्णो देवी,जगननाथ पूरी, बांदकपुर भोले बाबा के दरबार, बागेश्वर धाम बाला जी सरकार के दर्शन कर आये, उनका मन बहुत चंचल था हमेशा मंजू को कोई कमी न रहे तो मानसरोबर के घर को सर्वसुविधा युक्त डुप्लेक्स छत में मनमोहक फुलवारी बस एक और तमन्ना है कि शंकर भगवान का बहुत सुंदर मंदिर, घर मे स्थापित करूँ । तेवरी में बहुत बड़ा मकान है जिसमे माता पिता,भाई लोग रहते है। पिता जी की आज्ञा से अपने और पत्नी मंजू के लिए सभी सुविधाओं का डबल स्टोरी 2 रूम बन बाए अभी लेंटर ही डला था उसके बाद पूरी फिनिसिंग होनी बाकी थी। अभी हाल में ही दिल्ली में रह रही छोटी बेटी अनामिका दामाद अभिषेक के यहां से लौटते ही घर में मंजू का पैर अचानक फिसल गया दर्द हुआ, सोचा मोच होगी है लेकिन बाद में दर्द असहनीय होने लगा यह देख शेलेंद्र अपनी पीड़ा भूल कर अपनी पत्नी मंजू को तुरन्त डॉ को दिखाने कटनी ले गए, डॉ ने इलाज कर पाया कि पैर में फेक्चर है 40 दिनों के लिए प्लास्टर बांध कर मंजू को पूर्ण आराम की सलाह दी। दोनों लाचार लेकिन आत्मबल की कोई कमी नही हमेशा एक दूसरे की सेवा में तैयार रहते रहे। अब दोनों ने मन बना लिया कि अब गाँव में अम्मा बाबू जी के पास ही रहेंगे, जरूरत पड़ने पर उनका और छोटे भाइयों का सहयोग मिलता रहेगा । मंजू की पूरी देखभाल देवरानी दीपा ने सम्हाल रखी थी । मंजू शेलेंद्र के साथ समय समय पर अपने मायके छोटे भाई मनीष के पास कटनी में, कभी मामा के पास सिहोरा में, तो कभी जबलपुर में अपनी बड़ी बेटी मोनिका दामाद हिमांशु के घर, वही बड़ी बहिन मनीषा के घर आकर रहते थे। वही से छोटी बहिन पप्पी से मिलने भी जाते थे। इनका सबसे बहुत लगाव था । एक दिन शेलेंद्र, मंजू को जबलपुर में डॉ को दिखने मोना के यहां छोड़ कर कटनी स्कूल के काम से चले गए। मोना ने जबलपुर के डॉ से माँ को दिखा, डॉ ने फिर 20 दिनों के लिए प्लास्टर बांध कर आराम करने की सलाह दे रखी थी, मोना अपनी माँ मंजू को बड़ी मौसी मनीषा के घर भेजकर अपनी ससुराल कटनी चली गई। एक दिन अचानक दोपहर को घर निवार से फोन आया कि शेलेंद्र को कटनी हॉस्पिटल में बब्बू ने एडमिट कर दिया है, सुनकर मंजू घबराई और तुरन्त गाड़ी से कटनी हॉस्पिटल अपने पैर दर्द से कराहते हुए पहुँची, पति को देखकर, बातचीत कर अपना दर्द भूल गई, संतोष महसूस किया। मंजू को नया प्लास्टर बंधा देख शेलेंद्र मुस्कुराते हुए कह बैठे, तुम्हें इतनी तकलीफ है क्यों परेशान होती हो मै ठीक हूँ तुम घर निवार चली जाओ आराम करो, डॉ कल छुट्टी कर देंगे मै घर आ जाऊंगा। मंजू घर चली गई दूसरे दिन शेलेंद्र की छुट्टी हुई वो भी अपने घर चले गए परिवार जनों को काफी सन्तोष हुआ उसी शाम को शेलेंद्र की अचानक फिर से तबियत खराब हुई, वहाँ के डाक्टर ने जबलपुर ले जाने की सलाह दी। अपने बड़े भैया की सेवा में हरदम तैयार बब्बू जबलपुर के मेट्रो हॉस्पिटल लेकर आ गया वही बेटी मोनिका दामाद हिमांशु और नाना नानी की लाडली नातिन माही मिल गए और उन्हें एडमिट कर डॉ ने इलाज शुरू कर दिया कुछ सुधार होने लगा लेकिन दूसरे दिन डॉ ने कहा कि इन्हें वेंटिलेटर में रख कर इलाज करना पड़ेगा, इसे सभी ने गम्भीरता से लिया दिल्ली में रह रही छोटी बेटी अनामिका दामाद अभिषेक दूसरे दिन सुबह की फ्लाइट से जबलपुर अस्पताल आ गये फिर बारी बारी से घर परिवार, नात रिश्तेदार,मित्र अस्पताल पहुँचने लगे। रात दिन की मेहनत हर पल निराशा में बदलती जा रही थी, बस अब भगवान ही कुछ चमत्कार कर सकते है। सबके चेहरे मायूस, गमगीन सा माहौल, आखिरकार 10 जुलाई को शेलेंद्र की जिंदगी को बचाने में हम सब हार गए। रोता बिलखटी मंजू बार बार यही कहटी रह गयी कि पहले भी इससे ज्यादा तबियत खराब होती जाती थी, ये ठीक हो जाते थे, इस बार भगवान मेरे से क्या कसूर हुआ जो सदा के लिए हमसे छीन लिया कह कर खूब विलाप करती है, रोती रहती है मंजू । दोनों बेटियां मोनिका, अनामिका, वृद्ध अम्मा बाबू जी, बहिन दीप्ति, बहिना, छोटे भाई गुड्डा,पीलू,जिलू, बब्बू अपने शेलेंद्र की यादें कर रोते बिलखते रहते है। घर परिवार की शान अब सदा शफा के लिए ब्रह्मलीन हो गई।
शेलेंद्र मुझसे मिलते, हमेशा फोन में बुलन्द हौसले , आत्म विश्वास से भरे दिल की बात कहते रहते थे, शायद उन्हें विछुड़ने का आभास होने से लगा था, 2 दिन पहले भी हंस हंस कर ब के बारे में खूब बातें की। जाने के बाद 2 3 दिन नही लगा कि अब शेलेंद्र हमारे बीच नही है लेकिन अब हर पल उस दिव्य आत्मा कमी बेहद महसूस होने लगी परम् पिता परमात्मा ब्रह्मलीन शेलेंद्र की आत्मा को अपने श्री चरणों मे स्थान देना। हम सब के लिए उनकी यादेँ शेष रह गई ।
तुम्हें देखने को अब तरसती है आँखे।
अब हर पल कुछ कमी सी लगने लगी है।
याद आते ही आंखों में नमी सी होने लगती है।
हम घर आंगन को कितना भी सजा, संवार लें।
तुम्हारे बिना अब संसार में बहुत कमी सी लगने लगी है।
विनम्र श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए कोटि कोटि नमन डियर शेलेंद्र मेरे भाई–

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