मेसर्स वैशाली हाईजीन प्रोडक्टस का पार्टनर सुमति जैन बिजली चोरी में बरी : पूर्व क्षेत्र कंपनी को लगा लाखों का चूना

जबलपुर दर्पण। ग्राम सूरतलाई, कटंगी रोड थाना माढ़ोताल जबलपुर स्थित मेसर्स वैशाली हाईजीन प्रोडक्टस पार्टनर का सुमति जैन बिजली चोरी में बरी फलतः पूर्व क्षेत्र कंपनी को लगा लाखों का चूना । अभियुक्त पर विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 135 (1) (क) के अधीन दंडनीय अपराध का आरोप है कि उसने दिनाँक 13.7.2020 को घटनास्थल सूरतलाई, कटंगी रोड थाना माढ़ोताल जबलपुर में 10 एम.एम.श्री कोर पी.व्ही.सी. केबल विद्यमान निम्न दाब विद्युत लाईन से सीधे जोड़कर सेनेटरी नेपकिन बनाने की फैक्ट्री यूनिट का निर्माण करने हेतु जमीन के नीचे से 98 मीटर केबिल रोड क्रॉस कर ले जाकर विद्युत का अनाधिकृत उपयोग कर कंपनी को 4,62,333रू. की क्षति कारित की। प्रकरण में कोई महत्वपूर्ण तथ्य नहीं हैं।
परिवादी का प्रकरण संक्षेप में इस प्रकार है कि दिनाँक 13.7.2020 को ६ घटनास्थल सूरतलाई, कटंगी रोड थाना माढ़ोताल जबलपुर में 10 एम.एम.श्री कोर पी.व्ही.सी. केबल विद्यमान निम्न दाब विद्युत लाईन से सीधे जोड़कर सेनेटरी नेपकिन बनाने की फैक्ट्री यूनिट का निर्माण करने हेतु जमीन के नीचे से 98 मीटर केबिल रोड कास कर ले जाकर विद्युत का अनाधिकृत उपयोग कर कंपनी को 4,62,333 रू. की क्षति कारित की। मंडल कार्यालय द्वारा परिवाद न्यायालय में प्रस्तुत करने के पूर्व डाक द्वारा उपभोक्ता को सूचित किया गया, जिसके बावजूद भी आरोपी द्वारा परिवादी कंपनी को किसी प्रकार का भुगतान नहीं किया गया, जिसके पश्चात् यह परिवाद न्यायालय में प्रस्तुत किया गया।
अभियुक्त के विरुद्ध निर्णय चरण कमांक 01 में दर्शाये अनुसार आरोप निर्मित किये जाने पर अभियुक्त की ओर से अपराध करना अस्वीकार करते विचारण चाहा गया। प्रकरण में परिवादी की ओर से साक्षी रतनदीप गजभिय परि.सा.-01 का कथन लेखबद्ध कराया गया व प्रलेख प्र.पी.01 लगायत प्र.पी.04 अंकित किये गये।दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 313 के तहत अभियुक्त परीक्षण के दौरान अभियुक्त द्वारा प्रतिरक्षा में यह बचाव लिया गया है कि वह निर्दोष हैं, उसने कोई अपराध नहीं किया है, उसे असत्य रूप से फंसाया गया है। बचाव में अभियुक्त के द्वारा प्रलेख प्र.डी.01 अंकित की गई है।
इस विद्युत प्रकरण के निराकरण के लिए अवधारणीय प्रश्न निम्नलिखित हैं :- क्या आरोपी दिनाँक 13.7.2020 को घटनास्थल सूरतलाई, कटंगी रोड थाना माढ़ोताल जबलपुर में 10 एम.एम.श्री कोर पी.व्ही.सी. केबल विद्यमान निम्न दाब विद्युत लाईन से सीधे जोड़कर सेनेटरी नेपकिन बनाने की फैक्ट्री यूनिट का निर्माण करने हेतु जमीन के नीचे से 98 मीटर केबिल रोड कास कर ले जाकर विद्युत का अनाधिकृत उपयोग कर कंपनी को 4,62,333रू. की क्षति कारित की ।
परिवादी साक्षी सहायक अभियंता रतनदीप गजभिय (परि. सा. 1) का कथन है कि दिनाँक 13.07.2020 को उसके दल के निरीक्षणकर्ता अधिकारी प्रदीप कुमार पांडे कार्यपालन अभियंता थे। उनके साथ वह और एस.एस. तिवड़े कनिष्ठ अभियंता सूरतलाई कटंगी रोड माढ़ोताल जबलपुर गये थे। उन लोगों ने निरीक्षण के दौरान पाया कि सुमति जैन के लोगों द्वारा कटिया फसाकर जमीन खोदकर अंदर से वायर ले जाकर सेनेटरी पैड की फैक्टरी बनाने हेतु विद्युत का अनाधिकृत उपयोग किया जा रहा था। मौके पर सुमति जैन नहीं मिली थी। निरीक्षणकर्ता प्रदीप पांडे एवं एस.एस. तिवड़े की मृत्यु कोरोना में हो गई है। निरीक्षण उपरांत प्रदीप पांडे कार्यपालन अभियंता के द्वारा पंचनामा बनाया गया था, जो प्र.पी.1 है जिसके ए से ए भाग पर उसके हस्ताक्षर है। दिनाँक 28.07.2020 को नीलाभ श्रीवास्तव कार्यपालन अभियंता द्वारा परिवाद पूर्व सूचना प्रेषित की गई थी जो प्र.पी.2 है जिसके ए से ए भाग पर नीलाभ श्रीवास्तव के हस्ताक्षर है, वह उनके अधीनस्थ कार्यरत होने के कारण उनके हस्ताक्षर एवं हस्तलिपि पहचानता है। दिनाँक 27.08.2020 को उसे आरोपी के विरूद्ध परिवाद प्रस्तुत करने हेतु अधिकार पत्र क्रमांक 979 दिनाँक 27.08.2020 दिया गया था जो प्र.पी.3 है जिसके ए से ए भाग पर जिसके ए से ए भाग पर नीलाभ श्रीवास्तव के हस्ताक्षर है, वह उनके अधीनस्थ कार्यरत होने के कारण उनके हस्ताक्षर एवं हस्तलिपि पहचानता है एवं बी से बी भाग पर प्रतिलिपि उसे पदनाम से प्रेषित की गई है। अंतिम निर्धारणआदेश श्री प्रदीप कुमार पांडे कार्यपालन अभियंता द्वारा बनाया गया था जो प्र.पी.4 है।
जब परिवादी द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य की संवीक्षा करते हैं तो रतनदीप गजभिय (परि.सा.1) ने प्रतिपरीक्षण में स्वीकार किया है कि प्र.पी.3 के दस्तावेज को देखकर यह पता चलता है कि प्रकरण में टीप क्रमांक 34 दिनाँक 7.8.2020 का कोई दस्तावेज नहीं है जो कार्यपालन अभियंता को अधिकृत करता हो उसे आदेशित करता है कि वह न्यायालय के समक्ष परिवाद प्रस्तुत कर सके। उसे इस बात की जानकारी नहीं है कि सुमति जैन ने एलटी कनेक्शन लिया था। उसे यह ज्ञात नहीं है कि सुमति जैन ने परिसर में उच्च दाब कनेक्शन प्राप्त करने के लिये कब आवेदन दिया था और कब कार्यवाही हुई। वह नहीं बता सकता कि आरोपी के परिसर में किस-किस तारीखों को उच्च दाब कनेक्शन देने के लिये कार्यवाही हेतु गया था, किंतु वह कई तिथियों में गया था फिर कहा कि एक बार गया था। पंचनामा कार्यवाही श्री प्रदीप पांडे और एस एस तिवडे ने की थी इसलिये वह पंचनामा में लेख कार्यवाही के संबंध में नहीं बता सकता।
रतनदीप गजभिय (परि.सा.1) ने प्रतिपरीक्षण में आगे स्वीकार किया है कि निरीक्षण के समय जब अधिकारी कार्यवाही कर रहे थे तो स्थल पर आरोपी उपस्थित नहीं था और इसलिये आरोपी के हस्ताक्षर पंचनामा में नहीं है। वह नहीं बता सकता कि पंचनामा में जिस विश्वकर्मा के हस्ताक्षर है वह आरोपी का प्रतिनिधि था या नहीं। जो लोड पंचनामा में लेख किया है वह पंचनामा बनाने वाले अधिकारी ने लेख किया था। बेल्डिंग मशीन से संबंधित उपकरण के अलावा और कोई उपकरण चलते हुये नहीं पाये गये। पंचनामा प्र.पी. 1 में उपकरणों का विवरण जैसे वे उपकरण कितने वॉट के है, किस कंपनी के है, नहीं लिखा है। नियमानुसार पंचनामा में यह लेख किया जाना चाहिये कि कौन सा उपकरण चालू है और वह किस कंपनी का है और उसका लोड कितना है। पंचनामा में यह लेख नहीं है कि टांगटेस्टर से उपकरणों का लोड लिखने के पहले चैक किया गया था। शेड से खंभे की दूरी लगभग 30 मीटर थी। पंचनामा बनाने वाले अधिकारी ने स्थल पर जो अनियमितता का लेख किया है वह निरंजन विश्वकर्मा के बताये अनुसार लेख किया है। वह नहीं बता सकता कि पंचनामा बनाने वाले अधिकारी ने इस तथ्य की पुष्टि स्वयं की थी या नहीं। वह आज यह नहीं बता सकता कि निरीक्षणकर्ता ने अंतिम निर्धारण आदेश कैसे बनाया। वह नहीं बता सकता कि निर्धारण आदेश की गणना उनके द्वारा कैसे की गई थी। वह यह नहीं बता सकता कि प्र.पी.4 के अंतिम निर्धारण आदेश पर आगे क्या कार्यवाही हुई और विद्युत चोरी का निष्कर्ष निकालने के पूर्व निर्धारण करने वाले अधिकारी ने सुमति जैन की आपत्ति पर सुनवाई कर कोई आदेश पारित किया अथवा नहीं।
रतनदीप गजभिय (परि.सा.1) ने प्रतिपरीक्षण में आगे स्वीकार किया है कि आरोपी ने विद्युत उपभोक्ता शिकायत निवारण फोरम जबलपुर के समक्ष परिवाद प्रस्तुत किया था जिसमें बिजली चोरी से संबंधित अवैध प्रकरण बनाने के तथ्यों को भी विस्तृत रूप से आरोपी के द्वारा रखा गया था। प्र.डी.1 के दस्तावेज को देखकर बताया कि उसके असे अभाग पर कार्यपालन अभियंता के हस्ताक्षर है और यह उसने उपभोक्ता फोरम में आरोपी द्वारा प्रस्तुत परिवाद के जबाब में दिया था। उसे याद नहीं है कि निरीक्षण करने किस दिनाँक को गये थे।
उल्लेखनीय है कि धारा 126 (2) एवं धारा 180 (क) भारतीय विद्युत अधिनियम, 2003 के प्रावधान के अधीन मध्यप्रदेश विद्युत (अनंतिम निर्धारण के आदेश की तामील) नियम, 2004 बनाये गये, जिसमें स्पष्ट उल्लेख है कि ऐसे परिसर में कब्जा रखने वाले व्यक्ति को अनंतिम आदेश का निरीक्षण दिनांक से 05 दिवस के भीतर तामील किया जावेगा। विहित प्रारूप में आदेश की तामीली की जायेगी व पावती प्राप्त की जायेगी, यदि परिसर में ऐसा व्यक्ति नहीं मिलता है तो उस पर चस्पा प्रक्रिया द्वारा दो साक्षियों के समक्ष तामील कराया जायेगा, किंतु परिवादी की ओर से उक्त आज्ञापक प्रावधान का कोई पालन नहीं किया गया।
प्रकरण के अवलोकन से प्रकट होता है कि मौके पर आरोपी से किसी भी सामान की जप्ती नहीं की गई है। मौका पंचनामा में किसी भी स्वतंत्र साक्षी के हस्ताक्षर नहीं हैं। घटना का कोई स्वतंत्र साक्षी नहीं बनाया गया। जबकि न्याय दृष्टांत बापूपुरी विरूद्ध म०प्र० वि०वि०कं०लिमि० दांडिक अपील क0-302/2008 निर्णय दिनांक 6.11.2008 में मान्नीय म०प्र० उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने यह निर्धारित किया है कि विद्युत चोरी पकड़ते समय दं०प्र०सं० की धारा 100 का पालन किया जाना चाहिए जिसमें स्वतंत्र साक्षियों को बुलाना आवश्यक है। यदि स्वतंत्र साक्षी तैयार नहीं होते हैं तो उन्हें नोटिस दिया जाना चाहिए और इंकार करने पर भा०दं०सं० की धारा 187 के अपराध हेतु कार्यवाही की जानी चाहिए। इस प्रकार की कार्यवाही प्रस्तुत प्रकरण में नहीं की गयी है।
न्याय दृष्टांत परिमल भोगीलाल पटेल विरूद्ध स्टेट आफ गुजरात, 2011 किमिनल लॉ जनरल 478 में मानननीय गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा यह अवधारित किया गया है कि अभियुक्त की दोषसिद्धि के पूर्व न्यायालय को यह देखा जाना आवश्यक है कि तलाशी एवं जप्ती के संबंध में निर्मित इलेक्ट्रीसिटी रूल्स एवं दं०प्र०सं० के प्रावधानों का पालन किया गया है अथवा नहीं ? इस प्रकार यह स्थिति स्पष्ट होती है कि यदि तलाशी और जप्ती के संबंध में दं०प्र०सं० 1973 की धारा 100 में उपबंधित प्रकिया का पालन नहीं किया जाता है, तब वह अभियोजन के लिए घातक होगी।
युक्तियुक्त संदेह के संबंध में बारकी विरूद्ध राज्य, ए.आई.आर. 1993 सु.को. 1892-1993 सी.आर.एल.जे. 2010 वाले मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निम्न मत व्यक्त किया गया है जो अवलोकनीय है सकता है” और “सच होना चाहिये” दोनों में “संदेह सबूत का विकल्प नहीं है, “सच हो ही लम्बी दूरी है और अभियोजन को अपना मामला समस्त युक्तियुक्त संदेह से परे साबित करने के लिये इस दूरी की यात्रा करना पड़ती है।” अतः परिवादी का मामला युक्तियुक्त संदेह से परे प्रमाणित नहीं होता है।
अतः उपरोक्त समस्त विवेचन पर से न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि परिवादी अपना सम्पूर्ण मामला समस्त युक्तियुक्त संदेह से परे अभियुक्त के विरूद्ध प्रमाणित करने में पूर्णतः असफल रहा है। परिणामतः आरोपी को निर्दोष पाते हुये धारा 135 (1) (क) विद्युत अधिनियम, 2003 के आरोप से दोषमुक्त करते हुये स्वतंत्र किया जाता है।
आरोपी द्वारा प्रस्तुत जमानत एवं मुचलका धारा 437-क द.प्र.सं. के अंतर्गत आगामी 06 माह के लिये अगले अपीलीय न्यायालय में उपसंजात होने की अपेक्षा करने के लिए प्रवृत्त रहेगा। निर्णय के विरूद्ध अपील होने की दशा में आरोपी सूचना मिलने पर उपस्थित रहेगा। छः माह पश्चात जमानत एवं मुचलका स्वतः निरस्त समझे जावे। प्रकरण में कोई सम्पत्ति पेश नहीं है। आरोपी की ओर विजय राघव सिंह, श्रीमती पूनम सिंह, अजय नंदा एवं मनोज चतुर्वेदी अधिवक्तागण ने पैरवी की ।



