मध्य प्रदेश

मैरिंगो सीआईएमएस हॉस्पिटल ने विश्व थैलेसीमिया दिवस के अवसर पर जागरूकता फैलाने की मुहिम शुरू की

 अहमदाबाद। मैरिंगो सीआईएमएस हॉस्पिटल, अहमदाबाद ने विश्व थैलेसीमिया दिवस मनाया, जिसका आयोजन हर साल 8 मई को किया जाता है। इस साल की थीम “जीवन को सशक्त बनाएँ, प्रगति से नाता जोड़ें: सभी के लिए समान और सुलभ थैलेसीमिया उपचार” है। थैलेसीमिया खून से संबंधित एक आनुवंशिक बीमारी है, जो शरीर में बनने वाले हीमोग्लोबिन की मात्रा में कमी की वजह से होता है। हीमोग्लोबिन एक तरह का प्रोटीन होता है जो पूरे शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं में ऑक्सीजन ले जाने के लिए आवश्यक है, लेकिन खून से संबंधित इस आनुवंशिक बीमारी में शरीर में हीमोग्लोबिन के निर्माण की क्षमता घट जाती है। हीमोग्लोबिन की कमी की वजह से थकान, कमजोरी और इसी तरह के कई गंभीर लक्षण दिखाई देते हैं। थैलेसीमिया दो रूपों में प्रकट होता है: अल्फा और बीटा, जो क्रोमोसोम में मौजूद डीएनए में गड़बड़ी (उत्परिवर्तन) पर आधारित होता है। यह बीमारी माता-पिता से बच्चों में आती है। अगर दंपति के शरीर में हीमोग्लोबिन बनाने वाले डीएनए में से किसी एक (दो में से) में उत्परिवर्तन होता है, जिसके लक्षण नहीं दिखाई देते हैं लेकिन प्रत्येक गर्भावस्था के दौरान भ्रूण को माता-पिता में से किसी एक से दोषपूर्ण डीएनए प्राप्त होने का जोखिम लगभग 25% होता है, और ऐसा होने पर जन्म लेने वाला बच्चा थैलेसीमिया का मरीज हो सकता है।
खून से संबंधित यह बीमारी मरीजों की ज़िंदगी पर काफी बुरा असर डालती है। इससे पीड़ित मरीज को जिंदा रहने के लिए समय-समय पर ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत होती है। मरीजों को थकान, कमजोरी, साँस लेने में तकलीफ, हड्डियों का आकार बिगड़ने, देर से शारीरिक विकास तथा हार्मोन से संबंधित समस्याओं का भी अनुभव होता है। समय-समय ट्रांसफ्यूजन से भी शरीर में आयरन की अधिकता हो जाती है, जो ज्यादातर शारीरिक समस्याओं की बड़ी वजह है। इसके अलावा, मरीज को ट्रांसफ्यूजन संबंधी संक्रमण का भी खतरा बना रहता है। मरीज के लगातार इलाज की जरूरत से भी परिवार की मानसिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर काफी बुरा असर पड़ता है। बोन मैरो ट्रांसप्लांट ही इस बीमारी का एकमात्र इलाज है जो हमारे देश में बहुत कम मरीजों के लिए उपलब्ध है।
खून से संबंधित कुछ अन्य बीमारियों के लिए भी बोन मैरो ट्रांसप्लांट (BMT) की जरूरत होती है, जिनके सामान्य लक्षणों में एनीमिया के मरीजों में कमजोरी, थकान, लगातार बुखार या शरीर पर रक्तस्राव के धब्बे, और रक्त कैंसर के मरीजों को कमजोरी, थकान, वजन कम होना, गर्दन, बगल, कमर में लिम्फ नोड की सूजन, पीठ एवं शरीर में दर्द, किडनी से संबंधित समस्याएँ, संक्रमण का खतरा बढ़ना और रक्तस्राव का अनुभव होना, इत्यादि शामिल हैं।
डॉ. अंकित जितानी, कन्सल्टेंट– हेमेटोलॉजी, ब्लू एंड मैरो ट्रांसप्लांट, मैरिंगो सीआईएमएस हॉस्पिटल, अहमदाबाद ने कहा, “थैलेसीमिया की रोकथाम और उपचार के बारे में जागरूकता बढ़ाने में विश्व थैलेसीमिया दिवस मनाने की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है। यह दिन बेहतर गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाओं की आसानी से उपलब्धता के साथ-साथ मरीजों के लिए उपलब्ध नई चिकित्सा पद्धतियों की शुरूआत के महत्व को भी दर्शाता है। हम मानते हैं कि कोई भी व्यक्ति इस बीमारी का संभावित वाहक हो सकता है, इसलिए हम हमेशा सभी नवविवाहित जोड़ों और युवा व्यक्तियों की जांच करके इसकी रोकथाम करने, और प्रारंभिक गर्भावस्था (गर्भावस्था के 18 हफ्ते से पहले) के दौरान भ्रूण का प्रीनेटल जेनेटिक डायग्नोसिस करने पर ज्यादा जोर देते हैं, ताकि अगर पति-पत्नी दोनों थैलेसीमिया के वाहक हैं, तो थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चे के जन्म को रोका जा सके।”
श्री गौरव रेखी, रीजनल डायरेक्टर– मैरिंगो सीआईएमएस हॉस्पिटल, अहमदाबाद ने कहा, “हम मानते हैं कि ‘मरीज सर्वोपरि’ हैं, और अपनी पहल को इसी दिशा में आगे बढ़ाते हुए हम खून से संबंधित बीमारियों के बढ़ते मामलों और उनके इलाज के आध्याधुनिक तौर-तरीकों के बारे में जागरूकता बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। हमारा लक्ष्य आम लोगों को ऐसी शारीरिक परेशानियों और बीमारियों के संबंध में सही जानकारी प्रदान करना है, जो जीवन पर बुरा असर डाल सकती हैं। इस बीमारी की रोकथाम के उपायों की हिमायत करके/ इसके शुरुआती लक्षणों की पहचान और उपचार के उन्नत तौर-तरीकों के बारे में लोगों के बीच जानकारी फैलाकर, हमारा लक्ष्य इन बीमारियों के प्रसार को कम करना है।”
डॉ. अंकित जितानी ने आगे कहा, “हेमेटोलॉजी और स्टेम सेल ट्रांसप्लांटेशन के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है, जिसके बाद खून से संबंधित कई घातक बीमारियों के साथ-साथ शिशुओं में होने वाले सॉलिड कैंसर और कुछ ऑटोइम्यून बीमारियों के लिए अब जीवनरक्षक समाधान उपलब्ध हैं। बोन मैरो से रक्त कोशिकाओं का निर्माण होता है और BMT में खराब या नष्ट बोन मैरो को स्वस्थ कोशिकाओं से बदल दिया जाता है।”
भारत में, अब हर साल लगभग 2,500 से 3,000 मरीजों का बोन मैरो ट्रांसप्लांट (BMT) किया जाता है, जबकि 5 साल पहले यह आंकड़ा केवल 500 था। हालाँकि, हर साल किए जाने वाले ट्रांसप्लांट की तुलना में BMT की मांग कहीं अधिक है। लोगों के बीच जागरूकता का अभाव, पर्याप्त बुनियादी सुविधाओं का उपलब्ध नहीं होना और कुशल चिकित्सकों की कमी इसकी सबसे बड़ी वजह है। कई तरह की बीमारियों के लिए BMT की सलाह दी जाती है, जिनमें ब्लड कैंसर, थैलेसीमिया, सिकल सेल एनीमिया, प्रतिरक्षा संबंधी कमियाँ, एप्लास्टिक एनीमिया, कुछ ऑटोइम्यून बीमारियाँ और शिशुओं में होने वाले ठोस ट्यूमर शामिल हैं।

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