लावारिस शवों की अनदेखी,

प्रशासन और स्वास्थ्य सेवाओं की उदासीनता पर सवाल
जबलपुर दर्पण। शास्त्री नगर के एक प्रमुख मार्ग पर एक युवक का शव पड़ा रहा, जबकि स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासन ने इस दुखद स्थिति पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया। शव की स्थिति इतनी खराब थी कि कुत्तों के झुंड ने शव के कपड़े खींचने शुरू कर दिए। स्थानीय निवासियों और क्षेत्रीय जन प्रतिनिधियों ने इस बारे में सूचना दी, लेकिन प्रशासन द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई। अंततः मोक्ष सेवा द्वारा शव को उठाया गया और पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया।
इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि सुबह से लेकर शाम तक शव पड़े रहने के बावजूद पुलिस और अन्य संबंधित अधिकारी कोई कार्रवाई करने के बजाय मामले को नजरअंदाज करते रहे। मोक्ष आश्रय के प्रमुख आशीष ठाकुर ने बताया कि दिनभर कोशिश करने के बावजूद शव को उठाने का कोई इंतजाम नहीं किया गया था, जिससे यह साबित होता है कि प्रशासन और स्वास्थ्य सेवाओं का रवैया लापरवाह है।
इसी तरह का एक और मामला सामने आया था, जब सिहोरा निवासी कैंसर के इलाज के लिए मेडिकल अस्पताल आए पुरसोत्म भार्गव तिवारी की मौत के बाद, अस्पताल ने शव को मरचुरी में रखने से इंकार कर दिया और परिजनों को शव बाहर ले जाने के लिए मजबूर किया। ऐसा करना मानवीय अधिकारों का उल्लंघन था, क्योंकि मृत्यु के बाद शव को मरचुरी में रखना मृतक के परिवार के मौलिक अधिकारों में आता है।
इसके अलावा, एक अन्य घटना में डुमना चौकी क्षेत्र में लावारिस शव की सूचना मिली, लेकिन प्रशासन और स्वास्थ्य सेवाओं ने उस शव को भी बिना कोई उचित कदम उठाए छोड़ दिया। ऐसी स्थितियों में, 108 एम्बुलेंस सेवा और अस्पतालों का व्यवहार और भी चिंताजनक है, क्योंकि मानसिक या शारीरिक रूप से असहाय व्यक्तियों को बिना इलाज के अस्पतालों के बाहर छोड़ दिया जा रहा है।
कई दिन पहले, रात के समय 4 बुजुर्गों और मानसिक रूप से विकलांग व्यक्तियों को अस्पतालों द्वारा सड़कों पर छोड़ दिया गया, जिनके कपड़े गंदगी में सने हुए थे। यह एक गंभीर मामला है, जिसमें स्वास्थ्य विभाग की संवेदनहीनता और अधिकारियों की उदासीनता साफ नजर आती है।
स्थानीय समाजसेवी और मोक्ष आश्रय के प्रमुख आशीष ठाकुर ने इस मामले में कड़ी आलोचना की है और प्रशासन से मांग की है कि लावारिस शवों और मानसिक रूप से असहाय व्यक्तियों के मामलों में जल्दी और प्रभावी कार्रवाई की जाए। उन्होंने कहा कि इस तरह की घटनाओं से यह साफ होता है कि प्रशासन और अस्पतालों को इन व्यक्तियों की हालत की कोई चिंता नहीं है।
यह स्थिति यह दिखाती है कि हमारे समाज और प्रशासन के भीतर संवेदनशीलता की कमी है। लावारिस शवों, मानसिक विकलांगों और बुजुर्गों के प्रति संवेदनशीलता और उचित उपचार का अभाव है। यह समय है कि हम इस ओर ध्यान दें और ऐसे व्यक्तियों के लिए प्रभावी और सहानुभूतिपूर्ण व्यवस्था स्थापित करें, ताकि उनकी जिंदगी को गरिमा और सम्मान मिल सके।



