लोकोत्सव उज्जैन में बघेली का सम्मान

सीधी जबलपुर दर्पण । प्रतिकल्पा सांस्कृतिक संस्थान और विक्रम विश्व विद्यालय उज्जैन का साझा महोत्सव अद्भुत एवं अभिनन्दनीय रहा। 12 सितम्बर को शाजापुर जिले के एक गाॅव में मालवी लोक नाट्य,मालवी कन्या सपेरा नृत्य मालवा के लोक कलाकारों ने प्रस्तुत किया।पंजाब के कलाकारों ने भागडा नृत्य,छत्तीसगढ के कलाकारों नें छत्तीसगढी लोक नृत्य तथा राजस्थान से आये कलाकारों ने मनमोहन मंचीय नृत्य प्रस्तुत किया। मंच पर जाकर पुरस्कार एवं प्रतीक चिन्ह से सम्मानित करने का अवसर बतौर अतिथि मिला डाॅ शैलेन्द्र कुमार शर्मा कुलानुशासक उज्जैन, डाॅ श्रीनिवास शुक्ल सरस बघेली विशेषज्ञ एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष सोमालोब साहित्यिक मंच, डाॅ पल्लवी निदेशिका संजा लोकोत्सव, डाॅ कुमार किशन महासचिव, सहित अनेक महिमान अतिथियों को।
13 एवं 14 सितम्बर को पूरे दिन लोक साहित्य लोक संस्कृति और लोक नाट्य पर आधारित विमर्श व्याख्यान, शोध पत्र तथा रचना पाठ हुआ। पूरे महोत्सव की रीढ डाॅ शैलेन्द्र शर्मा और डाॅ पल्लवी रहीं। दोनों दिन बघेली के लोक विद और बघेली साहित्यकार के रूप में मंच पर डाॅ श्रीनिवास शुक्ल सरस को स्थान दिया गया। मालवी बोली ने बघेली बोली को गले लगाकर माला,पटका, स्मृति चिन्ह और शाल श्रीफल से सम्मानित किया तथा भरपूर प्यार- दुलार दिया। बघेली साहित्य एवं संस्कृति का सामर्थ्य विषय पर तथा बघेली जनजातीय नारी संवेदना विषय पर गद्य व पद्य के माध्यम से डाॅ श्रीनिवास शुक्ल सरस को मालवी की धरती पर मनोयोग से सुना गया।आमंत्रित विशेषज्ञ विद्वान पद्मश्री डाॅ पुरू दधीच इंदौर, पद्मश्री भगवती राजपुरोहित उज्जैन, डाॅ अजय कुमार झा जनकपुर नेपाल, कुलपति डाॅ नंदकिशोर पाण्डेय जयपुर, कुलपति नवीनचंद्र लोहनी उत्तराखंड, डाॅ सुनील कुलकर्णी निदेशक केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा, कुलपति भारद्वाज उज्जैन,नर्मदा प्रसाद उपाध्याय इंदौर, डाॅ पूरन लाल शहगल मनासा, प्रोफेसर शैलेन्द्र कुमार शर्मा उज्जैन,प्रो जगदीश चन्द्र शर्मा उज्जैन, डाॅ श्रीनिवास शुक्ल सरस सीधी, डाॅ धुवेन्द सिंह जोधा भोपाल, डाॅ नरेन्द्र सिंह पवार रतलाम, डाॅ ललित सिंह दिल्ली, प्रो शिव चौरसिया तथा डाॅ श्यामलाल चौधरी उज्जैन, डाॅ मैडम पाण्डेय राजस्थान, डाॅ मैडम राय नेपाल आदि ने अन्तरराष्ट्रीय लोक साहित्य महोत्सव की अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी,विमर्श,व्याख्यान, विमोचन तथा रचना पाठ करके महनीय वैशिष्ट्य प्रदान किया। लोक साहित्य एवं लोक संस्कृति के इस अथाह सागर में एक अंजुली जल बघेली साहित्य का भी समावेशित रहा।



