सिहोरा दर्पण

70 वर्षों से रामलीला बनी सिहोरा के ग्रामीणों में सामाजिक समरसता की मिशाल

मनीष श्रीवास सिहोरा। जिले के सिहोरा क्षेत्र के ग्राम बरगी में वर्ष 1956 से लगातार ग्रामीणों के द्वारा रामलीला का मंचन किया जा रहा है। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि ग्रामीण समाज में सांस्कृतिक धरोहर और सामाजिक एकता का प्रतीक बन चुका है।

रामलीला में रामायण के सभी पात्र गांव के ही रहते हैं, और कभी किसी बाहरी रामलीला कंपनी को शामिल नहीं किया गया। अब तक लगभग चार पीढ़ियों ने इस परंपरा को जीवंत रखा है। रामलीला की नींव जानकी प्रसाद पांडे, निरंजन मिश्रा, शिवप्रसाद मिश्रा, रामात्मज मिश्रा सारंग, श्यामसुंदर विश्वकर्मा, लटोरा सोनी और भैंरो कोटवार ने रखी थी।

परंपरा और सादगी

मंचन में आधुनिक तकनीक की जगह स्थानीय कलाकार, पारंपरिक वाद्य और ग्रामीण परिवेश की सादगी बरकरार रखी जाती है। इसका महत्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गाँव में एकता, भाईचारा और सांस्कृतिक जागरूकता बढ़ाने का माध्यम भी है। रामलीला के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं से परिचित कराया जाता है।

मढिया में गुप्तकालीन मूर्ति

ग्राम बरगी की प्रमुख बड़ी मढिया में पहले एक कुआँ था, जिसके पाटी में देवी माता की कई मूर्तियाँ विराजित थीं। सुरक्षा की दृष्टि से कुएँ को ढक दिया गया और समय के साथ यहां सुसज्जित मढिया का निर्माण हुआ। वर्तमान में यही स्थान रामलीला का मंच बन चुका है। गाँव में नवरात्रि के दौरान चार धर्मस्थलों में देवी प्रतिमाएँ स्थापित होती हैं, जिन्हें आसपास के लोग भक्तिभाव से दर्शन करने आते हैं और दशहरा का आनंद लेते हैं।

इस तरह, ग्राम बरगी की रामलीला न केवल धार्मिक आयोजन है, बल्कि 70 वर्षों से ग्रामीण समाज में सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक समरसता की मिसाल भी बनी हुई है।

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