जबलपुर दर्पण

प्लांटेशन में लगे सागौन सहित अन्य पौधे भी हुए नष्ट, सिहोरा वन परिक्षेत्र के सरदा का मामला

सुरक्षा सुविधा की अनदेखी पर बड़ा सवाल?

मनीष श्रीवास जबलपुर दर्पण । जबलपुर जिले के वन परिक्षेत्र सिहोरा अंतर्गत आने वाली वन बीट सरदा का मामला एक बार फिर सुर्ख़ियों एवं चर्चा में बना हुआ हैं। जहां वन मण्डल के द्वारा लगाए गए 3500 से अधिक मात्रा में एक साल पहले सागौन एवं मिश्रित पौधों में आग लगने से वे पूरी तरह से जल कर खराब हो गए हैं।
20 दिनों से अधिक समय से कोई भी अधिकारी इस प्लांटेशन की सुध तक नहीं लेने पहुंचा। क्या कर्तव्य और उच्च पद की गरिमा यहीं अनुशासन कहलाती हैं?
वन क्षेत्रों में चाहें पेड़ पौधे हो या फिर जीव जंतुओं सहित वन प्राणी इनकी सुरक्षा और सुविधाओं की जवाबदेही वन विभाग के अधिकारी एवं कर्मचारियों की अहम भूमिका होती हैं।
लेकिन इस प्रकार की अनदेखी और इतनी मात्रा में सागौन सहित अन्य पौधों के जल जाने से किसी भी अधिकारी ने इस ओर कोई रुचि ही नहीं दिखाई हैं।
क्या वन अमला चाहता हैं कि जब मेरे पास इसकी शिकायत कोई करेगा तब जाकर कुछ कार्यवाही होगी नहीं तो जो हो रहा हैं वह जानते हुए भी अंजान बना बैठा हुआ हैं।
जॉच अधिकारी पर सवालिया निशान?- वन परिक्षेत्र सिहोरा के सरदा बीट में, चाहे तेंदुआ की मौत हो, चाहे जंगली सूअर की मौत हो, चाहे चीतल की मौत हो, चाहें पौधों में आग लगने की बात हो या फिर अवैध पेड़ो की कटाई हो पिछले 5 से 7 माह में बड़ी बड़ी घटनाओं की जानकारी तो लगीं। लेकिन इनकी जांच पड़ताल करने वाले एस डी ओ एम एल बड़कड़े के द्वारा की तो जा रहीं हैं। पर जॉच है कि पूरी ही नहीं हो पा रहीं हैं। जिससे कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं?

कैसे जल गए सागौन और अन्य पौधे बड़ा सवाल ? – मिश्रित सरदा वन अंतर्गत आने वाले आर ऍफ़ 45 में कुल जमीन के 30 हेक्टेयर
मिश्रित प्लांटेशन में एक वर्षों पूर्व पहले सागौन सहित विभिन्न प्रकार के पौधों का वृक्षारोपण किया गया था। लेकिन विगत कुछ दिनों पहले यहां अचानक आग की चपेट में आने से मिश्रित प्लांटेशन के सभी कीमती एवं महंगे सागौन के पौधों में आग लगने से वह पूरी तरह से खराब हो गए हैं।
हर वर्ष लाखों रुपए इन वन सुरक्षा के लिए वन विभाग एवं राज्य सरकार खर्च तो करती है। पर इनकी उचित सुविधा एवम् सुरक्षा की जवाबदेही भी वन विभाग के कर्मचारी पर रहतीं हैं। अब सवाल उठता हैं कि जब इनकी सुरक्षा में वन कर्मचारी 24 घण्टे की ड्यूटी पर तैनात रहने के बाद भी मिश्रित प्लांटेशन बीट में लगे सागौन व अन्य पौधों में आग लग गई। और किसी को इसकी सूचना तक नहीं।

दो समितियों में कार्यरत – वन परिक्षेत्र सिहोरा में दो समितियों में कार्य विभाजन तो है जिसका गठन 1984,1987 के लगभग बनाई गई थीं। पर इन वन समिति और एफ डी समिति के सदस्यों में ही खेल कर लिया जाता हैं। अन्य सदस्यों को तो जानकारी भी नहीं मिल पाती हैं।

सागौन टीक के पौधों/जंगलों में लगी आग दावानल एक गंभीर स्थिति है, जो आमतौर पर फरवरी-अप्रैल के बीच सूखी पत्तियों और तेज हवाओं के कारण फैलती है, जिससे भारी वन और आर्थिक नुकसान (लाखों का नुकसान) होता है।
जांच और मुख्य धारा –मानव मवेशी चराने वालों द्वारा महुआ/तेंदूपत्ता बीनने या सूखी घास हटाने के लिए जानबूझकर लगाई गई आग
पड़ोसी खेत से आग फैलना: अक्सर आसपास के खेतों में खरपतवार या पैरा (पराली) जलाने से आग सागौन के रोपण में फैलती है।
बिजली के तारों से चिंगारी– वन क्षेत्र से गुजरने वाली हाई-टेंशन लाइनों से आग लगना।
बीड़ी/सिगरेट का फेंकना: राहगीरों द्वारा लापरवाही से फेंकी गई जलती हुई बीड़ी।
जांच की प्रक्रिया- आग का केंद्र बिंदु खोजना, जहां से आग फैलनी शुरू हुई थी।
साक्ष्य संकलन – आग लगने के स्थान से आग लगाने वाले उपकरण (माचिस, बोतल, जले हुए कपड़े) खोजना।
जाँच-पड़ताल स्थानीय ग्रामीणों से पूछताछ और वन रक्षकों की लापरवाही की जाँच करना।
नुकसान का आंकलन – जले हुए सागौन के पौधों, लकड़ी और जैव विविधता का विवरण तैयार करना।
बचाव और प्रबंधन – फायर लाइन मार्च से पहले सागौन के ब्लॉकों के चारों ओर 3-5 मीटर चौड़ी पट्टी साफ करें ताकि आग एक ब्लॉक से दूसरे में न फैले।
सूखी पत्तियों का प्रबंधन- फरवरी से पहले वन तल फारेस्ट फ्लोर से सूखी पत्तियों को सुरक्षित रूप से जलाना या हटाना चाहिए।
सतर्कता जरूरी – शुष्क मौसम में गश्त पेट्रोलिंग बढ़ाना और स्थानीय लोगों को जागरूक करना।
आसपास बिजली के तारों को अलग करवाने जैसे प्रयास होने चाहिए।

सागौन के पौधों या जंगल में आग लगाने की घटना पर भारतीय वन अधिनियम 1927 और भारतीय दंड संहिता आई पी सी के तहत एक गंभीर अपराध है। इसके लिए धारा 26 वन आरक्षित में आग लगाने पर प्रतिबंध और आई पी सी की धारा 435/436 के तहत कड़ी सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
प्रमुख कानूनी धाराएं और प्रावधान-भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 26 आरक्षित वनों में आग लगाना, या ऐसी लापरवाही करना जिससे आग फैले, अवैध है। इसमें कारावास 6 महीने से 5 साल तक और भारी जुर्माना हो सकता है।
भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 33 संरक्षित वनों में आग लगाने पर यही सजा लागू होती है।
आई पी सी की धारा 435/436: किसी की संपत्ति सागौन के पेड़/पौधे को जानबूझकर आग से नष्ट करने पर 7 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है।
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 यदि आग से वन्य जीवों को नुकसान होता है, तो और भी सख्त कानून लागू होते हैं।
वन मण्डल कर्मचारी – 20 वर्षो से एक ही क्षेत्र में जमे बीट गार्ड, डिप्टी रेंजर एवं अन्य कर्मचारियों द्वारा विभाग में अधिक गोल मोल कर नज़र अंदाज़ कर देना कर्तव्यों से पल्ला झाड़ लेना अधिक पाया गया हैं।
जॉच अधिकारी – एम एल बड़कड़े एस डी ओ वन मण्डल जबलपुर के द्वारा पिछले 6 माह से जॉच चल रहीं हैं पर कार्यवाही बिलकुल भी नहीं।

सी सी एफओ – जबलपुर वन मण्डल अधिकारी पुनित सोनकर से जब इन विषयों को लेकर फोन पर सम्पर्क किया गया तो उन्होंने फोन नहीं उठाया। ना ही वाट्सअप पर किए गए मैसेज का रिप्लेस दिया।

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