जबलपुर दर्पण

हमारे कार्य की प्रशंसा और लापरवाही की सारी हाद हुई पार

स्वास्थ्य विभाग में क्यों किया इतना ज्यादा शर्मिंदा करने वाला कार्य, मुख्य चिकित्सा अधिकारी क्यों बने रहे अंध भक्त

मनीष श्रीवास जबलपुर दर्पण । जबलपुर स्वास्थ्य विभाग की घोर लापरवाही एवं डीसीएम के पद पर पदस्थ रहीं सुश्री दीपिका साहू की घोर लापरवाही, भ्रष्टाचारी ने ये साबिद कर दिया की मैंने विगत कई वर्षों में स्वास्थ्य विभाग में रह कर बड़े बड़े कार्य कर डाले और सीएचएमओ ने कभी बारीकी से देखा तक नहीं। स्वास्थ्य विभाग का बोल बाला अब कौन कराने वाला नजर आयेगा। ये तो व्यक्त ही बताएगा।
ब्लॉक मझौली चिकित्सा विभाग में मृतक के खाते में हो गए पैसे जमा। और दिसंबर माह में आवेदन लगा। कैसी घोर लापरवाही?
डीसीएम को मिले सम्मानित अवॉर्ड –
ब्लॉक मझौली स्वास्थ्य विभाग की बड़ी लापरवाही?
विकासखण्ड मझौली में स्वास्थ्य विभाग के द्वारा मृतक आशा कार्यकर्ता के भुगतान को लेकर उठा विवाद अब तूल पकड़ता जा रहा है। इस पूरे मामले में जिला कम्युनिटी मोबिलाईजर (DCM) दीपिका साहू की भूमिका और उनके द्वारा की जा रही कार्यवाही को लेकर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप ये भी हैं कि पोर्टल की तकनीकी विफलता को स्वीकार करने के बजाय। डीसीएम दीपिका साहू द्वारा द्वेषपूर्ण तरीके से निचले स्तर के कर्मचारियों को बलि का बकरा भी बनाया जा रहा है।
क्या है पूरा मामला और कहाँ हुई चूक?
बड़ा प्रश्ननीय मामला –
पूर्ण जानकारी और दस्तावेजों के अनुसार, ग्राम बैहर कला की आशा कार्यकर्ता की मृत्यु के पश्चात ब्लॉक स्तर से दिनांक 03.11.2025 को ही आईडी निष्क्रिय (Inactive) करने की प्रक्रिया की गई थी। पर कंप्यूटर स्क्रीन पर ‘सफलतापूर्वक निष्क्रिय’ का संदेश आने के बावजूद भी पोर्टल की आंतरिक त्रुटि के कारण आईडी सक्रिय बनी रही। पर जिला स्तर पर डेटा मॉनिटरिंग और अंतिम सत्यापन की जिम्मेदारी डीसीएम दीपिका साहू की है। यदि पोर्टल पर आईडी सक्रिय दिख रही थी, तो जिला स्तर पर इसे समय रहते क्यों नहीं रोका और अलग किया गया?
इन गंभीर धाराओं के तहत जवाबदेही की मांग और दंडनीय कार्यवाही – विषय प्रकरण में पारदर्शिता की कमी और एक पक्षीय नोटिस को देखते हुए जानकारों ने निम्नलिखित कानूनी प्रावधानों के तहत निष्पक्ष जांच की मांग लगातार होती रही लेकिन इनके द्वारा लापरवाही की जाती रहीं।
1.भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 316 के तहत लोक सेवक द्वारा आपराधिक विश्वासघात करना। यदि जिला स्तर पर वेरिफिकेशन के दौरान इस वित्तीय विसंगति को अनदेखा किया गया। तो इसकी सीधी जिम्मेदारी DCM दीपिका साहू पर निर्भर करती है।
2.भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 61(Criminal,Conspiracy)
पोर्टल की तकनीकी खामी को दबाकर अधीनस्थ कर्मचारियों के विरुद्ध साजिश रचने और उन्हें प्रताड़ित करने की संभावना।
3.मध्यप्रदेश सिविल सेवा (आचरण) अधिनियम 1965 के तहत
अपने पदीय दायित्वों के प्रति लापरवाही और बिना विस्तृत तकनीकी जांच के एक पक्षीय अनुशासनात्मक कार्यवाही प्रस्तावित करना।
अधीनस्थों पर दबाव बनाने का भी दिखा आरोप ?
जब इस सम्बन्ध में स्थानीय खोज बीन के साथ कर्मचारियों कि डीसीएम दीपिका साहू ने मामले की तह तक जाए बिना और पोर्टल की तकनीकी रिपोर्ट (Technical Audit) मंगाए बिना ही आनन-फानन में कारण बताओ नोटिस भी जारी कर दिया। यह सीधे तौर पर प्रशासनिक शक्तियों का दुरुपयोग और न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
उच्च स्तरीय जांच की मांग
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य
अधिकारी (CMHO) से मांग की गई है कि इस पूरे प्रकरण की जांच किसी निष्पक्ष समिति से कराई जाए। जांच में यह स्पष्ट किया जाए कि जब आईडी ब्लॉक स्तर से निष्क्रिय की जा चुकी थी, तो जिला स्तर पर डीसीएम दीपिका साहू के लॉगिन और निगरानी में यह भुगतान कैसे संभव हुआ? क्या यह जिला स्तर पर तकनीकी निगरानी की विफलता नहीं है?
संबंधित कार्यप्रणाली पर लगातार गलत तरीके से विभागीय में त्रुटिया और लापरवाही देखने को मिलीं हैं।

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