संपादकीय/लेख/आलेख

ताई के बाद भाई को मिली बड़ी जिम्मेदारी

लेखक-संजय एम. तराणेकर

कैलाश विजयवर्गीय को राजनीति का भाग्यवान माना जाता है। जहां विजयवर्गीय में राजनीति को लेकर क्षमताएं अपार बताई जाती है। कैलाश विजयवर्गीय जब प्रदेश में भाजपा सरकार के दौरान मंत्री थे तब भी उनको राष्ट्रीय पदाधिकारी बनाने की बात सामने आई थी और मंत्री रहते जब विजयवर्गीय को राष्ट्रीय महासचिव पहली बार बनाया गया था उसके कुछ दिनों बाद उन्होंने मंत्री पद छोड़कर संगठन में ही अपने आपको पूरी तरह लगा दिया था। हरियाणा की सफलता के बाद भाजपा की बंजर जमीन पश्चिमी  बंगाल में उन्हें भाजपा की खेती करने भेजा और जब ममता बनर्जी जैसी दबंग नेत्री से भाजपाइयों को दो-दो हाथ करने के गुर विजयवर्गीय ने वहां सीखाते हुए कई दूसरे दल के नेता और कार्यकर्ताओं को भाजपा में शामिल कराया। उसका परिणाम 2019 के लोकसभा चुनाव में बंगाल में देखने को मिला, जहां भाजपा नेता और कार्यकर्ता के लिए तरसती थी वहां डेढ़ दर्जन के करीब सांसद भाजपा के जीत गए। इसके पीछे कैलाश विजयवर्गीय का ही संगठन कुशलता का हाथ बताया जा रहा था। पश्चिम बंगाल में सक्रियता और मेहनत का ही लाभ विजयवर्गीय को मिला है। हांलाकि बीच-बीच में वे विवादास्पद बयानों के लिए भी चर्चित रहें है।

कैलाश विजयवर्गीय लगातार महासचिव बनने वाले इंदौर और मध्यप्रदेश के पहले भाजपा नेता हैं। इसके पहले सुमित्रा महाजन भाजपा की राष्ट्रीय महासचिव रह चुकी हैं, लेकिन उन्हें केवल एक कार्यकाल मिला था। ताई को तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष कुशाभाऊ ठाकरे ने अपनी टीम में महासचिव बनाया था। वह गुजरात की प्रभारी भी रही हैं। ताई के बाद कैलाश विजयवर्गीय ही ऐसे नेता है जिन्हें राष्ट्रीय महासचिव जैसी महत्वपूर्ण जवाबदारी दी गई है। श्री विजयवर्गीय भाजपा के 8 महासचिवों में सबसे वरिष्ठ हैं। उन्हें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की निजी पसंद के चलते जेपी नड्डा ने फिर से अवसर दिया है। विजयवर्गीय 2015 से महासचिव हैं और यदि कोई अप्रत्याशित परिवर्तन नहीं हुआ तो 2024 तक इस पद पर रहने वाले हैं। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव की हैसियत और ताकत केंद्रीय मंत्री से कम नहीं होती। इस मायने में श्री विजयवर्गीय की नियुक्ति इंदौर और मध्यप्रदेश के लिए और महत्वपूर्ण हो जाती है। विजयवर्गीय ने अपना सार्वजनिक जीवन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से प्रारंभ किया था। वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नाम से इंदौर विश्वविद्यालय में पैनल चलाते थे। वे खुद गुजराती विज्ञान महाविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष भी रहे हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के जरिए उन्हें भाजपा में लाया गया। जहां 1983 में उन्होंने विधानसभा क्षेत्र क्रमांक 2 के नंदा नगर वार्ड से चुनाव लड़ा और जीता। श्री विजयवर्गीय की यह विशेषता है कि उन्होंने हमेशा कांग्रेस के गढ़ को फतह किया और उसे भाजपा के गढ़ में तब्दील किया। 1990 में उन्हें विधानसभा क्षेत्र क्रमांक 4 से टिकट दिया गया, जबकि 1993, 1998 और 2003 में वे विधानसभा क्षेत्र क्रमांक 2 से लड़े। 2008 में उन्हें महू जैसे कठिन सीट पर भेजा गया। 2013 में भी वे महू से दूसरी बार और कुल मिलाकर छठी बार विधायक बने। अपने 10 वर्ष के कार्यकाल के दौरान उन्होंने महू में इतने विकास कार्य किए की अब महू भाजपा के गढ़ के रूप में जाना जाता है। 2000 में वे इंदौर के ऐसे पहले महापौर बने जिसे जनता द्वारा सीधे चुना गया हो। उन्होंने महापौर रहते हुए इंदौर की तस्वीर बदल दी। जनभागीदारी से चौराहों का सौंदर्यीकरण और गली मोहल्लों में सीमेंट कांक्रीट की पक्की सड़कें बना दी। उन्हीं के कार्यकाल में भंडारी और माणिकबाग ओवरब्रिज बने। श्री विजयवर्गीय को राष्ट्रीय महासचिव पद पर फिर से नियुक्ति मिलने से स्वाभाविक रूप से भाजपा कार्यकर्ताओं में हर्ष है, श्री विजयवर्गीय 2003 से 2015 तक लगातार मध्यप्रदेश सरकार के महत्वपूर्ण कैबिनेट मंत्री भी रहे हैं।

  पश्चिम बंगाल के भाजपा के लिए योद्धा बनकर नायक की तरह उभरे कैलाश विजयवर्गीय ने कहा-‘करीब साढ़े चार साल पूर्व मुझे जब पश्चिम बंगाल का प्रभारी बनाया था और मैं जब प्रभार के बाद पहली बार कोलकाता गया तो वहां की स्थिति परिस्थिति देखकर भौचक था। हमारे पास ठीक से नेता तो दूर कार्यकर्ता भी नहीं थे। कैलाश विजयवर्गीय बोले. मैंने अमित शाह को बताया कि बंगाल का एजेंडा 5 साल में नहीं बल्कि 15 साल में होगा। इस पर शाह ने कहा था तुम्हें केवल 5 साल के लिए बंगाल भेजा गया है और इसी में लक्ष्य भेदना है, मैं तुम्हारे पीछे खड़ा हूं।‘ अब देखना यह हैं कि विजयवर्गीय अपनी जिम्मेदारी आने वाले पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में किस तरह निभाते है और भाजपा को ममता दीदी के गढ़ में कितनी सफलता दिलाने में सफल होते है। यह उनके लिए किसी परीक्षा से कम नहीं है।

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