जनस्वास्थ्य रक्षकों के अभाव में दुर्दशा का शिकार होती स्वास्थ्य सेवायें।
लेखक – कुशलेन्द्र श्रीवास्तव (वरिष्ठ साहित्यकार)
राजनीतिक लाभ हानि के नाम पर सरकारी योजनाओं को किस तरह बरबाद कर दिया जाता है इसका सबसे बड़ा उदाहरण ‘‘जन स्वास्थ्य रक्षक योजना’’ है । जिसे शायद इसलिये बंद कर दिया गया कि वो किसी कांग्रेस सरकार ने प्रारंभ की थी । इस योजना में लगाया गया करोड़ों रूपया बरबाद हो गया और करीब 52 हजार युवाओं को रोजगार हीन कर दिया गया । ज्ञातव्य रहे कि ‘‘जन स्वास्थ्य रक्षक योजना’’ को वर्ष 1995 में इसलिये प्रारंभ किया गया था ताकि ग्रामीण क्षेत्र के रहवासियों को प्राथमिक उपचार आसानी से मिल सके । स्वास्थ्य सुविधा भारत के नागरिकों का मौलिक अधिकार माना गया है । दुखद पहलू यह भी है कि हम अपने देश की स्वंतत्रता के इतने वर्षों के बाद भी आमजन तक स्वास्थ्य सुविधायें नहीं पहुंचा पाए हैं । कुछ बहु आबादी वाले गांवों में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र अवश्य खोले गए पर वहां केवल नर्स की ही व्यवस्था की गई जो भी नियमित न जाने के सवालों के घेरे में रहीं आई । कई जगह तो ऐसे स्वास्थ्य केन्द्रों के ताले तक नहीं खुल पाए । मुख्य शहरों में बने अस्पताल पर पूरे क्षेत्र के मरीजों का भार पड़ा पर ये अस्पताल भी अव्यवस्था के घेरे में ही बने हुए हैं कहीं डाक्टर नहीं तो कही नर्स नहीं तो कही अन्य स्टाफ नहीं । कहीं दवायें नहीं तो कहीं भर्ती होने वाले मरीजों के लिये बेड ही नहीं । इस अवस्था के चलते आम मरीज परेशान होता है । ग्रामीण क्षेत्र का मरीज सबसे अधिक परेशान होता है । इसी की वजह से वो झोलाछाप डाक्टरों के चुगंल में फंस जाता है । ‘‘जन स्वास्थ्य रक्षक योजना’’ का मूल उद्देश्य ग्रामीण क्षत्रों के ऐसे ही मरीजों को तत्काल आवश्यक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना रहा है । इसके लिये इन्हें अनुभवी चिकित्सकों से प्रशिक्षण दिलाया गया । प्रशिक्षण देने वाले एमबीबीएस, एमडी चिकित्सक थे जिन्होने परीयिड लेकर और फिर काम लेकर इन्हें प्रशिक्षत किया । लोकस्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग द्वारा लिखित परीक्षा लेकर इनकी योग्यता को जांचा-परखा गया । जो ‘‘जन स्वास्थ्य रक्षक’’ इसमें सफल हुए शासन द्वारा प्रमाण पत्र देकर नियुक्त कर दिया गया । गांवों में पदस्थ इन ‘‘जन स्वास्थ्य रक्षकों को प्राथमिक उपचार करने के लिये अधिकृत कर दिया गया साथ ही राष्टीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों जैसे कुष्ठ निवारण, मलेरिया, फाइलेरिया, टी.वी. आदि में सहभागिता का अनुबंध किया गया । इन्हें ‘‘जन स्वास्थ्य रक्षकों के मौलिक कर्तव्यों बताया गया । इस तथ्य से ही इनकी अहमियत को रेखांकित किया जा सकता है कि इन्हें 20 प्रकार की दवायें रखने की छूट दी गई ताकि मरीज को स्वास्थ्य लाभ मिल जाए और उसे जरा-जरा सी बीमरी के लिये बड़े अस्पताल की ओर न भटकना पड़े । ‘‘पल्स पोलियो’’ जैसे अभियान में भी ‘‘जन स्वास्थ्य रक्षक’’ की महत्वपूर्ण भूमिका रखी गई और इन लोगों ने गांव-गांव और घर-घर जाकर पोलिया की दवाई का वितरण किया । ‘‘जन स्वास्थ्य रक्षकों ने ग्रामीण स्वास्थ्य की दिशा में महत्वचूर्ण भूमिका का निर्वहन किया । 1995 का वह दौर था जब आंगबाड़ी केन्द्र सभी जगह नहीं खोले गए थे और न ही उन्हें सशक्त बनाया गया था । यही कारण है कि स्वास्थ्य विभाग ने आहार-पोषण कार्यकम से लेकर नवजात शिशु की देखभाल, बच्चों की महत्वपूर्ण बीमारियों, टीकाकरण, अंधत्व निवारण, मलेरिया बुखार जैसी बीमारियों के उपचार का भार भी इन पर डाला था साथ ही खतरनाक बीमरियों के इलाज के लिए अस्पताल भेजना दवाओं के संबंध में जानकरी देना और सावधानी रखना । इनके दायित्वों को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि सरकार के लिये जनस्वास्थ्य रक्षकों की कितनी अहम भूमिका थी । जनस्वास्थ्य रक्षकों ने अपने कार्यों से ग्रामीण क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को मजबूत किया भी । झोलाछाप चिकित्सकों कों गांवों में पनपे का अवसर नहीं मिल पाया । हम सभी जानते हैं कि आज गांवों में दर्जनों लोग इन झोलाछाप डाक्टरों के चंगुल में फंस कर जान गंवा रहे हैं । पर चूंकि ग्रामीण क्षेत्रों में अन्य कोई विकल्प नहीं है इसलिये आमजन जानते बूझते इनके चंगुल में फंस ही जाता है ।
‘‘जन स्वास्थ्य रक्षक योजना’’ में मध्यप्रदेश सरकार ने कई सौ करोड़ रूपये खर्च किए ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधायें उपलब्ध कराई जा सके एवं चिकित्सकों की कमी को कुछ हल तक पूरा किया जा सके । जनस्वास्थ्य रक्षकों का कार्य 2003 तक निर्विवाद रूप से संचालित होता रहा । प्रदेश में भाजपा की सरकार के आने के बाद इन जनस्वास्थ्य रक्षकों के कार्य को समाप्त कर दिया गया । प्रदेश सरकार ने ऊषा कार्यकर्ताओं की नियुक्ति की हांलाकि ये कार्यकर्ता जनस्वास्थ्य रक्षकों का विकल्प के रूप में नहीं थीं । इनके जिम्मे स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता लाने का काम है साथ राष्टीय स्वास्थ्य मिशन के कार्यक्रमों के प्रति आमजन को सजग करने का दायित्व भी है । जनस्वास्थ्य रक्षकों के काम से अलग होने के बाद ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव दिखाई देने लगा । आज ग्रामीण सर्दी जुकाम की दवा लेने के लिये भी शहर के प्राथमिक उपचार केन्द्र आने को मजबूर हो रहे हैं । यह अभी कोई नहीं समझ पा रहा है कि प्रदेश सरकार ने आखिर क्यों जनस्वास्थ्य रक्षकों को हटाया । जनस्वास्थ्य रक्षकों की नियुक्ति के समय यह शर्त रखी गई थी जो लोग जनस्वास्थ्य रक्षक नियुक्त हो रहे हैं वे कोई दूसरी नौकरी नहीं करेंगे ताकि उन्हें जो करोड़ों रूपये खर्च कर प्रशिक्षित किया जा रहा है वह बेकार न जाये । ऐसे में जब जनस्वास्थ्य रक्षकों को अलग किया गया तो 52 हजार जनस्वास्थ्य रक्षक रोजगारहीन हो गए । यह भी दुखद पहलू है । वे शर्त के अनुसार कहीं काम भी कर पाए जबकि उन्हें अपने कार्य के दौरान मानदेय भी कम ही मिलता था और अब तो वे पूरी तरह बेरोजगार हो ही चुके थे । वर्ष 2019 में कांग्रेस सरकार के प्रदेश में सत्ता संभालने के बाद एक बार फिर जनस्वास्थ्य रक्षकों को कार्य देने की योजना का प्रारूप तैयार किया गया । 11 दिसम्बर 2019 को जनस्वास्थ्य रक्षकों की नियुक्ति ग्राम स्तर पर करने के लिए लोक स्वास्थ्य संचालनालय द्वारा पत्र जारी किया गया । भौतिक सत्यापन हो चुका था और इसके बाद केवल नियुक्तियां ही होना थीं तभी कांग्रेस सत्ता से बेदखल हो गई । इसके बाद एक बार फिर जनस्वास्थ्य रक्षकों का भविष्य अंधकार में तब्दील हो गया । जनस्वास्थ्य रक्षकों का अभाव कोरोना काल के संक्रमण में भी महसूस किया गया । विगत पांच महिनों से शहरी क्षेत्र से लेकर ग्रामीण क्षेत्र तक कोरोना के बढ़ते संक्रमण से संघर्ष कर रहे हैं । स्वास्थ्य विभाग का अमला, उषा कार्यकर्ता से लेकर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता भी सेवा कार्य में लगे हुए हैं यहां तक कि शिक्षकों की सेवायें भी इस दौरान ली गई हैं पर प्रशिक्षित जनस्वास्थ्य रक्षकों की सेवायें लेना उचित नहीं समझा गया । जनस्वास्थ्य रक्षकों के संगठन ने सेवा के रूप में इस संक्रमण काल में अपनी सेवायें देने का लिखित आवेदन भी प्रस्तुत किया पर फिर भी शासन और प्रशासन ने कई जिलों में इनसे दूरी बनाकर रखी ।
प्रदेश में जिस तरह की स्वास्थ्य सेवायें हैं इसका वास्तविक मूल्यांकन कोरोना काल में हो चुका है । शासन और प्रशासन महसूस कर चुका है कि प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने की दिशा में बहुत काम किया जाना बाकी है । इन बहुत कामों में जनस्वास्थ्य रक्षकों को भी पुनः उनके दायित्वों के साथ काम पर लिया जाना भी जोड़ा जाना चाहिये ताकि ग्रामीण क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवायें तो बेहतर हो ही जायें साथ ही हजारों प्रशिक्षित बेरोजगार रोजगार से लग सकें ।



