माँ का आँचल, सबसे निर्मल

पालती अपने गर्भ में जो,
दर्द लाखों सहकर भी ।
सीने से लगा वह दूध पिलाती,
खुद रोज भूखे रहकर भी।।
किलकारियां बेटी की सुन,
कितनी खुश हो जाती मां।
सूखे में बेटी को सुला,
खुद गीले में सो जाती मां ।।
बड़ा किया हृदय से लगा ,
फिर ब्याह की चिंता होने लगी।
बेटी की सूरत को देख ,
अब मां की आंखें रोने लगी।।
लो आज वह दिन भी आ गया,
बेटी दुल्हन बनकर पास खड़ी।
आज समझ पाई इक मां ,
की बेटी हो गई आज बड़ी।।
चली गई वह छोड़ ये आंगन ,
और छोड़ गई वो किलकारी।
छोड़ गई सब खेल खिलौने ,
और छोड़ गई वो फुलकारी ।
सूना सूना हो गया आंगन,
सूनी हो गई हर इक बगिया,
मां के हृदय का फूल थी बेटी,
मां की ममता की थी बगिया ।।
सूनी हो गई मां की आंखें,
होठों से मुस्कान गई।
उस दिन मां की बेटी नहीं,
उस दिन मां की जान गई।
सीमा गौरव तिवारी



