मध्य प्रदेशसंपादकीय/लेख/आलेखसाहित्य दर्पण
अधूरा लगता…

तुम बिन में अधूरा लगता।
तुम बिन घर अधूरा लगता।
जैसे बिना हिरन के
पूरा वन अधूरा लगता।
जैसे बिना जल के हमारा
जीवन अधूरा लगता।
जैसे बादल बिना खुला
आकाश अधूरा लगता।
जैसे बिना शब्दों के कोरा
कागज़ अधूरा लगता।
जैसे बिना फूल के पूरा
बाग अधूरा लगता।
जैसे बिना नींद के ख्वाब
देखना अधूरा लगता।
जैसे बिन तेरे ज़िंदगी
जीना हमें अधूरा लगता।
जैसे बिना परछाई हमारा
वजूद अधूरा लगता।
नीक राजपूत
9898693535



