साहित्य दर्पण
कोई ख़्वाब गुजरा…

कोई ख़्वाब छू कर गुजरा।
कई सवालात लेकर गुजरा।
हमें निंद से जगा कर वो
पास से रोता हुआ गुजरा।
मेरा बिता कल लेकर वो
आज इतने करीब से गुजरा।
होठों पर शिकायते लिए
बड़ी ख़ामोशी से गुजरा।
जिसे आँखो में गवाँया था
वो तस्वीरें लेकर गुजरा।
रूठे अरमानो के साथ वहँ
दिलकी गलियारों से गुजरा।
सुलगती तन्हाइयो के साये
तले तूफ़ान लेकर गुजरा।
होठों पर तेरा नाम और
हमारा वजूद लेकर गुजरा।
नीक राजपूत
9898693535



