साहित्य दर्पण
दिल में नाम तेरा उकेरें है

शब्दों के कारीगर बने
हम चांद में अपने
महबूब का अक्स
तलाशने मे लगे रहे
और वो जज्बातों के सौदागर बन
हवाओं के साथ चलते बने
है जग की डगर कठिन बहुत
तन्हा जीना मुश्किल है
बेशक मौसम के जैसे
बदलना फितरत ना थी कभी
पर बेरुखे मेघों से
बरसात की उम्मीद
रखना है फिजूल
खुद को अब बदलना होगा
है जग की डगर कठिन बहुत
संग जीना ख्वाहिश है
दिल में नाम तेरा उकेरें है
तेरी थोड़ी वफाई से
रहमत की बरसात
इश्क पर हो जाएगी
दिलदार देख मुड़के इकबार
और जगा सूरज को अपने
है जग की डगर कठिन बहुत
अब तो हँसते हँसते जीना है I
: मुनीष भाटिया
585, स्वस्तिक विहार, जीरकपुर(मोहाली), चंडीगढ़
मोबाइल 9416457695



