सचेत रहें और अधिकारों के लिए संघर्ष करें आदिवासी
आदिवासियों, अन्तर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस के शुभ अवसर पर सभी आदिवासियों को बधाईयाँ और शुभकामनाएँ। शुभकामनाओं के साथ मैं सभी आदिवासियों को सचेत भी करना चाहता हूँ कि वर्तमान परिस्थितियों को समझें, क्योंकि वर्तमान परिस्थितियाँ प्रतिकूल हैं। आज अधिकांष सरकारी जमीन, सरकारी संस्थाएँ बिक चुकीं हैं और अधिकांष सरकारी संस्थाओं को निजीकरण कर दिया गया है या किया जा रहा है। आपके जमीन को भी पूँजीपति लोग लेने के लिए ताक में बैठेे हुये हैं कि किस तरीके से आपके जमीन को हड़प लिया जाये। चाहे वह विकास के नाम पर ही क्यों न हो? वहाँ पर फैक्ट्री आदि लग जाने के बाद आपके खेतों में केमिकलयुक्त गंदा पानी निकल कर आयेगा और खेती करना मुष्किल हो जायेगा। मजबूरन आपको अपना जमीन बेचना पड़ेगा, तो आप जायेंगे कहाँ? आदिवासियों को सचेत रहने के साथ ही साथ अपने बेटे-बेटियों को षिक्षित करना अति आवष्यक है। बिना षिक्षा के आप कुछ नहीं कर पायेंगे। षिक्षा ही एकमात्र ऐसा हथियार है जिसके सहारे आप अपने हक एवं अधिकारों के लिए लड़ सकते हैं। इसलिए षिक्षित होना अति आवष्यक है।
षिक्षा के साथ ही समाज के लोगों को नषा या मादक पदार्थों से दूर रहना होगा। सभी जानते हैं कि जब तक समाज में मादक या नषीले वस्तुओं का प्रयोग होता रहेगा तब तक समाज का केवल पतन ही होगा। यदि स्वस्थ समाज की एवं स्वस्थ परिवार की उन्नति या प्रगति चाहते हैं तो सभी आदिवासियों को नषा या अन्य हानिकारक मादक पदार्थों से दूर रहना होगा। पर कुछ ऐसे भी लोग हैं जिन्हें आदिवासी शब्द सुनकर ही उल्टी आनी शुरू हो जाती है। ये सोचते हैं कि ये अनपढ़, गंवार और अषिक्षित हैं। षिक्षित होना अनिवार्य हैं क्योंकि षिक्षा के द्वारा ही आप अच्छे या बुरे को जान पाते हैं और ये दूसरों से आगे निकल सकते हैं। पक्षपात तो होता है लेकिन जो इससे जीत कर निकलता है वही सच्चा कामयाब इंसान है।
जैसे कि वे परलोक से या दूसरी दुनिया से आये हों। आदिवासियों के विकास का नाम तो सभी लेते हैं पर काम नहीं करते हैं। यदि काम भी करते हैं तो अपने-अपने स्वार्थ या संगठन को मजबूत बनाने के लिए, न कि आदिवासियों के विकास के लिए। आदिवासियों को अपने बच्चों का ध्यान केन्द्र्रित करने का समय है, समय का ध्यान रखते हुये माता-पिता को कार्य करना है। समय बदल रहा है, लोग बदल रहे हैं तो हमें भी समय के साथ बदलने की आवष्यकता है। वक्त की पुकार है, पुकार को सुनें और समझने की कोषिष करें। आदिवासी षिक्षित तो हो रहे हैं, लेकिन लड़कों की तुलना में लड़कियाँ आगे बढ़ रहे हैं। पढ़े-लिखे लड़कियाँ दूसरे बिरादरी के लड़कों से शादी कर रहे हैं क्योंकि वे कमा रहे हैं। वो शादी भी कुछ सालों के लिये। इसलिए आदिवासी लड़कों को भी पढ़ना अति आवष्यक है ताकि आपके बेटियों के लिए सुयोग्य वर मिल सके। मुझे कहने का मन नहीं करता लेकिन हालात और परिस्थितियों को देखते हुये कहना और लिखना पड़ रहा है।
षिक्षा ही एकमात्र जरिया है जिसके द्वारा आप अपने अधिकारों के लिए लड़ सकते है। अधिकारों से लड़ना एक व्यक्ति विषेष से नहीं होता बल्कि अधिकारों की प्राप्ति हेतु लड़ने के लिए एकता की जरूरत और योग्य नेताओं का चुनाव करना भी अति आवष्यक है। जो आपके उत्थान के लिए कार्य कर सकंे। लेकिन दुःख इस बात की है कि हम बँटे हुये हैं, कोई जाति के नाम पर, कोई धर्म के नाम पर, तो कोई अपने क्षेत्र के नाम पर और जिस किसी को अपना स्वार्थ निकालना है तो वह अपना खेल खेलकर निकल जाता है। इसलिए एक मंच पर आने पर ही हमारा विकास संभव है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति का योगदान नितान्त आवष्यक है।
अपने अधिकारों के लिए सरकार से लड़ना खराब बात नहीं है। यह हमारा मौलिक अधिकार है, इसलिए कहते हैं जो डर गया सो मर गया। मरे हुये शेर से तो जीवित कुत्ता अच्छा है। अपने अस्तित्व की लड़ाई में डर किस बात का। डर हमें आगे बढ़ने नहीं देगा, लेकिन निडर होकर जब हम लड़ते हैं तो नित्य हमारी जीत होगी। आप सभी को मेरी शुभकामनाएँ।
प्रबंधक
फादर रंजित लकड़ा
संत थाॅमस उच्च. माध्य. विद्यालय,
जबलपुर।



